जप

जिनागम-प्रन्धथमाला : प्रस्थाजु १२

[परमश्रद्धेय गुरुदेव पूज्य श्री जोरावरमलजी महाराज की पुण्यस्मृति मे श्रायोजित ]

श्रीदिववाचकविरचित ननन्‍्दीसृञ्ञ

[मूलपाठ, हिन्दी श्रनुवाद, विवेचन, परिशिष्ट युक्त ]

श्ल|

प्रेरणा

(स्व.) उपप्रव्तक शासनसेवी स्वासो श्री ग्रजलालजी भहाराज |

सयोजक तथा प्रधान सम्पादक श्री स्‍था जन श्रमणसघ के युवाचारय्य (स्व०) युवाचार्य श्री सिश्रीमलजी महाराज 'सधुकर'

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ग्रनुवादन --विवेचन

जन साध्वी उसरावकु वर 'अ्खंना' |

सम्पादन

कमला जेन 'जोजी', एम

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प्रकाशक श्री आागमप्रकाशन समिति; ब्यावर (राजस्थान)

जिनागस-म्रन्थसाला : प्रन्याजू १२ १२

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पते

ध।

निर्देशन साध्वी श्री उमरावबकु वर “अर्चना'

सम्पादकमण्डल अनुयोगप्रवर्तक घुनि श्री कन्हैयालालजी 'कमल उपाचायं श्री वेवेन्द्रमुनि शास्त्री

श्री रतनमुनि

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सम्प्रेरक सुनि कली वितयकुलार 'सोस' श्री सहेन्द्रमुनि दिनकर"

द्वितोय सस्करण प्रकाशनतिथि बीर निर्वाण सं० २५१७

विक्रम सं० २०४८

अगस्त १९९१ ई०

प्रकाशक श्री आगमभप्रकाशन समिति

श्री ब्रज-मधुकर स्मृति भवन, पीपलिया बाजार, ब्यावर (राजस्थान) पिन--३०५९०

मुद्रक सतीशचनत शुक्ल

वैदिक यंत्रालय,

क्रेसरगंज, अजमेर--३०५००

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समर्पण

जिनकी साहित्य-सेवा श्रमर रहेगी,

जिनके प्रकाण्ड पाण्डित्य के समक्ष जेन-जैनेतर विद्वान्‌ नतमस्तक होते थे,

जो सरलता, शान्ति एबं सयम की प्रतिमूर्ति थे, भारत की राजधानी में जो अपने भव्य एवं. दिव्य व्यक्तित्व के कारण भारतभूषण' के गौरवमय विरुद से विभूषित किए गए, जिनके अश्रगाध आगमज्ञान का लाभ मुभे भी प्राप्त करने का सद्भाग्य प्राप्त हुआ,

उन बविद्वद्वरिष्ठ शतावधानी

मुनिश्री रत्नचन्द्रजो महाराज के कर-कमलो मे

मधुकर मुनि

[ प्रथम संस्करण से]

ग्राकाशकोाय

श्री नन्‍दीसूत्र का यह द्वितीय सस्करण पाठको के हाथो में है। इस सूत्र का श्ननुवाद और विवेचन श्रमण- सघीय प्रख्यात विदुषी महासती श्री उमरावकुंवरजी म० “'ग्रचनंना” ने किया है। महासती “अ्रचंना” जी से स्थानकवासी समाज भलीभाति परिचित है। प्रापके प्रशस्त साहित्य को नर-नारी बडे ही चाव से पढते-पढाते हैं प्रवचन भी प्रापके श्रन्तरतर से विनिर्गंत होने के कारण श्रतिशय प्रभावोत्पादक, माधुयं से ओत-प्रोत एवं बोधप्रद है प्रस्तुत आगम का अनुवाद सरल झौर सुबोध भाषा में होने से स्वाध्यायप्रेमी पाठकों के लिये यह सस्करण अत्यन्त उपयोगी होगा, ऐसी आशा है

प्रस्तुत सूत्र परम मागलिक' माना जाता है हजारो वर्षों से ऐसी परम्परा चली श्रा रही है ! श्रतएवं साधु- साध्वीगण इसका सज्काय करते है, भ्रनेक श्रावक भी उन सबके लिए अ्रधिक विस्तृत, श्रधरिक सक्षिप्त, मध्यम शैली में तेयार किया गया यह सस्करण विशेषतया बोधप्रद होगा

समिति अपने लक्ष्य की ओर यथाशक्‍्य सावधानी के साथ किन्तु तीत्र गति से श्रागे बढ रही है। आगम बत्तीसी क॑ प्रकाशन का कार्य पूर्ण होने जा रहा है तथा भ्रप्राप्य शास्त्रो के द्वितीय सस्करण मुद्रित हो रहे हैं

5५५

यह सब श्रमणसघ के स्व० युवाचार्य पण्डितप्रवर मुनिश्री मिश्रीमलजी म० सा० “मधुकर'' के कठिन श्रम ओर श्रागमज्ञान के प्रधिक से भ्रधिक प्रचार-प्रसार के प्रति तीत्र लगन तथा गम्भीर पाण्डित्य के कारण सम्भव हो सवा है

ग्रन्त मे जिन-जिन महानुभावों का समिति को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप मे सहयोग प्राप्त हुआ या हो रहा है, उन' सभी के प्रति हम हादिक शझ्राभार व्यक्त करना श्रपना कत्तंव्य समभते हैं

रतनचन्द मोदी सायरमल चोरडिया अमभरचन्द सोदी कार्य वाहक ग्ध्यक्ष महामत्री मत्री क्री आगमप्रकाशन समिति, ब्यावर

श्री आगम प्रदआाशन समिलि, व्यायर

अश्रध्यक्ष कार्यवाहक अध्यक्ष उपाध्यक्ष

महामत्री मत्री

सहमत्री कोषाध्यक्ष

सदस्य

परामशंदाता

(कार्यकारिणी समिति )

श्री किशनलालजी बंताला

श्री रतनचन्दजी मोदी

श्री धनराजजी विनायकिया

श्री पारसमलजी चोरडिया

श्री हुक्मीचन्दजो पारख

श्री एस किशनचन्दजी चो रडिया श्री जसराजजी पारख

श्री जी० सायरमलजी चोरडिया श्री अमरचन्दजी मोदी

श्री ज्ञानराजजी मूथा

श्री ज्ञानचन्दजी विनायकिया श्री जवरीलालजी शिशोदिया श्रो अमरचन्दजी बोथरा

श्री एस बादलचन्दजी चोरडिया श्री मूलचन्दजी सुराणा

श्री दुलीचन्दजी चोरडिया श्री प्रकाशचन्दजी चौपडा श्री मोहनसिहजी लोढा

श्री सागरमलजी बेताला श्री जतनराजजी मेहता

श्री भवरलालजी श्रीश्रीमाल श्री चन्दममलजी चोरडिया श्री सुमेरमलजी मेडतिया श्री आसूलालजी बोहरा

श्री जालमसहजी मेडतवाल श्री प्रकाशचन्दजी जैन

मद्रास ब्यावर ब्यावर मद्रास जोधपुर मद्रास दुर्ग मद्रास ब्यावर पाली ब्यावर ब्यावर मद्रास मद्रास नागौर मद्रास ब्यावर ब्यावर इन्दौर मेडतासिटी दुगं मद्रास जोधपुर जोधपुर ब्यावर नागोर

नन्दीसृत्र-प्रथम संस्करण प्रकाशन के विशिष्ट अर्ंसहयोगी श्रीमान्‌ सेठ एस. रलनचन्दजी चोरड़िया, मद्रास

(जीवन परिचय ]

आपका जन्म मारवाड के नागौर जिले के नोखा (चादावतों का) ग्राम में दिनाक २० दिसम्बर १९२० को स्व श्रीमान्‌ सिमरथमलजी चोरडिया की ध्मंपत्नी स्वर्गीया श्रीमती गट्टूबाई की कुक्षि से हुआ प्लापका बचपन गाँव में ही बीता प्रारम्भिक शिक्षा आगरा में सम्पन्न हुई। यही पर चौदह वर्ष की ग्रल्पायु में ही आपने अ्रपना स्वतन्त्र व्यवसाय प्रारम्भ किया | निरन्तर भ्रथक परिश्रम करते हुए पन्द्रह वर्ष तक श्राढत के व्यवसाय में सफलता प्राप्त की

सन १९५० के मध्य झापने दक्षिण भारत के प्रमुख व्यवसाय के केन्द्र मद्रास में फाइनेन्स का कार्य शुरू किया जो श्राज सफलता की ऊँचाइयो को रहा है, जिसमे प्रमुख योगदान श्रापके होनहार सुपुत्र श्री प्रसपश्नचन्दजी, श्री पदमचन्दजी, श्री प्रेमचन्दजी, श्री धर्मंचन्दजी का भी रहा है वे कुशल व्यवसायी है तथा झापके प्राशाकारी है

आपने व्यवसाय में सफलता प्राप्त कर अपना ध्यान समाज-हित में धामिक कार्यों की ओर भी लगाया है। उपाजित धन का सदुपयोग भी शुभ कार्यो में हमेशा करते रहते है। उसमे श्रापके सम्पूर्ण परिवार का सहयोग रहता है। मद्रास के जैनसमाज के ही नहीं श्रन्य॒ समाजों के कार्यों में भी आपका सहयोग सर्देव रहता है आप मद्रास की जैन समाज की प्रत्येक प्रमुख सस्था से किसी किसी रूप में सम्बन्धित हैं उनमें से कुछेक ये है भू पू कोषाध्यक्ष श्री एस एस जन एज्युकेशनल सोसायटी (इस पद पर सात वर्ष तक रह हैं) अध्यक्ष--(उत्तराज्चल) -श्री राजस्थानी एसोसिएशन, कोषाध्यक्ष--श्री राजस्थानी श्वे स्था जेन सेवा सघ, मद्रास (इस सस्था द्वारा असहाय श्रसमर्थ जनो को सहायता दी जाती है। होनहार युवकों युवतियों को विद्वानो को सहयोग दिया जाता है ।) महास्तम्भ--श्री व्धंभान सेवा समिति, नोखा सरक्षक--श्री भगवान्‌ महावीर श्रहिसा प्रचार सघ टस्टी--स्वामीजी श्री हजारीमलजी म॒ जैन ट्रस्ट, नोखा कायेकारिणी के सदस्य-“आाननन्‍्द फाउन्डेशन भू पू महामत्री--श्री बैकटेश झायु्वेदिक झोषधालय-मद्रास, (यहाँ सेकडो रोगी प्रतिदिन उपचारार्थ गाते है)

[९]

सर्देव सन्‍्त-सतियाजी की सेवा करना भी प्रापने अपने जीवन का ध्येय बनाया है। झाज स्थासकवासी समाज के कोई भी सन्त मुनिराज नहीं है जो भ्रापके नाम झापकी सेवाभावना से परिचित हो

ग्रापके लधुअता सर्वश्री बादलचन्दजी, सायरचन्दजी भी धाभिक वृत्ति के हैं। वे भी प्रत्येक सत््‌काय॑ में आपको पूर्ण सहयोग प्रदान करते है। झापके स्व. भनुज श्री रिखवचन्दजी की भी अपने जीवनकाल में यही भावना रही है

झापकी धमंपत्नी श्रीमती रतनकवर भी धर्ंश्रद्धा की प्रतिमूति एबं तपस्विनी है। परिवार के सभी सदस्य धामिक भावना से प्रभावित है विशेषत पुत्रवधुएँ आपकी धामिक परम्परा को बराबर बनाये हुए हैं

झापने जन-कल्याण की भावना को दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित ट्रस्टो की स्थापना की है जो उदारता से समाज सेवा कर रहे हैं--

(१) श्री एम रतनचन्द चोरडिया चेरिटेबल ट्रस्ट

(२) श्री सिमरथमल गटुटूबाई चोरडिया चेरिटीज ट्रस्ट

आपका परिवार स्वामीजी श्री ब्रजलालजी भ. सा , पूज्य युवाचार्य श्री मिश्रीलाल सा , का झनन्‍्य भक्त है। आपने श्रीश्रागम-प्रकाशन-समिति से प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रकाशन में श्पना उदार सहयोग प्रदान किया है एतदथें समिति आपका झाभार मानती है एव आशा करती है कि भविष्य में भी श्रापका सम्पूर्ण सहयोग समिति को मिलता रहेगा

“मन्त्र

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आदि वचन (प्रथम सस्करण से )

विश्व के जिन दाशेनिको -दुष्टाह्रो/चिन्तको, ने “आात्मसस्ा' पर चिन्तन किया है, या ग्रात्म-साक्षात्कार किया है उन्होंने पर-हितार्थ प्रात्म-विकास के साधनों तथा पद्धतियों पर भी पर्याप्त चिन्तन-मनन किया है। झात्मा नथा तत्सम्बन्धित उनका चिन्तन-प्रवचन भ्राज झागम/पिटक/विद/उपनिषद्‌ भ्रादि विभिन्न नामो से विश्वत है

जैन दर्शन की यह धारणा है कि झ्रात्मा के विकारो--राग द्व भ्रादि को, साधना के द्वारा दूर किया जा सकता है, भ्रौर विकार जब पू्णत निरस्त हो जाते हैं तो भ्रात्मा की शक्तियाँ ज्ञान/सुख/वीय॑ भ्रादि सम्पूर्ण रूप में उद्घाटित उद्भासित हो जाती हैं शक्तियों का सम्पूर्ण प्रकाश-विकास ही स्वशता है और सर्वज्ञ/भ्राप्त-पुरुष की बाणी, वचन/कथन/प्रूपणा-- आगम” के नाम से भ्रभिष्वित होती है। प्रागम भर्थात्‌ तत्त्वज्ञान, श्रात्म-ज्ञान तथा भ्राचार-व्यवहार का सम्यक्‌ परिबोध देने वाला शास्त्र/सूत्र/प्राप्ततचन

सामान्यत सर्वज्ञ के बचनो/वाणी का सकलन नही किया जाता, वह बिखर सुमनो की तरह द्वोती है, किन्तु विशिष्ट अ्तिशयभम्पन्न सर्वज्ञ पुरुष, जो धरम तीर्थ का प्रवर्तन करते है, सघीय जीवन पद्धति में धर्म-साधना को स्थापित करते हैं, वे धर्म प्रवर्तक/ग्ररिहत या तीर्थंकर कहलाते है तीर्थंकर देव की जनकल्याकारिणी वाणी को उन्ही के श्रतिशय सम्पन्न विद्वान्‌ शिष्य मणधर सकलित कर “अभ्रागम या शास्त्र का रूप देते है श्रर्थात्‌ जिन- वबचनरूप सुमनों की मुक्त वृष्टि जब मालारूप में ग्रथितः होती हैं तो वह “भ्रागम” का रूप धारण करती है वही आगम ग्रर्थात्‌ जिन-प्रवचन श्राज हम सब के लिए झात्म-विद्या या मोक्ष-विद्या का मूल स्रोत है

“श्रागम”” को प्राचीनतम भाग में “गणिपिटक'” कहा जाता था भ्ररिहतो के प्रवचनरूप समग्र शास्त्र-द्वादशाग में समाहित होते है श्लौर द्वादशाग/श्राचाराग-सूत्रक्ताग श्रादि के अग-उपाग ग्रादि भ्रनेक भेदोपभेद विकसित हुए हैं उस द्वादशागी का अध्ययन प्रत्येक सुमुक्षु के लिए श्रवश्यक और उपादेय माना गया है। द्वादशागी में भी बारहवा अग विशाल एवं समग्रश्नुत ज्ञान का भण्डार माना गया है, उसका अध्ययन बहुत ही विशिष्ट प्रतिभा एव श्रुतसम्पन्न साधक कर पाते थे। इसलिए सामान्यत एकादशाग का अध्ययन साधको के लिए बिहिित हुआ तथा इसी झोर सबकी गति/मत्ति रही

जब लिखने की परम्परा नही थी, लिखने के साधनों का विकास भी प्रल्पतम था, तब आगमो/शास्त्रो/को स्मृत्ति के आधार पर या गु३-परम्परा से कठस्थ करके सुरक्षित रखा जाता था सम्भवत इसलिए झागम ज्ञान को श्रुतशान कहा गया और इसीलिए श्रृति/स्मृति जंसे साथंक शब्दो का व्यवहार किया गया भगवान्‌ महावीर के परिनिर्वाण के एक हजार वर्ष बाद तक ग्रागमो का झ्ञान स्मृति/श्रुति परम्परा पर ही आधारित रहा पश्चात्‌ स्मृतिदौबंल्य शुरुपरम्परा का विच्छेद, दुष्काल-प्रभाव आदि भ्रनेक कारणो से धीरे-धीरे आगमज्ञान लुप्त होता चला गया। महासरोवर का जल सूखता-सूखता गोष्पद मात्र रह गया। मुमुक्षु श्रमणो के लिए यह जहाँ चिन्ता का विषय था, वहाँ चिन्तन की तत्परता एव जागरूकता को चुनोती भी थी बे तत्पर हुए श्रुतज्ञान-निधि के सरक्षण हेतु तभी महान्‌ श्रुतपारगामी देवड्धि गणि क्षमाश्रमण ने विद्वान्‌ श्रमणो का एक सम्मेलन बुलाया श्ौर स्मृति-दोष से लुप्त होते भ्रागम ज्ञान को सुरक्षित एव सजोकर रखने का भ्राह्वान किया सर्व-सम्मति से झ्रागमो को लिपि-बद्ध किया ग्रया।

जिनवाणी को पुस्तकारूढ करने का यह ऐतिहासिक कार्य वस्तुत आज की समग्र ज्ञान-पिपासु प्रजा के लिये एक झवर्णनीय उपकार सिद्ध हुमा संस्कृति, दर्शन, धर्म तथा झात्म-विज्ञान की प्राचीनतम ज्ञानघारा को प्रवहमान रखने का यह उपक्रम बीरनिर्वाण के ९६० या ९९३ वर्ष पश्चात्‌ प्राचीन नगरी वलभी (सौराष्ट्र) मे झ्ाचायं श्री देवड्ि- भणि क्षमाश्रमण के नेतृत्व में सम्पन्न हुप्ना | वेसे जेन भ्रागमों की यह दूसरी भ्रन्तिम वाचना थी, पर लिपिबद्ध करने का प्रथम प्रयास था। ग्राज प्राप्त जैन सूत्रों का अन्तिम स्वरूप-सस्कार इसी वाचना में सम्पन्न किया गया था

पुस्तकारूढ होने के बाद झ्रागमो का स्वरूप मूल रूप मे तो सुरक्षित हो गया, किन्तु काल-दोष, श्रमण-सघो के श्लान्तरिक मतभेद, स्मृति दुर्बलता, प्रमाद एवं भारतभूमि पर बाहरी आक्रमणो के कारण विपुल' ज्ञान-भण्डारो का विध्वस प्रादि झनेकानेक कारणों से आगम ज्ञान की विपुल सम्पत्ति, श्रथंबोध की सम्यक गुरु-परम्परा धीरे-धीरे क्षीण एव विलुप्त होने से नही रुकी झ्रागमो के भनेक महत्त्वपूर्ण पद, सन्दर्भ तथा उनके गूृढार्थ का ज्ञान, छिल्न- विच्छिन्न होते चले गए परिपक्व भाषाज्ञान के श्रभाव में, जो प्रागम हाथ से लिखे जाते थे, वे भी शुद्ध पाठ वाले नही होते, उनका सम्यक श्रथं-ज्ञान देने वाले भी विरले ही मिलते इस प्रकार अनेक कारणो से ग्रागम की पावन घारा सकुचित होती गयी

विक्रमीय सोलहबी शताब्दी मे वीर लोकाशाह ने इस दिशा में ऋन्‍्तिकारी प्रयत्न किया श्रागमों के शुद्ध और यथार्थ ब्रथ॑ं ज्ञान को निरूपित करने का एक साहसिक उपक्रम पुन चालू हुआ किन्तु कुछ काल बाद उसमे भी व्यवधान उपस्थित हो गये। साम्प्रदायिक-विद्वठ ष, सेद्धांतिक विग्ह, तथा लिपिकारों का प्रत्यल्प ज्ञान आगमो की उपलब्धि तथा उसके सम्यक भ्रर्थवोध मे बहुत बडा विध्न बन गया झागम-प्रभ्यासियो को शुद्ध प्रतिया मिलना भी दुलंभ हो गया

उन्नीसवी शताब्दी के प्रथम चरण में जब प्रागम-मुद्रण को परम्परा चली तो सुधी पाठकों को कुछ सुविधा प्राप्त हुई धीरे-धीरे विह्वत्‌ू-प्रयासों से आगमो की प्राचीन चूणियाँ, नियु क्तियाँ, टीकाये भ्रादि प्रकाश में श्राई भौर उनके भ्राधार पर झागमो का स्पष्ट-सुगसम भाववोध सरल भाषा मे प्रकाशित हुआ इसमे ग्रागम-स्वाध्यायी तथा ज्ञान-पिपासुजनों को सुविधा हुई फलत श्रागमो के पठन-पाठन की प्रवृत्ति बढी है। मेरा श्रनुभव है, प्राज पहले से कही भ्रधिक आगम-स्वाध्याय की प्रवृत्ति बदी है, जनता में श्रागमों के प्रति ध्ाकर्षण रुचि जागृत हो रही है इस रुचि-जागरण में अनेक विदेशी आगमज्ञ विद्वानों तथा भारतीय जैनेतर विद्वानों की झ्रागम-श्रुत-सेवा का भी प्रभाव अनुदान है, इसे हूम सगौरव स्वीकारते है

प्रागम-सम्पादन-प्रकाशन का यह सिलसिला लगभग एक शताब्दी से व्यवस्थित चल रहा है। इस महनीय- श्रत-सेवा में पभ्रनेक समर्थ श्रमणो, पुरुषार्थी विद्वानों का योगदान रहा है। उनकी सेवायें नीव की ईंट की तरह आज भले ही अ्रदृश्य हो, पर विम्मरणीय तो कदापि नही, स्पष्ट पर्याप्त उल्लेखो के अ्रभाव में हम भ्रधिक विस्तृत रूप में उनका उल्लेख करने में प्रसमर्थ हैं, पर विनीत क्ृतज्ञ तो हैं ही फिर भी स्थानकवासी जैन परम्परा के कुछ विशिष्ट-प्रागम श्रुत-सेवी मुनिवरों का नामोल्लेख अवश्य करना चाहूँगा

आज से लगभग साठ वर्ष पूर्व पूज्य श्री ममोलकऋषिजी महाराज ने जैन आगमो--३२ सूत्रो का प्राकृत

से खडी बोली में भ्रनुवाद किया था। उन्होने श्रकेले ही बत्तीस सूत्रों का प्रनुवाद कार्य सिर्फ वर्ष १४ दिन में पुर्णं कर एक श्रदृभुत कार्य किया उनकी दृढ़ लगनशीलता, साहस एवं श्रागम ज्ञान की गम्भीरता उनके काय से ही

स्वत परिनक्षित होती है। वे २२ ही भ्रागम समय मे प्रकाशित भी हो गये

इससे ग्रागमपठन बहुत सुलभ व्यापक हो गया और स्थानकवासी-तेरापथी समाज' तो विशेष उपकृत हुझा

[ १२]

गुरुदेव श्री जोराबरमल जी भहाराज का संकल्प

मैं जब प्रात स्मरणीय गुरुदेव स्वामीजी श्री जोरावरमलजी के साझ्रिध्य में श्रागमो का अ्रध्ययन-पनुशीलन करता था तब झागमोदय सम्रिति द्वारा प्रकाशित ग्राचार्य श्रभयदेव शीलाक की टीकाडओ्रो से युक्त कुछ प्रागम उपलब्ध थे उन्ही के भ्राधार पर मैं प्रध्ययन-वाचन करता था। गुरुदेवश्ली ने कई बार अनुभव किया--यद्यपि यह सस्करण काफी श्रमसाध्य उपयोगी' हैं, प्रबः तक उपलब्ध सस्करणों में प्राय शुद्ध भी हैं, फिर भी प्रनेक स्थल भ्रस्पप्ट हैं, मूलपाठो मे वत्ति मे कही-कही भरशुद्धता अभ्र्तर भी है। सामान्य जन के लिये दुरूह् तो हैं ही चू कि गुरुदेवश्री स्वय भ्रागमो के प्रकाण्ड पण्डित थे, उन्हे भागमो के ग्रनेक गूढार्थ ग्रुरु-गम से प्राप्त थे। उनकी मेधा भी व्युत्पन्न तक-प्रवण थी, झत वे इस कमी को प्ननुभव करते थे झौर चाहते थे कि ग्रागमों का शुद्ध, सर्वोपयोगी ऐसा प्रकाशन हो, जिससे सामान्य ज्ञानवाले श्रमण-श्रमणी एव जिज्ञासुजन लाभ उठा सके | उनके मन की यह तड़प कई बार व्यक्त होती थी। पर कुछ परिस्थितियो के कारण उनका यह स्वप्न-सकल्प साकार नही हो सका, फिर भी मेरे मन मे प्रेरणा बनकर झ्वश्य रह गया

इसी अन्तराल में आचाये श्री जवाहरलाल जी महाराज, श्रमणसघ के प्रथम आाचाय॑ जनधम दिवाकर ग्राचार्य श्री स्‍्लात्माराम जी म०, विद्वद्रत्न श्री घासीलालजी म० आदि मनीथी मुनिवरों ने प्रागमो की हिन्दी, सस्कृत, गुजराती श्रादि में सुन्दर विस्तृत टीकाये लिखकर या अपने तत्वावधान मे लिखवा कर कमी को पूरा करने का महनीय प्रयत्न किया है

एवेताम्बर मूर्तिपुजक ग्राम्नाय के विद्वान्‌ श्रमण परमश्रुतसेवी स्व० मुनि श्री पुण्यविजयजी ने भागम सम्पादन की दिशा में बहुत व्यवस्थित उच्चकोटि का कार्य प्रारम्भ किया था। विद्वानों ने उसे बहुत ही सराहा किन्तु उनके स्वर्गवास के पश्चात्‌ उस में व्यवधान उत्पन्न हो गया। तदपि प्रागमज्ञ मुनि श्री जम्बूविजयजी श्रादि के तत्वावधान में श्रागम-सम्पादन का सुन्दर उच्चकोटि का कार्य प्राज भी चल रहा है

वर्तमान में तेरापथ सम्प्रदाय में ग्राचायं श्री तुलसी एवं युवाचाय महाप्रज्ञजी के नेतृत्व में श्रागम-सम्पादन का कार्य चल रहा है भौर जो झ्ञागम प्रकाशित हुए है उन्हे देखकर विद्वानों को प्रसन्नता है। यद्यपि उनके पाठ-निर्णय में काफी मतभेद की गुजाइश है। तथापि उनके श्रम का महत्त्व है। मुनि श्री कन्हैयालाल जी म० “कमल '' भ्रागमो की वक्तव्यता को अनुयोगों मे वर्गीक्रेत करके प्रकाशित कराने की दिशा में प्रयत्नशील हैं। उनके द्वारा' सम्पादित कुछ श्रागमो में उनकी कार्यशैली की विशदता एवं मौलिकता स्पष्ट होती है

श्रागम साहित्य के व्योवृद्ध विद्वान्‌ प० श्री बेचरदास जी दोशी, विश्रुत-मनीषी श्री दलसुखभाई मालवणिया जैसे चिन्तनशील प्रज्ञापुछषष झ्लागमों के प्राधुनिक सम्पादन की दिशा में स्वय भी कार्य कर रहे है तथा भ्रनेक विद्वानों का मार्गं-दर्शन कर रहे है | यह प्रसन्नता का विषय है |

इस सब काय-शेली पर विहगम अभ्रवलोकन करने के पश्चात्‌ मेरे मन में एक सकल्प उठा आज प्राय सभी विद्वानों की कार्यशेली काफी भिन्नता लिये हुए है। कही शआ्रागमों का मूल पाठ मात्र प्रकाशित किया जा रहा है तो कही भ्रागमो की विशाल व्याख्याये की जा रही है। एक पाठक के लिये दुर्बोध है तो दूसरी जटिल सामान्य पाठक को सरलतापूर्वक भ्रागम ज्ञान प्राप्त हो सके, एतदर्थ मध्यम मार्ग का प्रनुसरण झावश्यक है। भ्रागमो का एक ऐसा सस्करण होना चाहिये जो सरल हो, सुबोध हो, सक्षिप्त और प्रामाणिक हो मेरे स्वर्गीय ग्रुर्देव ऐसा हो प्रागमम-सस्क रण चाहते थे ! इसी भावना को लक्ष्य में रखकर मैंने ५-६ वर्ष पूर्व इस विषय की चर्चा प्रारम्भ को थी,

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सुदीध चिन्तन के पश्चात्‌ वि.स २०३६ वेशाख शुक्ला दशमी, भगवान्‌ मह्लाबीर कंवल्यदिवस को यह दृढ़ निश्चय घोषित कर दिया और भ्रागबत्तीसी क। सम्पादत-विवेजन कार्य प्रारम्भ भी। इस साहसिक निर्णय मे गुरुत्ाता शासनसेवी श्री ब्रजलाल जी म. की प्रेरणा/प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मेरा प्रमुख सम्बल बना है। साथ ही अनेक मुनिवरों तथा सदुगृहस्थी का भक्ति-भाव भरा सहयोग प्राप्त हुआ है, जिनका नामोल्लेख किये बिना मन सन्तुष्ट नही होगा भरागम झनुयोग शैली के सम्पादक मुनि श्रा कन्हैयालालजी म० 'कमल”', प्रसिद्ध साहित्यकार श्री देवेन्द्रमुनिजी म० शास्त्री, झ्ाचाय॑ श्री श्रात्मा रामजी म० के प्रशिष्य भडारी श्री पदमचन्दजी म० एवं प्रवचन- भूषण श्री भ्रमरमुनिजी, विद्वद्रत्त श्री ज्ञानमुनिजी म०, स्व० विदुषी महासती श्री उज्ज्वलकु वरजी म० की सुशिष्याए महासती दिव्यप्रभाजी, एम ए. पी-एच डी, महासती मुक्तिप्रभाजी तथा विदृषी महासती श्री उमरावकु वरजी म० 'प्रच॑ंना, विश्वुत विद्वान्‌ श्री दलसुखभाई मालवणिया, सुख्यात विद्वान श्री शोभाचन्द्र जी भारिल्ल, स्व, श्री हीरालालजी शास्त्री, डा० छगनलालजी शास्त्री एबं श्रीचन्दजी सुराणा “सरस” प्रादि मनीषियो का सहयोग झागमसम्पादन के इस दुरूह कार्य को सरल बना सका हैं। इन सभी के प्रति मन भादर कृतज्ञ भावना से प्रभिभूत है इसी के साथ सेवा-सहयोग की दृष्टि से सेवाभावी शिष्य मुनि विनयकुमार एव महेन्द्र मुनि का साहचर्य-सहयोग, महासती श्री कानकु वरजी, महासती श्री कणकारकु वरजी का सेवा भाव सदा प्रेरणा देता रहा है इस प्रसग पर इस कार्य के प्रेरणा-स्नोत स्व श्रावक चिमनसिहजी लोढा, स्व श्री पुखराजजी सिसोदिया का स्मरण भी सहजरूप में हो श्राता है जिनके भ्रथक प्रेरणा-प्रयत्नो से भ्रागम समिति प्रपने कार्य मे इतनी शीघ्र सफल हो रही है। दो बर्ष के टस भ्रल्पकाल में ही दस झ्ागम ग्रन्थों का मुद्रण तथा करीब १५-२० ग्रागमों का झनुवाद-सम्पादन हो जाना हमारे सब सहयोगियो की गहरी लगन का द्योतक है

मुझे सुदृढ़ विश्वास है कि परम श्रद्धेय स्वर्गीय स्वामी श्री हजारीमल जी महाराज झ्रादि तपोपूत श्रात्माओ्रो के शुभाशीर्वाद से तथा हमारे श्रमणसघ के भाग्यशाली नेता राष्ट्र-सत भ्राचायं श्री ग्रानन्दऋषिजी म० श्रादि मुनिजनो के सदभाव-सहकार बल पर यह सकल्पित जिनवाणी का सम्पादन-प्रकाशन कार्य शीघ्र ही सम्पन्न होगा

इसी शुभाशा के साथ * सुनि सिश्रीमल “सधुकर”' (युवाचार्य )

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सम्पादकीय

(प्रथम संस्करण से )

मौलिक लेखन की अपेक्षा भाषान्तर-प्रनुबाद करने का कार्य कुछ दुरूह होता है। भाषा दूसरी भौर भाव भी स्वान्त समुद्भूत नही उन भावों को भाषान्तर मे बदलना और वह भी इस प्रकार कि झनुवाद की भाषा का प्रयाह झस्खलित रहे, उसकी मौलिकता को झ्राच आए, सरल नही है। विशेषत भ्रागम के भ्नुवाद में तो भर भी शभ्रधिक कठिनाई का पनुभव होता है। मूल ग्रागम के तात्पयं-अ्रभिप्राय-पआशय में किचित्‌ भी पग्न्यथापन शभ्रा जाए, इस ओर पद-»पद पर सावधानी बरतनी पडती है। इसके लिए पर्याप्त भाषाज्ञान भौर साथ ही आझ्ागम के ग्राशय की विशद परिज्ञा अपेक्षित है

जैनागमो की भाषा प्राकृत-भ्रद्धमागधी है नन्‍्दीसूत्र का प्रणणन भी इसी भाषा में हुआ है। यह झागम जेनजगत्‌ में परम मागलिक माना जाता है। भ्रनेक साधक-साधिकाएँ प्रतिदिन इसका पाठ करते है। झ्रतएव इसका अपेक्ष कृत अधिक प्रचलन है। इसके प्रणेता श्री देव वाचक हैं ये वाचक कौन हैं ? जैन परम्परा भे सुविख्यात देवाधगणि ही है या उनसे भिश्न ? इस विषय में इतिहासविद विद्वानों में मतभिन्नता है। पन्यास श्रीकल्याणविजय जी म० दोनो को एक ही व्यक्ति स्वीकार करते है। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होने श्रनेक प्रमाण भी उपस्थित किए है। किन्तु मुनि श्री पुण्यविजयजी ने अपने द्वारा सम्पादित नन्‍्दीसूत्र की प्रस्तावना मे पर्याप्त ऊहापोह के पश्चात्‌ इस' मान्यता को स्वीकार नही किया है

नन्‍्दीसूत्र के प्रारम्भ में दी गई स्थविरावली के भ्रन्तिम स्थविर श्रीमान्‌ दृष्यगगणि के शिष्य देववाचक इस सूत्र के प्रणेता है, यह निवियाद है! नन्दी-चूणि एवं श्रीहरिभद्र सूरि तथा श्रीमलयगिरि सूरि की टीकाझ्ो के उल्लेख से यह प्रमाणित है हे

इतिहास मेरा विषय नहीं है अतएव देववाचक झऔर देवधिगणि क्षमाश्रमण की एकता या भिन्नता का निर्णय इतिहासवेत्ताश्ो को ही भ्रधिक गवेषणा करके निश्चित करना है

अद्धंमागधी भाषा और आगमो के भाशय को निरन्तर के परिशौलन से हम यत्‌किड्चित्‌ जानते है, किन्तु साधिकार जानना और समभना झ्लग बात है उसमे जो प्रोढटता चाहिए उसका मुझ में अभाव है। श्रपनी इस सीमित योग्यता को भली-भाति जानते हुए भी मैं नन्दीसूत्र के अनुवाद-कार्य मे प्रवत्त हुई, इसका मुख्य कारण परमश्रद्धेय गुरुदेव श्रमणसघ के युवाचार्य श्री मधुकरमुनिजी म० सा० की तथा मेरे विद्यागुरु श्रीयुत प० शोभाचन्द्रजी भारिल्ल की धाग्रहपूर्ण प्रेरणा है। इसीसे प्रेरित होकर मैंने प्रनुवआादक की भूमिका का निर्वाह मात्र किया है। मुझे कितनी सफलता मिली या नहीं मिली, इसका निर्णय में विदज्जनो पर छोडती हूँ

सर्वप्रथम पूज्य झ्राचायश्री प्रात्मारामजी महाराज के प्रति सविनय झाभार प्रकट करना भ्पना परम कत्तंव्य मानती हूँ श्राचार्यश्रीजी द्वारा सम्पादित एवं अ्रनृदित नन्‍्दीसूत्र से मुझे इस अनुवाद मे सबसे शभ्रधिक सहायता मिली है। इसका मैंने अपने अनुवाद मे भरपूर उपयोग किया है। कही-कही विवेचन मे कतिपय नवीन

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विषयों का भी समावेश किया है। तथापि यह स्वीकार करने मे मुझे सकोच नहीं कि श्ाचायंश्री के प्रनुबाद को देखे बिना प्रस्तुत सस्करण को तेयार करने का कार्य मेरे लिए अत्यन्त कठिन होता

साथ ही प्पनी सुविनीत शिष्याप्रो तथा श्रीकमला जैन 'जीजी' एम० ए० का सहयोग भी इस कार्य में सहायक हुआ है पडितप्रवर श्री विजयमुनिजी म० शास्त्री ने विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावना लिख कर प्रस्तुत सस्करण की उपादेयता में वृद्धि की है। इन सभी के योगदान क॑ लिए मैं झ्ाभारी हूँ

अन्त में एक बात भ्रौर-- गच्छत स्खलन क्वापि भवत्येव प्रमादत

चलते-चलते असावधानी के कारण कही कही चूक हो ही जाती है। इस तीति के प्नुसार स्खलना की सम्भावना से इन्कार नही किया जा सकता। इसके लिए मैं क्षमाभ्यर्थी हें सुश एवं सहृदय पाठक यथोचित

सुधार कर पढेंगे, ऐसी झाशा है [] जेनसाष्वो उसरावकु वर “अ्ना'

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प्रस्लावना

(प्रथम सस्करण से)

() विजयसुनि शास्त्री आगमों को दाहनिक पृष्ठ-भूमि

वेद, जिन झौर बुद्ध-भारत की दर्शन-परम्परा, भारत की धर्म-परम्परा और भारत की सस्कृति के ये मूल-स्रोत हैं हिन्दू-धर्मं के विधवास के अनुसार वेद ईश्वर की वाणी हैं। वेदों का उपदेष्टा कोई व्यक्ति-विशेष नहीं था, स्वय ईश्वर ने उसका उपदेश किया था। प्रथवा वेद ऋषियों की बाणी है, ऋषियो के उपदेशों का सग्रह है। वैदिक परम्परा का जितना भी साहित्य-विस्तार है, वह सब वेद-मूलक है। वेद और उसका परिवार सस्क्ृत भाषा में है। भत वेदिक-सस्कृति के विचारों की अभिव्यक्ति सस्कृत भाषा से ही हुई है!

बुद्ध ने अपने जीवनकाल में अपने भक्तों को जो उपदेश दिया था--त्रिपिटक उसी का सकलन है बुद्ध की वाणी को त्रि-पिटक कहा जाता है। बौद्ध-परम्परा के समग्र विचार प्लौर समस्त विश्वासों का मूल त्रि-पिटक है बौद्ध-परम्परा का साहित्य भी बहुत विशाल है, परन्तु पिटको मे बौद्ध सस्कृति के विचारों का समग्र सार जाता है। बुद्ध ने अपना उपदेश भगवान्‌ महावीर की तरह उस युग की जनभाषा में दिया था बुद्धिवादी वर्ग की उस युग में, यह एक बहुत बडी क्रान्ति थी बुद्ध ने जिस भाषा में उपदेश दिया, उसको पालि कहुते हैं अत पिठको की भाषा, पालि भाषा है

जिन की थाणी को अथवा जिन के उपदेश को झागम कहा जाता है। महाबीर की वाणी--प्रागम है जिन की वाणी मे, जिन के उपदेश में जिनको विश्वास है, वह जैन है। राग और द्वंष के विजेतां को जिन कहते हैं। भगवात्‌ महावीर ने राग शौर द्वेष पर विजय प्राप्त की थी। अत वे जिन थे, तीर्थकर भी थे। तीर्थंकर की वाणी को जैन परम्परा मे आमम कहते है। भगवान्‌ महावीर के समग्र धिचार भौर समस्त विश्वास तथा समस्त भ्राचार का सह जिसमें है उसे द्वादशागवाणी कहते हैं। भगवान्‌ ने अपना उपदेश उस युग की जन- भाषा में, जन-बोली में दिया था। जिस भाषी में भ्रगवान्‌ महावीर ने अपना विश्वास, अपना विचार, अपना झ्राचार व्यक्त किया था, उस भाषा को अं-मागधी कहते हैं। जैन परम्परा के विश्वास के अनुसार भर्ध- मागधी को देव-वाणी भो कहते है। जैन-परम्परा का साहित्य बहुत विशाल है। प्राकृत, सस्कृत, अपभ्र श, गुजराती, हिन्दी, तमिल, कन्नढ़, मराठी भ्लोर प्नन्य प्रान्तीय भाषाओं में भी विराट साहित्य लिखा गया है। आगम-युग का कालसमान भगवान्‌ महावीर के निर्वाण अर्थात्‌ विक्रम पूर्व ७७० से प्रारम्भ होकर प्राय एक हजार वर्ष तक जाता है। वैसे किसी किसी रूप में आगम-युग की परम्परा वर्तमान युग में चली रही है। आगमों मे जीवन सम्बन्धी सभी विषयो का प्रतिपादन किया गया है। परन्तु यहाँ पर आगमकाल में दर्शन

की स्थिति क्या थी, यह बतलाना भी अभीष्द है। जिन प्रागमों में दर्शन-शारुत्र के मूल तत्वों का प्रतिपादन किया गया, उनमें से मुख्य आगम हैं--सूत्रकृताग, भगवती, स्थानांग, समवायाग, प्रज्ञापना, राजप्रश्नीय, नदी और अनुयोगद्वार सूत्रकृताग में तत्कालीन अन्य दार्शनिक विचारों का निराकरण करके स्वमत की प्ररूपणा की गई है। भूतवादियों का निराकरण करके प्रात्मा का अस्तित्व बतलाया है ब्रह्मवाद के स्थान मे नानाआत्मवाद स्थिर किया है जीव और शरीर को प्रथक्‌ बतलाया है। कर्म और उसके फल की सत्ता स्थिर की है। जगत्‌ उत्तत्ति के विषय में नाना वादों का निराकरण करके विश्व को किसी ईश्वर या अन्य किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया, बह तो अनादि-अनन्त है--इस सिद्धान्त की स्थापना की गई है। तत्कालीन क्रियावाद, अक्रियावाद, विनयवाद और अज्ञानवाद का निराकरण करके विशुद्ध क्रियावाद की स्थापना की गई है। प्रज्ञापना मे जीव के विविध भावों को लेकर विस्तार से विचार किया गया है। राजप्रश्नीय में पाश्वंताथ की परम्परा के अनुयायी केशीकुमार श्रमण ने राजा प्रदेशी के प्रश्नो के उत्तर में नास्तिकवाद का निराकरण करके आत्मा और तत्सम्बन्धी भ्रनेक तथ्यो को €ृष्टान्त एक युक्तिपृवंक समझाया है। भगवती सूत्र के अनेक प्रश्नोत्तरो में नय, प्रमाण झौर निक्षेप आदि अनेक दर्शनिक विचार बिखरे पड़े हैं। नन्‍्दीसूत्र जेन दृष्टि से ज्ञान के स्वरूप और भेदो का विश्लेषण करने वाली एक सुन्दर एवं सरल क्ृति है। स्थानाग और समवायाग की रचना बौद्ध-परम्परा के अगुतर-निकाय के ढंग की है। इन दोनो मे भी आत्मा, पुद्गल, ज्ञान, नय, प्रमाण एव निश्षेप प्रादि विषयों की चर्चा की गई है। महावीर के शासन में होने वाले अन्यथावादों निक्वों का उल्लेख स्थानाग में है। इस प्रकार के सात व्यक्ति बताये गये हैं, जिन्होने कालक्रम से महावीर के सिद्धाग्तो की भिन्न-भिन्न बातो को लेकर मतभेद प्रकट किया था। अनुपोगद्वार में शब्दार्थ करने की प्रक्रिया का वर्णन मुख्य है। किन्तु यथाप्रसग उसमे प्रमाण, नय एव निक्षेप पद्धति का प्रत्यन्त सुन्दर निरूपण हुआ है। आगभ-प्रासाण्य से सतभेद

आगम-प्रामाण्य के विषय मे एकमत नही है। श्वेताम्बर स्थानकवासी परम्परा ११ अगर, १२ उपाग, मूल, छेद, और आवश्यक, इस प्रकार ३२ आगमो को प्रमाणभूत स्वीकार करती है। शेष आगमों को नहीं इनके अतिरिक्त निर्युक्ति, भाष्य, चूंणि और दीकाग्नों को भी सर्वाशत प्रमाणभूत स्वीकार नहीं करती दिगम्बर परम्परा उक्त समस्त प्रागमों को अमान्य घोषित करती है। उसकी मान्यता के अनुसार सभी आगम लुप्त हो चुके है दिगम्बर-परम्परा का विश्वास है, कि वीर-निर्वाण के बाद श्रुत का क्रम से हास होता गया यहाँ तक हराम हुप्ला कि वीर-निर्वाण के ६८३ वर्ष के बाद कोई भी अग्रधर अथवा पूवंधर नहीं रहा अग प्र पूर्व के अशधर कुछ आचार्य अवश्य हुए हैं। अग और पूर्व के अश-ज्ञाता आचायों की परम्परा में होने वाले पुष्पदन्त, और भूतबलि आचार्यों ने 'बट्‌ खण्डागम' की रचना--द्वितीय अग्रायणीय पूर्व के अश के आधार पर की, और श्राचार्य गुणघर ने पाँचवें पूर्व ज्ञानप्रवाद के अश के आधार पर 'कषायपाहुड' की रचना की भूतबलि आचाय ने 'महाबन्ध' की रचना की। उक्त झआगमों में निहित विषय सुक््य रूप से जीव भोर कम है। बाद मे उक्त प्रस्यो पर आचार्य वीरसेन ने धवला ध्लौर जयध्षवला टोका रची यह टीका भी उक्त परम्परा को मान्य है। दिगम्बर परम्परा का सम्पूर्ण साहित्य आचार्यों द्वारा रचित है। आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा प्रणोत ग्रत्थ--समथमार, प्रवचनसार, पचास्तिकायसार एव नियमसार आदि भी दिगम्बर-परम्परा में श्रागमवत्‌ मान्य हैं। आचार्य नेभिचन्द्र सिद्धान्त- चक्रवर्ती के ग्रन्थ---'गोम्मटसार,' 'लब्धिसार' ओर “द्रब्यसग्रह”* आदि भी उतने ही प्रमाणभूत और मान्य हैं आधाय कुन्दकुन्द के प्र्थो पर आचाय॑ अमृतचन्द्र ने पश्रत्यन्त प्रौढ एवं गम्भीर टीकाएँ लिखी हैं। इस प्रकार दिगम्बर आगम-साहित्य भले हो बहुत प्राचीन हो, फिर भी परिमाण मे वह विशाल है। उबर और सुन्दर है

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आग्मों का व्यास्या-साहित्य

श्वेताम्बर-परम्परा द्वारा मान्य ४५ पश्रागमों पर व्याख्या-साहित्य बहुत व्यापक एवं विशाल है। जैन-दर्शन का प्रारम्भिक रूप ही इन व्यास्यात्मक ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं होता, बल्कि दर्शन-तत्त्व के गम्भीर से गम्भीर विचार भी झागम साहित्य के इन ब्याख्यात्मक साहित्य में उपलब्ध होते हैं। आगमो की व्याख्या एव दीका दो भाषा में हुई है--प्राकृत और सस्क्ृत प्राकृत टीका--निर्युक्ति, भाष्य और चृणि के नाम से उपलब्ध है | निर्यूक्ति और भाष्य पद्यमय हैं और चूणि ग़द्यमय है। उपलब्ध निर्युक्तियों का अधिकाश भाग भव्रबाहु द्वितीय की रचना है। उनका समय विक्रम भवी या ६6ी शताब्दी है। निर्युक्तियों मे भद्बबाहु ने भ्रनेकः स्थलों पर एवं अनेक प्रसगो पर दाशंनिक तत्वों की चर्चाएँ बड़े सुन्दर ढंग से की हैं। विशेष कर बोौद्धों प्रौर चार्वाको के विषय मे निर्यक्ति मे जहाँ कही भी अवसर मिला उन्होंने खण्डन के रूप में प्रवश्य लिखा है। श्रात्मा का प्रस्तित्व उन्होने सिद्ध किया ज्ञान का सूक्ष्म निरुषण तथा अहिसा का तात्विक विवेचन किया है। शब्दों के अर्थ करने की पद्धति में तो वे निष्णात थे ही प्रमाण, नय प्रौर निक्षेप के विषय में लिखकर भद्रबाहु ने जैन-दर्शन' की भूमिका पक्‍की की है

किसी भी विषय की चर्चा का अपने समय तक का पूर्ण रूप देखना हो तो भाष्य देखना चाहिए भाष्यकारो में प्रसिद्ध श्राचायं सघदास' गणि भौर आचाय॑ क्षमाश्रमण जिनभद्र हैं। इनका समय सातवी शताब्दी है। जिनभद्र ने 'विशेषावश्यक भाष्य” में ग्राममिक पदार्थों का तकंसगत विवेचन किया है। प्रमाण, नय, और निक्षेप की सम्पूर्ण चर्चा तो उन्होंने की ही है, इसके अतिरिक्त तत्वों का भी तात्विक रूप से एवं युक्तिसगत विवेचन उन्होने किया है। यह कहा जा सकता है कि दाशंनिक चर्चा का कोई ऐसा विषय नहीं है जिस पर आचारये जिनभद्द क्षमाश्रमण ने अपनी समर्थ कलम चलाई हो 'बहृत्कल्प' भाष्य में आचार्य सघदास गणि ने साधुभो के झ्राचार एबं विहार आदि के नियमों के उत्सर्ग-अपवाद मार्ग की चर्चा दार्शनिक ढग से की है। इन्होने भी प्रसगानुकूल ज्ञान, प्रमाण, नय ओर निक्षेप के विषय में पर्याप्त लिखा है। भाष्य साहित्य वस्तुत आगम-युगीन दार्शनिक जिचारों का एक विश्वकोष है

लगभग ७वी तथा ८वीं शताब्दियो की चूणियों में भी दार्शनिक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। चूणिकारों मे आचाय॑ जिनदास महृत्तर बहुविश्वुत एव प्रसिद्ध हैं। इनकी सबसे बडी चूणि 'निशीय चूणि' है जेन ग्रागम साहित्य का एक मी विषय ऐसा नहीं है, जिसकी चर्चा सक्षेप मे अथवा विस्तार में निशीथ चूणि में की गई हो 'निशीथ चुणि' में क्या है ”? इस प्रश्न की भ्रपेक्षा, यह प्रश्न करना उपयुक्त रहेगा, कि 'निशीय चूणि' में क्या नही हैं। उसमे ज्ञान और विज्ञान है, आचार और विचार हैं, उत्सगं और श्रपवाद हैं, धर्म भौर दश्शेत हैं भौर परम्परा और सस्कृति हैं। जैन परम्परा के इतिहास की ही नहीं, भारतीय इतिहास की बहुत सी बिछरी कड़ियाँ 'निशीय चूरणि' में उपलब्ध हो जाती हैं। साधक जीवन का एक भी अग ऐसा नहीं है, जिसके विषय में चुणिकार की कलम मौन रहो हो यहाँ तक कि बौद्ध जातकों के ढंग की प्राकृत कथाएँ भी इस चूथणि मे काफी बडी सख्या में उपलब्ध हैं। अहिंसा, प्रमेकान्त, श्रपरिग्रह, ब्रह्मचयं, तप, त्याग एवं सपम--इन सभी विषयो पर झाचाय॑ जिनदास महृत्तर ने अपनी सर्वाधिक विशिष्ट कृति 'निशीय चूणि' को एक प्रकार से विचार- रत्नो का महान्‌ आकर ही बना दिया हैं। 'निशीष चुणि' ज॑न परम्परा के दाशंनिक साहित्य में भी सामान्य नहीं एक विशेष कृति है, जिसे समझना आवश्यक है

जैन प्रागमों की सबसे प्राचीन ससस्‍्क्ृत टीका आचाय॑ हरिभद्र ने लिखी है। उनका समय ७५७ विक्रम से ८५५७ के बीच का है। हरिभद्व ने प्राकृत चूणियो का प्रायः सस्कृत मे अनुवाद ही किया है। कह्दी-कहीं पर

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झपने दाशंतिक झान का उपयोग करना भी उन्होंने ठीक समका है। उतकी दीकाओ में सभी दर्शनों की पूर्व पक्ष रूप से चर्चा उपलब्ध होती है। इतना ही नही, किन्तु जैन-तत्त्व को दाशंनिक शान के बल से निश्चित-रूप मे स्थिर करने का प्रयत्त भी देखा जाता है। हरिभद्र के बाद आचार शीलाकसूरि ने १०वीं शताब्दी में आचारांग झौर सूत्रकृताग पर सस्कृत टीकाप्नो की रचना की। शीलाक के बाद प्रसिद्ध टीकाकार आचायं शान्ति हुए उन्होंने उत्तराध्ययन की बहत्‌ टीका लिखी है। इसके बाद प्रसिद्ध टीकाकार अभयदेव हुए जिन्होंने नौ अगो पर सस्कृत भाषा मे टीकाएँ रची हैं। उनका जन्म समय विक्रम १०७२ में और स्वर्गवास विक्रम ११३४५ मे हुआ इन दोनों टीकाकारों ने पूर्व टीकाश्नो का पूरा उपयोग तो किया ही है, अपनी ओर से भी कही-कही नयी दाशंनिक चर्चा की है। यहाँ मल्लधारी हेमचन्द्र का नाम भी उल्लेखनीय है वे १२वीं शताब्दी के महान्‌ विद्वान थे। परन्तु आगमों की सस्क्ृत टीका करने वालो में सर्वश्रेष्ठ स्थान तो आचाये मलयगिरि का ही है। प्राब्जल भाषा में दार्शनिक चर्चाओों से परिपूर्ण टीका यदि देखना हो, तो मलयगिरि की टोकाएँ देखनी चाहिए। उनकी टीकाएँ पढने में शुद्ध दाशंनिक ग्रन्थ पढने का भातन्द आता है। जैन-शास्त्र के धर्म, श्राचार, प्रमाण, नय, निक्षेप ही नहीं भूगोल एवं खगोल आदि सभी विषयो में उनकी कलम घाराप्रवाहु से चलती है भ्रौर विषय को इतना स्पष्ट करके रखती है कि उस विषय में दूसरा कुछ देखने की आवश्यकता नहीं रहती। ये आचाय॑ हेमचन्द्र के समकालीन थे भत इनका समय निश्चित रूप से १२वीं शताब्दी का उत्तराध एव १३वीं शताब्दी का प्रारम्भ माना जाना चाहिए

संस्कृत प्राकृत टीकाओ का परिमाण इतना बडा है, श्लौर विषयों की चर्चाएँ इतनी गहन एवं गम्भीर हैं, कि बाद में यह आवश्यक समझा गया, कि आगमो का शब्दार्थ करने वाली सक्षिप्त टीकाएँ भी हो समय की गति ने सस्क्ृत प्राकृत भाषाओं को बोल-चाल की जन भाषाओं से हुटाकर मात्र साहित्य की भाषा बना दिया था। अत तत्कालीन अपभ्र भाषा में बालावबोधो की रचना करने वाले बहुत हुए हैं, किन्तु अठारहवी शती में होने वाले लोकागच्छ के धर्मेसिह मुनि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। क्योकि इनकी इष्टि प्राचीन टीकाओ के अर्थ को छोडकर कही-कही स्व-सम्प्रदाय-सम्मत अर्थ करने की भी रही है। आगमसाहित्य की यह बहुत ही' सक्षिप्त रूपरेखा यहाँ प्रस्तुत की है। इसमे आगम के विषय मे मुख्य-मुद्य तथ्यो का एवं आग्रम के दाशंतिको तथ्यो का सक्षेप में सकेत भर किया है। जिससे आगे चलकर आगमो के गुरु गभीर सत्य-तथ्य को समभने में सहजता एव सरलता हो सके इससे दूसरा लाभ यह भी हो सकता है कि अध्ययनशील प्रष्येता आगमो के ऐतिहासिक मूल्य एवं महत्त्व को भली-भाँति भ्रपनी बुद्धि की तुला पर तोल सकें। निश्चय ही श्रागम कालीन दाशंनिक तथ्यो को समझने के लिए मूल आगम' से लेकर सस्क्ृत टीका पर्यन्त समस्त आगमो के भ्रध्ययन की नितान्त' भ्रावश्यकता है

आगमों के दाह निक-तत्त्य

मूल प्रागमों में क्या-क्या दाशेनिक-तत्त्व हैं, और उनका किस प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? उक्त प्रश्नो के समाधान के लिए यह आवश्यक हो जाता है, कि हम आगमगत दाशंलिक विचारों को समभने के लिए अपनी दृष्टि को व्यापक एवं उदार रखें, साथ ही श्रपनी ऐतिहासिक दृष्टि को भी विलुप्त होने दें जिस प्रकार वेदकालीन दर्शन की अपेक्षा उपनिषदू-कालीन दर्शन प्रौढतर हैं, भौर गीता-कालीन दर्शन प्रौदतम माना जाता है, उसी प्रकार जैन दर्शन के सम्बन्ध मे यही विचार है, कि आगमकालीन दर्शन की अपेक्षा आगभ के व्याख्या- साहित्य में जेन दर्शन प्रौढ़तर हो गया है औौर तत्त्वाय सूत्र में पहुँच कर प्रौदतम यहाँ पर हमे केवल यह देखना है, कि मूल ्रागमो मे और गौण रूप से उसके व्यास्या-साहित्य मे जैन दर्शन का प्रारम्भिक रूप क्या और कंसा

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रहा है ? आगम-कालीन दर्शन को दो भागों मे विभाजित किया जा सकता है--प्रमेय और प्रमाण अथवा जेय भौर शान जहाँ तक प्रमेय और ज्ञेय का सम्बन्ध है, जैन भ्रागामों में स्थान-स्थान पर अनेकान्त दृष्टि, सप्तभगी, मय, निक्षेप, द्रव्य, गुण, पर्याय, तत्व, पदार्थ, द्रव्य-क्षेत्र-काल एवं भाव, निश्चय और व्यवहार निमित्त और उपादान-नियति और पुरुषार्थ, कर्म और उसका फल, आचार और योग आदि विषयों का बिखरा हुआ वर्णन आगमो में उपलब्ध होता है। श्रव रहा इसके विभाग का प्रशत ! उसके सम्बन्ध में यहाँ पर संक्षेप. में इतना ही कहना है, कि ज्ञान का और उसके भेद-प्रभेदों का व्यापक रूप से वर्णन आगमो में उपलब्ध है। ज्ञान के क्षेत्र का एक भी अग और एक भी भेद इस प्रकार का नहीं है, जिसका वर्णन आयम और उसके व्याख्या साहित्य मे पूर्णता के साथ नही हुआ हो प्रमाण के सभी भेद और उपभेदों का वर्णन आगमो में उपलब्ध होता है। जैप्ते कि प्रमाण धौर उसके प्रत्यक्ष एव. परोक्ष भेद तथा प्नुमान और उसके सभी अग, उपमान और शब्द प्रमाण आदि के भेद भी मिलते हैं। नय के लिए झ्रादेश एवं दृष्टि शब्द का प्रयोग भी अति प्राचीन आगमो मे किया गया है। नय के द्रव्याथिक और पर्यायाथिक भेद किये गये हैं। पर्यायाथिक के स्थान पर प्रदेशाथिक शब्द प्रयोग भी अनेक स्थानों पर आया है। सकलादेश और विकलादेश के रूप मे प्रमाण सप्तभगी एवं नय सप्तभगी का रूप भी आगम एवं व्याख्या साहित्य मे उपलब्ध होता है नाम, स्थापना, द्रव्य, और भाव--इन चार निक्षेपों का वर्णन अनेक प्रकार से दिया गया है। स्यादह्वाद एवं अनेकान्त को सुन्दर ढंग से बतलाने के लिए पुस्कोकिल के स्वप्न का कथन भी रूपक का काम करता है। जीब की नित्यता एवं भ्रनित्यता पर विचार किया गया है। न्याय-शास्त्र में प्रसिद्ध वाद, वितण्डा और जल्प जैसे शब्दों का ही नही, उनके लक्षणों का विधान भी आगमों के व्याख्यात्मक साहित्य में प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रमाण खण्ड में अथवा ज्ञान सम्बन्धी तस्वों का वर्णन आगमों में अनेक प्रसगो में उपलब्ध होता है। जिसे पढकर यह जाना जा सकता है, कि आगम काल में जैन परम्परा की दाश्शनिक दृष्टि क्या रही है। आगम काल में पट्द्वव्य और नव पदार्थों का वर्णन किस रूप में मिलता है और भ्रागे चल कर इसका विकास और परिवतंन किस रूप में होता है ? निश्चय ही जैन परम्परा का श्रागमकालीन दर्शन वेदकालीन वेद-परम्परा के दर्शन से प्रधिक विकसित और अधिक व्यवस्थित प्रतीत होता है। वेद-कालीन दर्शन में और आगमकालीन दर्शन भे बडा भेद यह भी है, कि यहाँ पर वेद की भाँति बहु-देववाद एव प्रकृतिवाद कभी नहीं रहा जेन-दर्शन अपने प्रारम्भिक काल से ही अथवा अपने श्रत्यन्त प्राचीन काल से आध्यात्मिक एवं तात्तविक' दर्शन रहा है

प्रमेष-विचार

दर्शन-साहित्य मे प्रमेय एव ज्ञेय दोनो शब्दो का एक ही अर्थ है। प्रमेय का भ्रर्थ है--जो प्रमा का विषय हो शेय का अर्थ है---जो ज्ञान का विषय हो सम्यकज्ञान को ही प्रमा कहा जाता है। ज्ञान विषयी होता है ज्ञान से जो जाना जाता है, उमको विषय प्रथवा ज्ञेय कहा जाता है। किसी भी ज्ेय और किसी भी प्रमेष का जान जैत परम्परा में अनेकान्त दृष्टि से ही किया जाता है। जेन-दर्शन के प्रनुसार जब किसी भी विषय पर, किसी भी वस्तु पर प्रथवा किसी भी पदार्थ पर विचार किया जाता है तो अनेकान्त इष्टि के द्वारा ही उस का सम्यक्‌ निर्णय किया जा सकता है। प्राचीन तत्त्वव्यवस्था मे, जो भगवान्‌ महावीर से पूर्व पाश्वंनाथ परम्परा से ही चली रही थी, महावीर युग मे उसमे कया नयापन श्राया, यह एक विचार का विषय है! जैन अनुश्नति के अनुसार भगवान्‌ महावीर ने किसी नये तत्त्वदर्शन का प्रचार नहीं किया, किल्तु उनसे २५० वर्ष पूर्व होने वाले तीर्थंकर परमयोगी पाश्वनाथ सम्मत आचार में तो महावीर ने कुछ परिवतेन किया है, जिसकी साक्षी श्रागम दे रहे हैं, किन्तु पाश्वंनाथ के तत्त्व ज्ञान मे उन्होंने किसी भी प्रकार का परिवर्तेत नही किया था। पाँच ज्ञान, चार निक्षेप, स्व-चतुष्टय एवं पर-चतुष्टय, षट द्रव्य, सप्त-तत्व, नव-पदार्थ एवं पचर अस्तिकाय--इनमे किसी भो

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प्रकार का परिवतंन भद्दावीर ने नहीं किया कर्म और झात्मा की जो मान्यता पााश्वंताथ-युग में और उससे भी पूर्व जो ऋषभदेव युग भौर अरिष्टनेमि युग मे थी उसमे किसी प्रकार का परिवर्तत महावीर ने किया हो, अभी तक ऐसा उल्लेख नहीं मिलता है। गुणस्थान, लेश्या, एवं ध्यात के स्वरूप मे किसी प्रकार का भेद एवं अन्तर भगवान्‌ महावीर ने नहीं डाला। यह सब प्रमेय विस्तार जैन-परम्परा में महावीर से पूर्व भी था। फिर प्रश्न होता है, महावीर ने जैन-परम्परा को अपनी क्‍या नयी देन दी ? इसका उत्तर यही दिया जा सकता है, कि भगवान्‌ महाबीर ने नय गौर अनेकान्त इृष्टि, स्थाद्वाद और सप्तभगी जैन दर्शन को नयी देन दी है। महावीर से पूर्व के साहित्य में एवं परम्परा में अनेकान्त एवं स्थाद्वाद के सम्बन्ध मे उल्लेख मिलता हो, यह प्रमाणित नहीं होता महावीर के युग मे स्वय उनके ही अनुयायी प्रथवा उस युग का श्रन्य कोई व्यक्ति, जब महावीर से प्रश्न करता तब उसका उत्तर भगवान्‌ महावीर अनेकान्त इृष्टि एवं स्पाद्वाद की भाषा में ही दिया करते थे। भगवान्‌ महावीर को केवल- ज्ञान होने से पहले जिन दस महास्वप्नों का दर्शन हुआ था, उसका उल्लेख भगवती सूत्र में हुआ है। इन स्वप्नो मे से एक स्वप्न में महावीर ने एक बड़े चित्र-विचित्र पाँख वाले प्ुस्कोकिल को स्वप्न में देखा था। उक्त स्वप्न का फल यह बताया गया था, कि महावीर आगे चलकर चित्र-विचित्र सिद्धान्त (स्व१२-सिद्धान्त) को बताने वाले द्वादइशाग का उपदेश करेंगे। बाद के दाशंनिको ने चित्रज्ञान और चित्रपट को लेकर बौद्ध और न्याय वेशेषिक के सामने प्रनेकान्त को सिद्ध किया है। उसका मूल इसी में सिद्ध होता है। स्वप्न में दृष्ट पुस्कोकिल की पाँखो को चित्र-विचित्र कहने का और आगमो को विचित्र विशेषण देने का विशेष प्रभिप्राय तो यही