उपन्यास 7र तोरद्म-लींीवन

उपन्यास ऋरिर लोक-जीवन

लेखक रैल्फ फॉक्स

भूमिका लेखक * डॉ० रामबविलास शर्मा

पीपुल्स पव्लिशिंग हाउस (प्रा.) लिमिटड एम. एम, रोड, नई दिल्ली.

पहला हिन्दी सस्कररा प्रक्तूबर, १६५७

अनुवादक

नरोत्तम नागर

मूल्य चार रुपया

डी पी सिन्हा द्वारा न्यू एज प्रिंटिंग प्रेल, एम एम रोड, नई दिल्ली में मुद्रित झोर उन्हीं के द्वारा पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा) लिमिटेड, नई दिल्‍ली की तरफ से प्रकाशित

भूमिका

रेल्फ फोकस यदि जीवित होते तो आब सत्तावन वर्ष के होते। बायरन की तरह ब्रिटेन के वाहर स्वाधीनता के लिए लड़ते हुए. छत्तीस बर्ष की अवस्था में उन्होंने प्राण दिये | वह लेखक होने के साथ सक्रिय राजनीतिक कायेकती भी थे। यूरोप में नवचागर्ण काल के सिडनी, चेन जॉनसन ओर मिल्टन की तरह उनका जीवन बहुमुखी था। हिंसक फासिस्तवाद के विरुद्ध कलम के साथ तलवार उठाने में उन्हें जरा भी हिचक थी। फॉक्स को अपने देश की सास्क्ृतिक परम्परा पर गये था | उनके बलिदान में १६-१७ वीं सदी के नवजागरण ओर बीसवीं सदी के श्रमिक अम्युत्यान की परम्पराएं मिल गयी थीं |

पूबीवाद के हिंसक और युद्धल्ोलुप श्रभियान के विरुद्ध फॉक्स ने स्पेन में सघर्य किया वह विश्वशान्ति के लिए लड़नेवाले योद्धा ये | इस कारण भारत की शान्ति-प्रेमी जनता के हृदय में उनके लिए आदर ओर सम्मान होना स्वाभाविक है। आदर के साथ उनके प्रति स्नेह और कृतजता का माव मी होना चाहिए वह अन्य उपनिवेशों के साथ भारत की स्वाधीनता के भी प्रवल समर्थक थे | अपने चारिस्ट पूर्वजों की तरह वह मी भारत की स्वाधीनता के विना ब्रिटेन के मजदूर वर्ग का उद्धार असमव समझते थे। “ब्रिटिश साम्राज्यवाद की श्रीपनिवेशिक नीति” नाम की कृति में उन्होंने जिखा था: “भारत तथा अन्य डप- निवेशों में जन-क्रान्ति के विना समाजवादी ब्रिटेन की कल्पना नहीं की था सकती ।” ब्रिटेन के ऋ्रान्तिकारों मजदूर वगे की इस आवाज को बहा का पूजीवाद कभी भी पूरी तरह नहीं दवा पाया |

फॉक्स के लिए मानव-जीवन आर साहित्य का सम्बंध अटूट था। वह जिस उत्साह से मानव-जीवन को बदलने के लिए काम करते थे, उसी

का

उत्साह से साहित्य के बारे में मी लिखते थे। वह भावना-शुन्य वर्गे- विश्लेषक ओर आकड़ेबाज आलोचक थे। साहित्य के बारे में उन्होंने जो कुछ लिखा है, उसमें उनका छृदय बोलता है। पाठक को विश्वास हो जाता है कि उन्होंने साहित्य को अपनी मार्मिक संवेदना और द्ृदय की प्रूर्ण निष्ठा से श्रपनाया है | इस सवेदना के कारण ही वह “सोन्द्य- वादी कवि कीट्स के युगान्तरकारी महत्व को परख सके। श्रधिकाश आलोचकों ने कीट्स को जीवन से तठस्थ रहनेवाले काल्पनिक सौन्दर्य: स्वप्नों के उपासक के रूप में देखा है। इस पुस्तक के तीसरे अध्याय में फॉक्स ने लिखा है कि प्रतिक्रियावादी आलोचकों ने जिस प्रचढ घणा से कीट्स को कोसा, वैसी घुणा से उन्होंने वायरन और शेली को भी कीसा था केवल फॉक़्स ही लिख सकते थे कि कीट्स ने ““हाइपीरियन ? की श्रपूर्ण कविता में क्रान्तिकारी सघर्ष का सारतत्व दे दिया हे। एक माक्तवादी आलोचक के स्वतत्र चिंतन और उसकी सवनात्मक प्रतिमा का यह प्रमाण है|

माक्तवाद ओर साहित्य के सम्बंध पर अपने विचार प्रकट करने के अलावा फॉक्स ने यूरोप के अनेक उपन्यासकारों की रचनाओं का विश्लेषण किया है। वह एक अग्रज देशभक्त होने के साथ सच्चे अन्तरराष्ट्रीयतावादी ये | बालजाक, तोल्स्तोय और गोर्की उनके लिए सर्वश्रष्ठ उपन्यासकार थे ये तीनों लेखक ब्रिटेन के बाहर के थे। सोवियत समान के प्रशसक ओर समर्थक होते हुए भी फॉक्स ने सोवियत उपन्यास- कारों के बारे मे लिखा था कि ये लेखक हमारी मानव सम्बधी जानकारी नहीं बढाते, वे वास्तव में हमारी चेतना और संवेदना का प्रसार नहीं करते | जो लोग समभते हैं कि माक्सवादी आलोचक सोवियत सघ की किसी भी चीन कि आलोचना नहीं करते, थे फॉक्स के शब्दों पर ध्यान दे सकते हैँ। फॉक्स की स्पष्टवादिता अन्तरराष्ट्रीय भाईचारे का खडन नहीं करती, वरन्‌ उसे और दृढ करती दे) फरॉक्स ने सोवियत उपन्यास- कार्गो की सामियों को कुछ वढा-चदाकर देखा है, यह्द दूसरी वात है |

साथ ही फंक्स को अपनी भाषा के साहित्य पर जातीय गये था| अग्रेज़ी सस्कृति, अ्रग्रेजी सभ्यता, अ्रग्रेज्ी साहित्य पर गयव हमारे देश

स्व

में इन वस्तुओ्नों का सम्बंध अग्रेज शासक वर्ग ओर उसके चाकरों से अधिक रहा हे। अग्रेज वेसे ही देशभक्त हो सकता है जैसे कोई भी मारतवाती वह अपनी सत्कृति पर वैसे ही उचित गव॑ कर सकता है जैसे हम मारतीय सस्कृति पर करते हैँ। फॉक्‍्स ऐसे ही अग्रेज देशभक्तों में थे। उन्होंने अपने देश के प्रगतिशील लेखकों को साहित्यिक परम्परा पर गवे करना सिखाया | चरित्रचित्रण के लिए. जब सोवियत लेखक शेक्सपियर को आदर्श रूप मे सामने लाते हैं त्तो फॉक्स को स्वाभाविक उल्लास होता है। श्८ वीं सदी के उपन्यासकार फील्डिग की प्रशंसा करते वह नहीं थकते |

यह देश भक्ति, फॉक्स की अन्तरराष्ट्रीयता, साहित्य के प्रति उनका सच्चा अनुराग, उनका उत्त्माह ओर उल्लास ओर स्पष्टवादिता सभी लेखकों के लिए अनुकग्णीय हैं

फॉक्स ने साहित्य की समस्याश्रों पर मारक्सवादी दृष्टिफोण से विचार किया है | इस सिलसिले में उन्होंने मार्तस ओर एगेल्स की स्थापनाओं को स्पष्ट रूप से पाठकों के सामने रखकर कुछ श्रान्तियों को दूर किया है कुछ लोग समभझते हैं कि माक्सवाठ के अनुसार कलाकृतिया आर्थिक प्रक्रियाश्ों और आवश्यकताश्रों का प्रतिविंत्र मात्र हैं | इस सम्बंध में फॉक्स ने जोर देकर कहा है कि यह माक्सवाद का इृष्टिकोश नहीं है, यद्यपि उन्‍नीसवीं सदी के कुछ मौतिकवादी ऐसा सोचते थे। वह मामानिक विकास से उदाहरण देकर कहते हैं कि सामन्‍्ती उत्पादन- पद्धति की तुलना में पूजीवादी उत्पादन पद्धति प्रगतिशील है, इससे मार्क ने यह परिणाम निकाला था कि सामन्‍्ती कला की तुलना में पूजीवादी कला अधिक ऊचे स्तर की होगी ही | कला श्रार्थिक आधार से काफ़ी दूरी पर स्थित होती है, आशिक आधार में जो परिवर्तेन होते हूँ उनसे कला सीघे-सीचे ओर तुरत प्रमावित नहीं होती |

इस दूरो का कारण कया है आर्थिक अ्रोर राजनीतिक विचारधारा की तरदद कला में भी शीघ्र परिवतेन क्‍यों नहीं होते ? इसका कारण विचारधारा ओर कला का परस्पर सम्बंध है। सभी ललित कलाओं में विचारघारा का महत्व समान रूप से नदी होता। भाषा के बिना विचारों

की व्यजना नहीं होती जिन ललित कलाओ में भाषा का प्रयोग नहीं होता, उनमें विचारों का अमाव होना भी अनिवार्य दे। साहित्य में भाषा का प्रयोग होता है, इसलिये अन्य ललित कलाशों की अपेक्षा उसमे विचारधारा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। किन्तु साहित्य विचारों का सकलनमात्र नहीं हे अन्य ललित कलाओं के साथ उसकी विशेषता है, भावों और इच्धियवोध को व्यक्त करने की क्षुमता। वह एक ओर हमें भावविद्ववल करता है तो दूसरी ओर हमारे इन्द्रियबोध को त्ष्ट करता है, हमारे रूप, रस, गन्घ, स्पर्श, शब्द आदि के सस्कारों को परिष्कृत करता है। मनुष्य के विचारजगत में भी ऐसा परिवतेन नहीं होता कि परम्परा से एकब्वारगी सम्बंध हूट जाव | भावों ओर इन्द्रियबोघ के ज्षेत्र में तो यह परिवर्तन और भी धीरे-धीरे होता है ओर उत्पादन- पद्धति के परिवर्तनों से अ्रपेज्ञाकइत स्वतत्न रहता है। कला की सापेक्ष स्वततन्नता का यही रहस्य है। वह समाज-निरपेक्ष नहीं होती, उसका विक्रास सामाजिक विकासक्रय के अन्तर्गत ही होता है। किन्तु वह सामाजिक विकासक्रय से प्रर्णतः नियमित नहीं होती, वह प्रर्णतः आर्थिक आधार का प्रतिविंब नहीं होती इसीलिये प्राचीन कला-कृतिया अपने सूक्तप इख्ियज्रोव और मावप्रवणता के कारण हम आज भी मोहक लगती हैं |

साहित्य के विभिन्न श्रगों की अभिव्यजना-शक्ति भिन्न-भिन्न होती है। गीत या मुक्तक में सामाजिक जीवन का उतना और उसी तरह चित्रण नहीं हो सकता जितना ओर जिस तरह उपन्यास में | इस सम्बंध में फॉक्स की उक्ति ध्यान देने योग्य है। उनका कहना है कि मनुष्य के जीवन को सर्वोगीण रूप मे जितना उपन्यास चित्रित कर सकता है, उतना माद्दित्य का दूसरा अग नहीं कर सकता |

वास्तव में कथा कहने ओर सुनने का रस ही श्रलग होता है। 'राम कथा जे सुनत अथघाहीं, रस विशेष जाना तिन नाही ।” कथा का अ्रपना विशेष रस होता है यद्यपि मनुग्य को श्रात्मविमोर करने की काव्य-शक्ति की तुलना में वह्द निम्न ही ठहरता दै। साथ ही मानव-जीवन की विविधता को जितनी विशदता से उपन्यास चित्रित कर सकता है, उतनी

पर

विशदता से काव्य नहीं कर सकता। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में लिखा था, ““बतेमान जगत में उपन्यासों की बड़ी शक्ति है। समाज जो रूप पकड़ रहा है, उसके मिन्न-मिन्न वर्गों में जो प्रद्ृत्तिया उत्पन्न हो रही हूँ, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निरा- करण की प्रवृत्ति भी उत्पन्त करते हैं |” पाठक देखेंगे कि उपन्यास की विशेषता के सम्बंध में फंक्सि की स्थापना शुक्ल नी की अक्ति से पुष्ट होती है।

साहित्य की विपयवस्तु का तरह उसके रूप सी सामाजिक विकास से सम्बद्ध है। यूगेप में उपन्यास की ग्चना पूजीवादी युग में हुई फाक्स ने उपन्यास को पूर्जावादी साहित्य का अ्रपना विशिष्ट रूप कहा है। उनके अनुसार आरम्म में महान पूजीवादी साहित्य रचा गया | बह यह भी कहते हूँ कि उस समय साधारणत* पूजीवादी वर्ग हितों श्र राष्ट्रीय हितो में साम्य था। फॉवरस के लिए श्रठाग्हवीं सदी अग्रेली उपन्याम साहित्य का स्वर्ण युग था, कारण यह कि पूजीवादी क्रान्ति ने अग्रेजी दर्शन की स॒ष्टि की और अग्रेजी उपन्यास साहित्य इस दर्शन से प्रभावित था। क्या वास्तव में अ्रग्नेजी उपन्यास साहित्य पूजीबादी ससकृति का अग है मास ने पूजी के लिए. लिखा था कि उसका अग-प्रत्यग रक्त में ड्वा हुआ है | उस रक्तरजित पूजी से महान साहित्य की रचना कैसे सम्मव हुई ? फंक्स ने एक चगद् शेक्सपियर, मार्लों और मिल्टन के लिए मी लिखा है कि अम्युदयशील पूजीवादी वर्ग की सस्कृति उनकी रचनाश्रों में कलकी है |

इस सम्बंध में पहले तो इस बात पर व्यान देना चाहिए. कि इगलैंड में श८ वो री के अन्त तक सत्ता पूजीपति वर्ग के हाथ में थी सत्ता भरवामी वर्ग के द्वाथ में थी जिनके राजनीतिक प्रतिनिधियों को हम उन्नीसवीं सदी सम पालियामेंट सम्बंधी सुधारों का विरोध कम्ते पाते हैं। जो पूलीपति सत्ता में सामेदार थे, वे भी मुख्यत" व्यापारी भौदागर ये, कि सर्वहारा बगे के शोपषक उद्योगपति उस समय पैसा कमाने का सबसे काग्गर तरीका भारत जैसे देशों से व्यापार करना था, कि

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इगलैण्ड का तैयार माल यहा बेचना १८ वी सदी में ओद्योगिक क्रान्ति के बाद लगभग एक शताब्दी के सघर्ष के बाद ही उद्योगपति सत्ता हथिया सके इस उलभी हुई परिस्थिति में यह समझना कि १६ वीं सदी से ही श्रभ्युदयशील पूजीवाद शेक्सपियर और मिल्टन जैसे कलाकारों को अपना वर्ग-प्रतिनिधि बना सका, सही नहीं मालूम होता पूजीवाद श्ारम्म से ही श्रन्तर्विरोधों से पीड़ित था और १६ वीं सदी से ही अग्नेजी के महान लेखकों ने उसकी बरात्र तीत्र आलोचना की थी यह भी व्यान देने की बात है कि अ्रग्नेजी पूजीवाद ने कमी सामन्तवाद का सुसगत विरेध नहीं किया। उसने किसानों को तबाह किया लेकिन सामन्‍्तों से गठबन्धन क्या | सास्कृतिक क्षेत्र में उसके राजनीतिक प्रति- निधि ड्यूकों और लॉर्डो को सदा अपना आदर्श मानते रहे | इगलैण्ड के इतिहास में कोई भी ऐसा दौर नहीं है, जब किन्हीं ईमानदार साहसी पुरुषों ने पूजीवाद की खरी आलोचना की हो। फिर भी फंक्स की सवेदनाए अ्रपनी जगह सही हैं। सवेदनाओं के आधार पर की हुई व्याख्या भ्यान देने योग्य है |

फीह्डिंग पर अपने एक लघु निबन्ध में फंक्ति ने लिखा है कि यद्यपि उसका जन्‍म अभिजात वर्ग में हुआ था किन्तु उसने गरीबी में दिन विताये और उसे बराबर सघर्षों का सामना करना पड़ा उसने अपने समय की नन्‍्याय-व्यवस्था का विरोध किया। उसने अपने समय की समाज व्यवस्था की तीध्र आलोचना की 'जोनाथन वाइल्ड? नामक उपन्यास के एक अध्याय के लिए पॉक्स ने लिखा है: “(वह अब तक प्रजीवादी गजनीति का सबसे तीखा खडन हे।” प्रस्तुत पुस्तक के पाचवे अध्याय मे फाक्स ने फीहिडिग के भयानक क्षोम और क्रो की चर्चा की है यह क्रोष मानव जीवन के पतन से उत्पन्न हथ्मा था और उस पतन में प्रजीवाद का भी द्वाय था | इस तरह पूजीवाद के श्रभ्युद्य- काल का शष्टठ उपत्यायकार फील्डिंग पूजीवादी समाज व्यवस्था का तीज आलोचऊ तिद्ध होता है।

फंक्स के अनुसार १६ वी सदी के प्र्वार् पर ब्रालचाऊ छाया हुआ है| उसका कांग्ण यह कि उसने शअ्रपने युग का क्रान्तिकारी चित्र दिया

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है | दूसरे फ्रासीसी उपन्यासकार फ्लोवेयर में फॉक्स के अनुसार पूलीपति वर्ग के प्रति घुणा भरी हुईं थी। थेकरे के लिए उन्होंने लिखा है कि बह नये पूजीपति-बर्ग से घुणा करता था और तीखे व्यग्य द्वारा उसने अपनी घुणा स्पष्ट ही प्रक८ कर दी थी। फॉक्स के लिए १६ वीं सदी के तीन सर्वर्शवई्ट उपन्यास हैं, 'बुदरिंग हाइट्स,' 'जूड दि ओब्सक्योर! और “दि वे ऑफ श्ॉल फलेश” ये महान इसलिए हैं कि इनमें यह सत्य उद्घा- टित किया गया दे कि पूजीवादी समाज से मरापूरा मानव जीवन असभव है। १६ वीं सदी के तीन सर्वओेष्ठ उपन्यास पूंजीवादी समाज-व्यवस्था से घोर श्रसतोष प्रकट करते हैं इस तरह फंव्स से अंग्रेजी उपन्यास साहित्य की ऋान्तिकारी भूमिका स्पष्ट की है। इगलैण्ड ओर यूरोप के उपन्यास- कारों ने जनता के दुखदर्द को देखा और अपने साहित्य में उसका कलात्मक चित्रण किया | उनकी विचारधारा में मले उलभर्ने रही हों, वे पूंजीवादी समाज व्यवस्था के खरे आलोचक थे, इसमें सदेह नहीं डिकेन्स ओर स्काठ १६ वीं सठी के दो सम्नसे लोकप्रिय उपन्यास- कार थे। चरित्र निर्माण में इनके कोशल को फॉक्स ने मुक्तकठ से स्वीकार किया है इस कोशल का रहस्य क्‍या था! इसका रहस्य जनसाधारण के चरित्र की पहचान, डनके मानस में पैठने की अ्पूर्व क्षमता और शब्दों में उसे चित्रित करने की सामर्थ्य थी। उनके “हीरो? और “हीरोइन मले ही काल्पनिक हों, उनके साधारण पात्न सदा सजीव होते हैं इसीलिए उनमें इतनी विविधता है | उपन्यासकार के जीवन-दर्शन का महत्व होता है, किन्तु गलत दृष्टिकोण होने पर भी अपनी सहानुभूति, सवेदनाओं ओर सामाजिक बीवन की जानकारी के चल पर ठपन्यासकार श्रेष्ठ कृतिया दे सकता है। चालजाक १६ वीं सदी के पूर्वाद्ध पर छाया हुआ यथा और तोलम्तोय उस सदी के उत्तराघ पर हावी थे---इन दोनों का ही दार्शनिक दृष्टिकोण प्रतिक्रियाचादी था। कलाकार के लिए. मूल वस्तु है संवेदना, सामाजिक जीवन से व्यापक परिचय, अपने पात्रों से उचित अनुपात में सहानुमूति या घुणा | इनके साथ सही जीवन दर्शन भी हो तो कहना ही क्या! किन्तु उन मौलिक गुणों के विना सही जीवन दशेन के शआआधार पर कोई महान कलाकार नहीं बन सकता |

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कारों से सीख सकते हैं। शोलोखोब, अ्रलेक्सी तालस्ताय, फादेयेव आदि लेखकों ने तालस्ताय की कला से बहुत कुछ सीखा और अपने युग की परिस्थितियों का चित्रण करने में उस कला का उपयोग किया। उनकी लोकप्रियता ने सिद्ध कर दिया कि उन्होंने अपनी परम्परा से सही नाता जोडा था।

यह हृ्ष की बात है कि हिन्दी में व्यक्तिवाद की ओर से उपन्यास- कार मुह मोड़ रहे हैं। श्री इलाचद्र जोशी अन्तस्तल के विशेषज्ञ थे उन्होंने “जहाज के पछी ? में बाह्य परिस्थितियों को नियामक माना है जिनसे तरह-तरह के पाप ओर दुराचार सभव होते हैं। नागार्जुन, अम्रतलाल नागर, राजेन्द्र यादव आदि की कृतिया उस स्वस्थ मार्ग पर हिन्दी कथासाहित्य को बढा रही हैं जिसका निर्माण पग्रेमचद ने किया था। ये सभी लेखक समाज में फैली हुई वीमत्सता को उघाड़कर पाठक को तिलमिला देते हैं, साथ ही अपने-अपने ढग से वे मानव जीवन में आस्था मी उत्पन्न करते हैं | फॉक्स ने कथा साहित्य को मानव जीवन के विकास का साधन माना था। हिन्दी में वह साधन और साध्य दोनों है

यह प्रसन्नता की बात है कि फॉक्स लैसे विचारक का यह ग्रथ श्री नरोत्तम नागर जैसे प्रसिद्ध लेखक और सिद्ध अ्रनुवादक द्वारा हिन्दी पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। इसमें उल्लिखित श्रनेक समस्याए हिन्दी के लेखकों और पाठकों को आन्दोलित कर चुकी हैं। निःसन्देह उन्हें यहा सीखने समझने ओर सोचने के लिए बहुत सी महत्वपूर्ण सामग्री मित्तेगी |

श्रागरा रामविलास शर्मा २१-८-५७

*प (अं

शर0

» समानवादी यवार्थवाद

सूचीं

« विषय प्रवेश » मार्क्सवाद आओऔ्रौर साहित्य

सत्य ओर वास्तविकता

, उपन्यास श्रोर वास्तविकता

उपन्यास महाकाव्य के रूप मे विक्योरिया-कालीन गतिरो

» बालजाक, फ्लीबर और गौन्कोर्ट बन्धु » नायक की मृत्यु

००

सच्चीव मानव

« गद्य की विलुत्त कला » सास्कृतिक विरासत

रे

साहित्यिक लेख हेनरी बारवूस... ..... --« -««- साहित्य और राजनीति िप्पणिया

श्१्‌ २० रद ड्& प्र ्ि पर ह्प ६०६ श्र्६ १४२

२६४ २७०

श्परे

एक

ब्पिय ग्रनेश

यह दावा करना गलत होगा कि प्रस्तुत निवध कला और जीवन के पारस्परिक सम्बधों के समूचे व्यापक क्षेत्र पर प्रकाश डालता है नहीं, यह इससे अ्रधिक सीमित लक्ष्य को लेकर चलता है अग्रज्णी उपन्यास कला की वर्तमान स्थिति की जाच करना, विचारो के उस सकठ को समभने फा प्रयत्न करना, जिसने उस नीव को ही नष्ट कर दिया है जिस पर कि एक समय उपन्यास इतनी हृढता से स्थापित था; और उसके भविष्य पर एक दृष्टि डइलना

यहा यह वता देना कदाचित्‌ उपयुक्त होगा कि में उपन्यास कला के भविष्य में कक! करता हू, हालाकि इसका व्तेमान बहुत ही अ्रस्थिर प्रतीत होता है। /यह हमारी सम्यता की महान लोक कला है, हमारे पूवंजों के महाकाव्य और शांशों दा जेस्ट"* की उत्तराधिकारिणी है, और यह वरावर जीवित रहेगी लेकिन जीवन का श्रयं है परिवतंन, सम्मव है कि ये परिवर्तन, कम-से-कम कला के क्षेत्र में, सदा उन्नति की दिया में हो, किन्तु परिवर्तन तो वे हैँ ही ये परिवर्तन ही, जिनके बिना उपन्यास श्रपनी जीवन्त जक्ति को कायम नही रख सकते, भ्रस्तुत पुस्तक का विषय हैं

मानव इतिहास में अ्नेकानेक नयी कलाझ्ो ने जन्म लिया है, उदाहरण के लिए जैसे सिनेमा किन्तु प्रव तक कोई भी कला पूुणंतया मरी नहीं मानव अपनी चेतना के हर विस्तार से, हर उस बम्तु से जो

सर

वास्तविक जगत के प्रति--जिसमें कि वह रहता है--- उसकी सवेदन- शीलता को प्रखर बनाती है, चिपका रहता है उपन्यास एक नयी कला भी है। यह सच है कि इसकी जडे अतीत में वहुत दूर तक--तत्रियाल- वियो के भोज*, डाफनिस और क्लो* झौर कदाचित्‌ इससे भी दूर हेरोडोटस तक गयी हैं, किन्तु अपने-आप में एक विशिष्ट कला के रूप में प्रपने श्रस्तित्व के ओचित्य से युक्त, अपने ही नियम-कायदों से सम्पस्न, तथा सावंभौम मान्यता और सराहना-प्राप्त कला के रूप में यह हमारी झपनी सम्यता की, और सबसे बढकर छापेखाने की, देन है

माना कि यह साहित्य का केवल एक श्ग ही है, किन्तु यो तो एक तरह से नाटक भी साहित्य का एक श्रग है, फिर भी अपने-भाप में एक विशिष्ट कला के रूप में नाटक को उसका गौरव प्रदान करने से कोई भी इन्कार नही करेगा। उपन्यास केवलमात्र कथात्मक गद्य नही है, वह मानव के जीवन का गद्य है-- ऐसी पहली कला है, जो सम्पूर्ण मानव को लेकर उसे झ्नभिव्यक्ति प्रदान करने की चेष्टा करती है। श्री एम फास्टर* ने बताया है कि उपन्यास को भ्रन्य कलाझो से भ्रलग करनेवाली महान विशेषता यह है कि उसमें ग्रुतत जीवन को प्रत्यक्ष करने की शक्ति है इस प्रकार यह कला कविता, या नाटक, या पिनेमा, या चित्रकला, या सगीत से ययाथ का एक भिन्‍न दृश्य प्रस्तुत करती है

! ये सब कलाए यथार्थ के उन पहलुग्नो को व्यक्त कर सकती हैं जो कि उपन्यास की पहुच से वाहर हैं किन्तु इनमें से कोई भी व्यक्तिगत पुरुष, स्त्री अथवा बच्चे के सम्पूर्ण जीवन को उतने सनोपप्रद रूप में व्यक्त नहीं कर सकती इसके कार्यक्रारणों पर, इसी निवध में, में श्र यत्र प्रकाश डालूगा यहा केवल इस तथ्य का उल्नेख तथा पाठकों से फिलहाल इसे मान लेने का अनुरोध करना ही काफी होगा

उपन्यास कला वया सचमुच इतनी सकक्‍ट-प्रस्त है कि लोग उसके बरे में पुस्तकें लिखने पर बाध्य हो, तथा ध्यान आकपित करने के लिए गला फाड कर ऐसे चिल्लाना घुरू कर दे जैसे कि हम किसी श्लादमी को चतरे की दिया में बढते हुए देखकर चिल्लाते हैं ? यह सही है कि इस घघे से सम्बंधित अधिकादश खेखक इस बारे में अ्रव एकमत हैं कि श्रग्ने जी

ह्

उपन्यास बुरी स्थिति में फला है, और यह कि वह वस्तुत' दिशा-अ्रष्ट और उद्देश्य-विहीन हो गया है उपन्यास, जिसका सर्वोपरि श्राधार यह है कि वह खूब पढा जाय, भव तेजी से अ्रपठनीय होता जा रहा है।

निदचय ही इसका श्रथं यह नहीं है कि चवन्तिया पुस्तकालयों का कारवार ठप्प होने जा रहा है उपन्यास तो श्राज भी खूब पढे जाते हैं, पहले से अधिक पढे जाते हैं, किन्तु पढ़े वही जाते हैं जो अपठनीय हैं चूकि कूटोक्ति से भूखे श्रादगी का पेट नहीं भरता, इसलिए स्थिति को -- जैसा कि में उसे समझता हू --खोल कर रखने का प्रय करूगा

सबसे पहली बात तो यह कि सकट ग्रुणों के ह्ास का सकट है| निस्सदेह, भ्रत्यत लोकप्रिय उपन्यास पैदा करने वाले लेखकों की सख्या झ्राज जितनी अ्रधिक है उतनी पहले कभी नहीं थी वे ऐसे उपन्यास लिख रहे हैं जो हमारी तात्कालिक कामना को भ्ुदगरुदाते हैं, जिन्हें हम रेडियो के घालू होने पर (या उसके चालू होने पर भी) खुशी से पढ़ते हैं, रेल-यात्रा करते समय, या समुद्र के किनारे, एक बार पढ कर जिन्हें हम सदा के लिए भूल जाते हैं, या फिर एकदम याद रहने के कारण धोखे में हम उन्हें फिर उठा लेते हैं भौर भ्राधा पढ जाने के बाद एकाएक याद आ्राता है कि अरे, यह तो हमारा पढा हुआ है | ऐसे उपन्यासों से --यों सयोगवश उनकी चर्चा हो जाना दूसरी बात है--यहा हमारा कोई सरोकार नहीं है। कारण कि वे यथार्थ का चित्रण नहीं करते

कहने को तो इन उपन्यासों के लेखक भी एक वास्तविक जगत का चित्र प्रस्तुत करने की चेष्ठा करते हैं। किन्नु उनके हारा प्रस्तुत वास्त- विकता का परिमाण--उस श्ाकस्मिक सयोग को छोडिये जिसका सम्बंध लेखक से होकर किसी व्यक्तिगत परिस्थिति से होता है, किसी ऐसी वस्तु से होता है जो पुस्तक में नहीं, बल्कि पाठक में है-- इतना काफी नहीं होता कि वह हमें वरवस मभोड डाले, हमारी तमाम भावनाझ्रो को चौकन्ना तथा मस्तिष्क को चौकस बना दे शौर हमें उन लोगों के देश में ले जाय जो देखते हैं, और उनकी आज़ों से देखने के बाद उस अनुमव को हम फिर कभी भूल सके

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आझाज उपन्यास-प्रालोचक को, समाह प्रति सप्ताह, मीलों तक फैली मुद्रित पन्‍नों की निर्जेज तथा उबा देने वाली दलदल में छटपटाना, भर निरे नकली भावों तथा अनगढ़ यौन-सम्बधों के ऊहापोह से भन्‍नाकर भृणा के साथ मुह फेर लेना पडता है। मि सिरिल कोनोली का, जो स्पष्टदादिता में श्रन्य कतिपय श्रालोचको से कही श्रागे हैं, कहना है कि जिन पुस्तकों की वे आलोचना करते हैं, उन्हें पढ जाना उनके लिए घहुधा पुणंतया भसम्मव होता है परिणाम इसका यह कि उनके रोचक लेख, झ्राम तौर से भौर हमारे सीभाग्य से, स्वयं मिं फोनोली से जितना प्रधिक सम्बंध रखते हैं उतना उस उवा देने वाली कच्ची सामग्री से नही जो कि मि कोनोली के लिए जैसे-तैसे दो पुन पेट भरने का साघन बनती है

यह देख कर भ्राइचयं होता है कि बुरी पुस्तकों की यह थाढ पढने याली जनता में वृद्धि का फल नहीं है। बल्कि यह उन तौर-तरीकों का फन है जिनसे कि हमारे प्रकाशक पाठकों की आए दिन बढती हुई संख्या की रुचि को तुष्ट करते हैं पाठक को श्रव वह नही मिलता जो कि वह चाहता है, बल्कि उसे उसी फो चाहना पडता है जो प्रकाशन का दैत्य उसे प्रदान करता है।

इन भीमाकार तथा श्रत्यधिक यन्त्रीकृत प्रकाशन गृहो को, जो बहुधा झपने निजी छापेखानों तथा जिल्दसाजी के विभागों से, श्लौर श्राघुनिक व्यापार के लिए श्रत्यन्त आवश्यक -- बैंक से मोटी-ताज़ी रफमें (झोवर ड्रापट ) लेने की क्षमता से भी युक्त होते हैं, श्रपने आपको चालू रखने के लिए वाघ्य होकर पुस्तको फी ताक में रहना पढता है। उन्हे भ्रधिका- घिक पुस्तक चाहिए जहा तक हो सके उपन्यास चाहिए। कारण कि उपन्यास लेखक को उतना पैसा नहीं देना पडता जितना कि गैर-उपन्यास साहित्य के लेखक को, फिर लागत भी उस पर श्रधिक नहीं झ्राती -- सस्ते में ही किताद तैयार हो जाती है, श्रौर पुस्तकालयो के रूप में उन्हें तैयार वाजार भी मिल जाता है, वशर्ते कि इस बात की गारन्दी की जा सके कि पुस्तक मीलिकता से पृणंतया शून्य है

है.

__. प्रकाशकों की प्रकाशन सूची में शीपंकों की अ्रधिकाधिक वृद्धि होती रहनी चाहिए इसके बिना वे एक-दूसरे से होड़-युद्ध में टिक नही सकते। उनके लिए अधिकाधिक कितादें छापना जरूरी है ताकि उनके छापेसाने व्यस्त रहें, या जिनके पास निजी छापेखाने नहीं हैं वे उन मुद्रकों को तुष्ट रख सके जो कि उनका काम करते हैँ क्‍या छपता है, इसकी उन्हे विशेष चित्ता नहीं कूडा हो या घुल में छिपा रत्न, एक हो तरह के टाइप में तथा एक ही कागज पर वह छपेगा, जिल्द भी एक ही प्रकार के कपडे की बनेगी, एक-सा ही आवरण उसकी रक्ष्त करेगा शौर उन्ही पुराने पुस्तकालयों को वह बेचा जाएगा दोनों ही सुरतो में प्रकाशक अपना होल पीठ कर उसे उत्कृष्ट कलाकृति घोषित करेगा, और अश्रधिकांश आलोचक --- जो दूध-पादी अलय करने के निराशापूर्ण काम को एक मुहृत से छोड चुके हैं --उस क्षण के अपने मूड भ्रथवा प्रकाशक के साथ अपने निजी सम्वधों के अनुसार कुछ घटा या बढा कर प्रकाशक के मूल्यां- कन को ही अलस भाव से स्वीकार कर लेंगे पुस्तक प्रकाशन से लाभ वटोरने के इस भारी खेल में स्वयं लेखक एक निरा छून्य वतकर रह गया है। जब उसकी पुस्तकें विकती हैं तो उसे एक महत्वपूर्ण विभूति घोषित किया जाता है, जिससे उसकी स्वरतत्रता में कुछ वृद्धि तो होती है, फिर भी वह खेल का केवल एक अग ही वना रहता है--- होता फेवल यह है कि अब उसे व्यवसाय के प्रचार पक्ष के हवाले कर दिया जाता है। व्यापारिक पक्ष झव उसकी कुछ झआवभगत करता है, किन्तु आवसगत से भी --- यदि वह सावधानी से की जाय -- भ्रच्छा मुनाफा बनाया जा सकता है। इस व्यवसाय के प्रचार पहलू के बारे में -- माह की श्रेष्ठ पुस्तक वाले विभिन्‍न क्लवो तथा टोडीपने के बारे में, पत्र-जगत को मुट्ठी में रखते की कला और रेड़ियो द्वारा साहियय की “सेवा करने के बारे में --- भी बहुत कुछ कहा जा सकता है। किन्तु इनका यहा उल्लेख करना निरथधेक होगा कारण कि प्रस्तुत निवंध के उद्देश्य से उनका दूर का ही सम्बध है। लेखक और पाठक के रूप में जिस तथ्य में हमारी दिलचस्पी है, वह यह है कि प्रकाशन व्यवसाय अभ्रव बडी पूजी वाले व्यवसायों का एक

भ्रभिन्न भग बन गया है। इसके लिए प्रकाशर्कों को दोष देना मूख्खता होगी बडे-यूढो के शब्दों में उन्हें '' जीवन के तथ्यों से बाध्य होकर ही यह स्थिति ग्रहण करनी पडी है। यहा केवल इतना ही नोट करने की श्रावश्यकता है कि साहित्य पर, और विशेष रूप से उपन्यासो पर, इसका निन्‍्दनीय प्रभाव पडा है। पुस्तक व्यवसाय में से यह लक्ष्य गायब हो गया है कि उच्च कोटि की पुस्तक प्रकाशित की जाए, और उसके आसन पर परिमाण ने दखल कर लिया है किन्तु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सकट एक और है --दृष्टिकोण का सकठ, जिसने स्वय उपन्यासकारों को ग्रस रखा है। दुरे उपन्यासों तथा घटिया कृतियों की भीषण बाढ़ के बावजूद श्राज श्रच्छे उपन्यासकार, ईमानदार कलाकर्मी, भी रचना कर रहे हैं। डी एच लौरेन्स को भरे श्रमी कुछ ही दिन हुए हैं। जेम्स जॉयूस" झौर एम फास्टेर शमी जीवित हैं। रैवेका व॑स्ट,* प्रल्डस हकक्‍्सले? तथा भ्राधे दरजन के करीब प्रन्य लेखक भ्राज भी गम्भीरता श्र यता के साथ उपन्यास लिखने में जुटे हैं। यह इस समय हमारी बहस का विषय नहीं कि इस काय॑ में उन्हें कितनी सफलता मिली है। गम्भीर लेखक को श्राज गहरी कठिनाइयों का सामना करना पडता है। भनन्‍य सव कलाकारों की तुलना में लेखक ही शझपने देश को झधिक व्यक्त करता है उसके उपन्यास अनूदित होते हैं. श्रौर समूची दुनिया में पढ़े जाते हैं। वेल्स, किपलिंग, गाल्सवर्दी और कानराद की कृतियो के श्रघार पर ही कल के इग्लेण्ड को विदेश्ञों में परखा जाता था भ्राज के इग्लेण्ड को परखा जाता है मुस्यत' हकक्‍्सले के श्राधार पर, और उनके बाद उन गिनें-चुने युवक लेखकों के श्राधार पर, जिनकी कृतियो को ग्रनुवाद का सौभाग्य अभी श्रमी प्रास हो रहा है फलत उपन्यासकार का अपने देश के वर्तमान तथा भतीत--दोनो के प्रति एक विद्येप दायित्व होता है। अतीत से मिली विरासत उसके लिए महत्वपूर्ण है। उससे पता चल जाता है कि देश की सास्कृतिक विरासत के वे कौनसे भ्रण हैं जो ग्राज भी सार्यक हैं। वर्तमान के बारे ते कुछ कहता है, उसका भो महत्व है, कारण कि उससे श्राशा

की जाती है कि वह अपने युग के अत्यत जीवत तत्वो को व्यक्त करेगा | यहा पर आपत्ति की जा सकती है कि उपन्यासकार का इस बात से कोई सरोकार नही कि अन्य लोग उसकी क्ृतियों के बारे में वया कहते हैं, विरासत में वह क्‍या प्रास करता है, और वह क्या व्यक्त करता है, यह उसका एकदम निजी मामला है

यदि यह झकेले उसका निजी मामला हो, तव भी अपनी कृति के प्रति बाहरी दुनिया की प्रतिक्रियाओं से वह अपने श्राप को अलग नही रख सकता एक ऐसी दुनिया में जहा अत्यत भ्रहवादी तथा विनाशकारी रूपों में राट्रीयता अधी दौड लगा रही है, राष्ट्रीयता के प्रति हर ग्रम्भीर तथा महत्वपूर्ण लेखक का रवेया महत्व रखता है श्र आज के प्रत्येक गम्भीर अग्रनेज्ञ लेखक के लिए यह एक अत्यत गौरव की बात है कि वह इसे समझता है, और यह कि उनमें से श्रधिकाण तत्मम्त्रबी समस्यापञ्रो के बारे में पूरी गम्भीरता से सोचते हैं

क्या लेखक धर्म की खातिर देश को तिलाझ्जलि दे दे ? मि एवलिन वौघ ने ऐसा ही किया, और देखा कि ऐसा करने पर वह केवल एक दूसरे देश की राष्ट्रीयता की तैयार गोद में पहुच गये हैँ म्पष्ठ है कि श्राज रोमन कैथोलिक धर्म का अर्थ है फासिस्ट इटली का--आधुनिक राज्यों में जमंनी के वाद सबसे झधिक श्राक़्मणात्मक, सबसे ज्यादा अहंवादी तथा क्र राज्य का--ममर्थन करता लेखक फिर कया करे-- क्या वह डी एच लौरेन्स के रक्त और नस्ल वाले सिद्धान्त के झनिवाय॑ परिणामों को शिरोधाये करे ? ऐसा करने पर हो सकता है कि वह भ्रन्‍्त में नाजी सस्कृति का और उसके मव्यकालीन यत्रणागृहो तथा युद्ध द्वारा “आध्यात्मिक उत्थान के गोरव ग्रान का समर्थन करने लगे

मि वौघ ने जेस्थूट शहीद एडमण्ड कैम्पियोन की जीवनी लिखी है और उन्हें हौथानंडन पुरस्कार से--उन दो पुरस्कारों में मे एक से जो कि किसी अग्रेज़ लेखक को मिल सकते हँ--सम्मानित किया गया है। किन्तु क्या दोक्सपीयर अयवा मारलो भी कैम्पियोन को शहीद समझते ? अथवा क्या वे इस विचार की ओर भ्कुकतते कि उस समय, जब कि इस्लेण्ड अपने राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए लइ रहा था, जब कि इस्लैण्ड

उन परिस्थितियों के लिए लड रहा था जिनकी बदालत हमारी राष्ट्रीय सस्क्ृति का सृजन हुआ, वह ऐसे कामों में लगा रहा जिनका श्रेष्टतम परिचय शेक्यपीयर की निम्न पक्तियो से दिया जा सकता है

«समय के मूर्स॑, जिनकी मृत्यु में भलाई है, जिये जो अपराध के लिए ।?

स्पष्ट है कि श्राज के लेखक में यह परखने की बहुत ही पैनी क्षमता होनी चाहिए कि सच्ची राष्ट्रीयता क्या है श्रौर कोरी राष्ट्रीयता ग्रथवा राष्ट्रविरोधिता क्या हैं। श्रतीत हो चाहे वर्तमान, दोनो को ही हमें परखना है | हमे अपने श्रभियान में श्रतीत को साथ लेकर चलना है, इसलिए यह देखना आवश्यक है कि उसका बोभ इतना श्रधिक हो कि हम दव कर रह जाए। अतीत से हम वही चने जो इतना वास्तविक हो कि काम शा सके और वाकी को फिलहाल छोड दें--उसे अपने साथ लें जो केवल बाधा देने वाला हो दृष्टिकोण के सकट का दर्शन से सम्बंध हैं, श्रौर इसलिए रूप से भी है युद्धोपरात अधिकाश अग्ने लेखको के दार्शनिक विचारो पर यूरोपीय उदारपर्वियों की श्रन्तिम कडी--सिग्रमण्ड फ्राएड"--का गहरा प्रभाव पटा है। फ्राएड द्वारा विकसित मनोविश्लेपण बौद्धिक श्रराजकता की चरम सीमा शौर व्यक्तिवाद का मोहनी मत्र है निश्चय ही इसने पिछले वीस सालो में श्रग्न जी उपन्यास को जितना श्रधिक प्रभावित किया है, उतना श्रन्य किन्ही पिचारों ने नही साथ ही इसने अग्रे ज़ी उपन्यास को लगभग पूरे बौद्धिक दिवालियेपन की स्थिति में ला पटका है, हालाकि झ्नेक उल्लेपनीय मौलिक कृतिया ऐसी भी है जो बहुत कुछ फ्राएडवादी विश्ले- पण द्वारा व्यक्ति के उद्बाटन के कारण ही प्रभावशाली वन पाई हैं सबसे अन्तिम प्रशन जो श्राज उपन्यासकार को मथता है, वह समाज से सम्बंध रसता है। क्‍या कोई उपन्यासकार उस दुनिया की समस्याओं से, जिसमे विः वह रहता है वेसवर रह सकता है ? क्या वह युद्ध की तैयारियों के शोर-शरावे की ओर से अपने कान वद कर सकता है ? दया वह अ्रपने देश की स्थिति की ओर से श्रपनी आखे मूद सकता

द्प

है ? क्‍या वह उस समय अपना मुह वबद रख सकता है जब कि चारो ओर विभीषिका मडरा रही हो और व्यक्तिगत लालसा को श्रक्षुण्ण रखने के लिए वचनवद्ध राज्य के नाम पर जीवन को दो छून रोटियों से भी वचित किया जा रहा हो ?

ग्रधिकाधिक उपन्यासकार भझब यह झनुभव करने लगे हैं कि आ्ांखें, कान शौर वाणी वस्तुत चेतना के सवेदतशील श्रग हैं जो भाववीय जगत से अनुप्रारितत होते हैं, श्रौर यह कि वे किसी आध्यात्मिक जगत के--परम्परा से चले आए तथाकथित 'कला-जगत के--निष्क्रिय चाकर मात्र नही हैं। वे समझने लगे हैं कि वे एक ऐसे समय में रह रहे हैं, जिसमें कि छोटी-मोटी बातों को छोडिए, खुद मानवता के भाग्य का निर्णय किया जा रहा है, श्रौर यह सुन कर गहरे विक्लोभ से तिल- मिला उठते हैँ कि वे, जिनका परम्परागत गौरव सदा उनका मानवता- बाद रहा है, मानव के भाग्य के बारे में परेशान हो !

यह भी उनसे छिपा नही है कि सम्यता के भविष्य के वारे में दो महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रचलित हैँ। एक दृष्टिकोण का विश्वास है कि सम्यता व्यक्तिगत सम्पत्ति के भ्राघार पर, तानाशाही राष्ट्रवादी राज्य के रुप में व्यक्त युद्ध और पागल अहवाद के वातावरण में, विकसित होती रहेगी दूसरे दृष्टिकोण का विश्वास हैं कि मानवता सामाजिक सम्पत्ति पर शआाधारित उन नये भूल्यो के लिए संघर्ष कर रही है, जो युद्ध को वहिप्कृत तथा राष्ट्रवाद का अत कर देंगे श्लौर उनकी जगह पर एक विश्व- सम्यता के अस्तगंत एक-दूसरे से सहयोग करते हुए स्वस्थ राष्ट्र के उन्मुक्त विकास का रास्ता खोल देंगे

भ्रधिकाश लेखक, न्यूनाधिक मात्रा में, दूसरे दृष्टिकोश की भोर भुके हैं। उनमें से श्नेक--वे जिनकी दृष्टि श्लोरो की तुलना में प्रधिक साफ है, झनुभव करते हैं कि इस तरह की नयी सम्यता का उदय मुस्यत उस सधर्प के फलस्वरूप होगा जिसे आज मजदूर वर्ग चला रहा है, और यह कि इस नयी सभ्यता के प्रारभिक चिन्ह श्रभी भी सोवियत सघ में देखे जा सकते हैं। इस अनुभूति ने उनमे मार्क्सवाद, जो मजदूर वर्ग के क्रान्तिकारी हिस्से का तथा सत्रह करोड की आवादी से युक्त महान

और रोम के दास-राज्यो की अथवा प्राचीन पूर्वीय शहनञ्याहितों की कला के मुकाबिले में सामन्‍्ती कला का सिंहासन ऊचा होना चाहिए इंस तरह के मोटे तथा भोंडे विचारों का माकसंवाद की समूची आत्मा से दूर का भी वास्ता नही है

माक्स का यह कहना ठीक ही था कि समाज के भौतिक श्राधार में हुए परिवतंनों को आधिक इतिहासज्ञ पदार्थ विज्ञान की भाति सही सही जाच सकता है (स्पष्ट ही इसका मतलब यह नही है कि इन परिवतेनों का वैज्ञानिक रूप से निर्धारण होता।है ), किन्तु जीवन के ऊपरी सामा- जिक तथा भ्राध्यात्मिक ठाचे में हो रहे परिवर्ततों की ऐसी कोई वैज्ञानिक नापतोल नही की जा सकती | परिवतंन होते हैं, लोगों को उनका बोध होता है, नये और पुराने के बीच हन्द्र का वे अपने दिमागो में निवटारा करते हैँ किन्तु यह निबटारा वे इतने असम, श्रतीत से विरासत में मिले हर किस्म के बोझ से दबे, बहुघा अस्पष्ट रूप में तथा सदा ऐसे तरीके से करते हैं कि लोगो के दिमागों में हो रहे परिवर्तंनो का आसानी से पता नहीं लगता !

उदाहरणायं, यह सच है कि फ्रास की क्राति द्वारा सम्पन्न सामा- जिक श्रौर श्राथिक परिवर्तनो की अभिव्यक्ति कोड नेपोलियन के रूप में हुई। किन्तु इस तथ्य की जानकारी, श्रपने-भाष में, कोड नेपोलियन को स्पष्ट नही करतो इसके लिए फ्रास के इतिहास तथाः क्राति से पहले उस देश में वर्गों के सम्बधो को समझना भी झावश्यक्र है, इसके लिए स्वय क्ाति के विकासक्रम और वर्ग-सम्वधो में उसने जो परिवर्तन किये, उन्हे समभना शावश्यक है, श्रौर सबसे अन्त में नंपोलियन की फौजी तानाशाही फो समझना भ्रावध्यक है। केवल तभी यह वात समझ में सकती है कोड नेपोलियन किस प्रकार नये बुर्जुआ समाज तथा फ्रास की उस औ्रौद्योगिक क़ान्ति की काननी अभिव्यक्ति थी जिसका नैपोलियन-काल में मूत्रपात हुआ और कानून भावगत ऊपरी ढाचे का सम्भवत सबसे श्रथिक प्रभावशील श्रग है, उत्पादन के तरीकों में परिवर्तन के श्रनसार यह श्रत्यत आसानी के साथ बदल जाता है। किन्तु कला का आधार

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से बहुत दूर का नाता होता है, और परिवर्तेत का उस पर कही कम भासानी के साथ प्रमाव पडता है

ऐंगल्स ने १८६० में जे ब्लॉक को लिखे अपने एक पत्र में इस सिलसिले में बहुत ही जोरदार बच्दो में श्रपना मत प्रकट किया था:

इतिहास की भौतिकवादी घारणा के अनुसार वास्तविक जीवन में उत्पादन और पुनरोत्पादन ही अन्ततः इतिहास के निर्णयात्मक तत्व हैं इससे बडा दावा तो मावस ने किया है श्रौर मेंने इसलिए यदि कोई इसे तोड-मरोडकर यह कथन गढ़ता है कि झ्राथिक तत्व ही एकमात्र निणुयात्मक तत्व है, तो वह्‌ उसे एक निरर्थक, निराधार श्रौर बेहुदा फिकरा बना देता है। झाघार आधिक स्थिति है, किन्तु ऊपरी ढाचे के विभिन्‍न तत्व --- वर्गं-सघर्ष तथा तजन्य परिणामों के राजनीतिक रूप, सफल लडाई के बाद विजयी वर्ग द्वारा कायम विधान, भ्रादि--कानून के रूप -- भौर यहा तक कि युद्धरत पक्षों के दिमागो में इन समस्त वास्त- विक सघर्षों की प्रतिक्रियाए राजनीतिक, कानून सम्बधी श्रोर दा्शनिक सिद्धान्त, घामिक विचार और श्ागे विकसित होकर रूढिग्रस्त पथो के रूप में उनकी परिणति, --- ऐतिहासिक सघर्षों के विकास क्रम पर ये सब भी अपना श्रसर छोडते हैं और प्ननेक हृष्टान्तो में उनका रूप निर्धारित करने में ये सबसे वडी भूमिका भ्रदा करते हें इन तमाम तत्वों में क्रिया-प्रकिया घलती है जिसमें, झ्राकस्मिक घटनाश्रो के भन्तहीन ताते के बीच [ श्रर्थात्‌ ऐसी घटनाओं के बीच जिनका भमन्तसंम्वध इतने दूर का पअधवा उसे सिद्ध करना इतना भ्रसम्भव होता है कि हम उसे श्रनुपस्थित समर कर नजरदाज कर सकते हैं ) आधिक प्रक्तिया अ्न्तत. आवश्यक तत्व के रूप में उमर झ्लांती है। भ्रगर ऐसा होता तो इतिहास के किसी भी मनचाहे काल पर उक्त सिद्धान्त का प्रयोग गणित के साधारण से साधा- रण योग से भी झ्धिक सहज हो जाता ”*

इसलिए, जहां मार्क्सवाद आर्थिक कारणों को ही किसी परिवर्तेन का प्रतिम झौर निर्णेयात्मक प्रकरण मानता है, वहा वह इस बात से इन्कार नही करता कि 'भावगत ' प्रकरण भी इतिहास के क्रम को प्रभावित कर सकते हैं, यहां तक कि परिवर्तनों का रूप ( लेकिन केवल रूप ही ) निर्घा-

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रित करने में उनकी भूमिका प्रमुख भी हो सकती है। यह कहना केवल मार्क्सवाद का उपहास करना है कि वह कलात्मक रचना जैसे मानव चेतना के झ्राध्यात्मिक तत्व के महत्व को कम करके आाकता है | इसी प्रकार यह दावा करता कि माक्स कला-कृतियों को भौतिक तथा श्राथिक प्रकरणों का प्रतिविम्व समझते थे, मावर्स का मजाक उडाना है। उन्होने ऐसा क्रभी नही समझा | वह खूब भ्रच्छी तरह समझते थे कि धर्म, या दर्शन, या परम्परा, एक कला की रचना में भारी योग दे सकती है। यहा तक कि इनमें से किसी एक या अन्य “भावयत” तत्व की उस कृति-विज्ेप के रूप निर्धारण में प्रमुख भुमिका हो सकती है। किन्तु उन सब तत्वों में, जिनसे एक कलाकृति की रचना होती है, केवल श्राथिक प्रक्रिया ही ऐसी है जो अंततः अनिवायं प्रकरण के रूप में अपने आपको प्रकट करती है। जिस बात को माक्स झौर ऐंगेल्स ऐतिहासिक परिवर्तनों के लिए सच मानते थे, कलात्मक रचनाओं के लिए भी थे उसे सच मानते थे माक्संवाद के विरुद्ध बहुघा यह श्रापत्ति की जाती है कि वह घ्यक्ति की भूमिका को नहीं मानता, उसे केवल ऐसी निराकार श्राथिक शक्तियों का शिकार समभता है जो उसमे भाग्य-चक्र की श्रनिवायंता के साथ एक निरिचित श्रन्त की शोर धकेल रही हैं। इस प्रश्न पर हम यहाँ कुछ नहीं कहेंगे कि इस घारणा के श्राधीन कि बाह्य भाग्य मानव को एक झनिवाये भ्नन्‍्त की ओर से जा रहा है, कलाकृति की रचना श्रसम्भव है अथवा नहीं कदाचित्‌ कालविनिज्म कभी महान कजा पैदा नहीं कर सका है, किन्तु भाग्य और कयामत की घारणा को इसका श्रेय प्राप्त है-- ग्रीक दु खान्त नाटक भ्रौर हार्डी की कृतिया, केवल इन दो उदाहरणो का ही हम यहां उल्लेख करेंगे फिर भी यह सम्भव है कि उपर्युक्त आपत्ति यदि वास्तव में माक्संवादी दृष्टिकोश को पेश करती, तो सही होती कम से कम इतना तो है ही कि उपर्युक्त श्रापत्ति पश्चिमी जगत फी महान कला की मानववादी परम्परा से अनुप्रारित है, भौर इसलिए श्रद्धा के योग्य है। हालांकि वह एक भारी गलतफहमी पर आधारित है कारण कि माकसंवाद व्यक्ति से इन्कार नहीं करता वह जनसमुदाय को आथिक नाकतों के दुनिवार चग्रुल में फसे रूप में ही नही देखता यह

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सच हैं कि कुछ माकक्‍संवादी साहित्यिक कृतियों ने-- विशेषकर कुछ गसर्वहारा उपन्यासोी ने--मोले झ्रालोचको को यह विश्वाप्ठ करने का प्रवसर दिया कि ऐसा ही होता है, किन्तु इसपें कमजोरी गायद उन उपन्यापकारों की है जो झपने विपय की महानता के श्रनुल्प ऊचे नहीं उठ सके, वे इतने पोग्य सिद्ध नही हुए कि प्रकृति को बदलने , तथा नयी श्राथिक शक्तियों की रचना करने की प्रक्रिया के दौरान में स्वय अपनी फायापलट करने वाले मानव का चित्रण कर सके माक्सवाद मानव को झपने दर्शन का केन्द्र मानता है, कारण कि जहा वह यह दावा करता है कि भौतिक शक्तिया आदमी को बदल सकती हैँ, वहा पर यह भी शअन्यन्त स्पप्ठता से घोषित करता है कि यह मानव ही है जो भौतिक जक्तियो को चदलता श्रौर ऐसा करने के दौरान में श्रपनी भी कायापलट करता है मानव भर उसका विऊ़ास मार्क्पवादी दर्शन का केन्द्रविन्दु है ।मानव किस प्रकार बदलता है ? बाह्य जगत से उसके क्या सम्बन्ध हैँ ? यही वे प्रदन हैं जिनके उत्तर माक्मंवाद के सस्थापको ने खोजे भर ढूढ़ निकाले। माक्संवादी दर्शन की रूप-रेखा देना यहा मेरा श्रमीए नही है किन्तु प्राइए, इतिहास के एक सक्रिय साधन के रूप में मानव के प्रद्न की, काम करते और जीवन से सघर्ष करते मानव के प्रश्न की, हम कुछ देर के लिए ज़रा परीक्षा करें, कारण कि यह एक ऐसा मानव है जो एकवबारगी कला का सजनकर्ता भी हैं झ्लौर कला का पात्र भी इतिहास में व्यक्ति की भूमिका के वारे में ऐंगेल्स दी व्याख्या इस प्रकार है “इतिहास इस तरह से अपना निर्माण करता है कि अश्रन्तिम पन्णिम हमेशा अनेक व्यक्तिगत इच्छा जक्तियो के इन्द्र से पैदा होता है और इन इच्छा-शक्तियो में से भी प्रत्येक, जीवन की अनगिनत विज्येप परिस्थितियों के द्वारा, निर्मित होती है। इस प्रकार परस्पर काट करती अनगिनत ताकतें, शक्तियों की समानान्तर चतुर्मुजो की अनन्त श्यू खलाए , एक परिणाम को, ऐतिहासिक घटना को, जन्म देती हैं इसे भी एक ऐमी शक्ति की उपज के रूप में देखना चाहिए जो अपने समग्र रूप में निरचे- तन तथा सकल्पहीन काम करती है। कारण कि प्रत्येक व्यक्ति जो सकतप या इच्छा करता है उसमें भ्रन्य सव बाधक होते हैं, झौर परिणाम-

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स्वरूप जो कुछ प्रकट होता है वह ऐसा होता है जिसकी कसी ने भी इच्छा नही की थी | इस तरह प्रतीत का इतिहास एक प्राकृतिक प्रक्रिया की भाति चलता है भ्रौर तत्वत्त गति के समान नियमों से शासित होता हैं। किन्तु इस तथ्य से कि व्यक्तिगत इच्छा शक्तिया --- जिनमें से प्रत्येक वही चाहती है जिसके लिए कि उसका श्रपता भौतिक गठव तथा बाह्य परिस्थितिया, और अ्रन्तिम रूप से आर्थिक परित्यितिया (सकी श्रपनी निजी परिस्थितियां अथवा श्रामतोर से समाज ही परिस्थितिया) वाध्य करती हैं--अ्रपनी