ता चपा लत मिस गर

उ० २००४ प्रथम्‌ वर ३०००० सै २००५ द्वितीयं कर १८०००.

मूलय श) रीन रषा अऽ भाना

मिर्नेकापहा-- सी क्त्रि म॒,गोष्तु

श्रीहरि

भरथम्‌ संस्करणका निवेदन

शरीरमचरितमानसका धान दिदी-साहित्यमे हौ नह, नगतके सिये निर्न है | इतके जोढका, दसा ही सर्वद. उत्तम काये वेत युक्त साहित्ये समो "सोक आलादन कठनेवाक, काव्यकखाक्र शते मौ कोदिका तया आदरं गरहल्यःजीवन, शद रज्र परिक ओवन, आदद पातितम, भादरं मातपमके साय-साय स्वो भकतिनरान, वयग चाय तथा सदाचारफी रिष देते, वीरुप, व्क. भौर उवा-- सरके ल्थि समान उपयोगी एत्र. सर्वोपरि संगुण-साकर मबान्‌कती आदश मानवलीखा तथा उनके गुणः प्रभाव, रहस तया प्रेमे "गहन तत्तो अत्यन्त `सरढ, रेचक श्वं शञल्वी श्देमर न्य फेनम कोर दूसरा ग्रथ िवी- "मप ही नही, कदाचित्‌ 'घंाकी फी मपे आजतक नही छा गया यदी काएण है कि मिस चावस गरोत-भभोर, रिषित-अरिषित, गृहस्थ-न्यासी, लुप, गच्छ --समी परणीके लेग हर भर्यवो पदे ह) ऽते से धौर किसी ्रन्थको नहीं पडते तया मकि, शन, नीति, सदाचार्का'भितना प्रचार जनतामें भरन्यते इग दै, उतना कदाचिद्‌ थौर किप अन्धे मषी हभ | "५

जिस न्यक जगत स्तना मान हो, उसके अनेकों संस्करणोक्षा छना

तथा उसपर अनेवों दीकायोंका छिला जाना छामा ही है | श्त नियमके अतुपार रामचरिःमानस्के भी आयत सकं संसकाएण छप के दै इपर

` सैको हौ दीका ज्जा दुक है हमरे गताशुल्फो रमावणः , सम्बन्धी ५०० प्रन निनर-पित्र भारक भां चुके | अवते अनुमानतः इकी शौ प्रतिय छ्य पकी होगी अद-दिन हतक एकन-एकं नया संस्करण देगेको मिव्ता है ओर उस अनव संस्सणोरी यपे्षा कोरैन-कोँ

„-{ ४)

"स प्रित बद रती है ! परे न्धो भी रमवणी विदि वः मतमेद्‌ है, यौतक कि खलम तो अदेव चपा एक-न-एक पाठभेदः मिनित संकरेण मिलता भितने पद पन्ये मिते है, उतने कवृनित्‌ भर किसी प्न परथते नही परते ] दते 9 इसकी सर्वोपरि लेकर पि हेती है

इम भिरित रमचलिमनस एक अलीवदालकं प्न्य है | इवे प्रेम पवको श्द लेग मंत्‌ आदः दते है ओै इते पण्डे जैविक एं परसि भनेर वा सिद कते है षी नही, इतका श्र्पूवक पाठ भो ठम रतं इर उदो जारः मम के एवं के दुघ शच कलेते तथ श्छ वर्मित गवानी मुर रीयभोका विनत एं धरत कोते गस पर पुय एवं उत मी प्क मा्मम श्रति भनी जा सतो है भ्यो हे, निस प्यक सवना गला ठस्दासी-ैरे अनन्य भगदरच्े ्रार, बिन्धेने मान्‌ तमनो कपि दतकी दिय रोजा प्रयु जतुमब यया सफ गमन किष द, रषत्‌ पपत. श्तीरद्ीव अददे ठप जिसपर उद मारले श्वय शिवे घुनद््‌ छिव अने ष्ठे सही की) उपक कतस जीवित प्रत्र कोट अश्वक बत नही है देती यप अलिक पर्क निता मी प्रचार किया जायगा, बितना अधिकं पतान मनन-तटन शो, उतमा हौ जातक गदगर होग- - ननि गी सले मही है वमन समये ते, जव सत्र हाहाकार मा हुआ ई, मर संत दृ" अनति भीषण जले णा है, , ममत केवोनेे भरट मवी हे ओर प्रिदिन हनारे मतुका वि ष्टा है. करेशअलेकी सम्पति एकक पिनाके स्थि स्व

किन पी कि पूष्वीको शानके सपमे परिणति ६, से येने मसि संहारे नपेणये सनोर मे गत £, जगं ढन्ति का परत कले तया

{६५

इसी दृ्टिते मीताकी मति मानक भी कई हेटे वे, शद्ध, प्रामाणिक) सस्ते सवित्र एवं सटीक संस्करण निकाल्नेका आयोजन भोतप्रसके द्वारां ्िजा दा है इस दिम सरप्यम प्रयास आजसे गम आठ पू ङ्का था, जव निं श्रीरामचरितिमानसका एक सटीक एवं सचत सस्करणं कदे परमम प्राचीन परतियकि आघापर तैयार किया जाकर अन्य उपयोगी साम्रीके साथ 'ल्याण्के विरोधके रूपमे प्रकादित किया गया या } उर अहुत-सी रिवो हयनेपर्‌ भी मानसम जनताने उपतका कितना आदर किया, यह स्र छोरगोको विदित ही दै कु ही वमिं उसके आठ संस्करण छपे ओर ७८,६०० प्रतियां त्रिक गयी | वीचय श्रीसीतारमजीकी श्पासे एक मूख शुण्का भी छप गया, जिसुकरे छः वषे थृदर दस सकण शवं दो लव पै इजा प्रतियौ छ्प चुकी है युवे यदप छट होनेके कारण एक संस्र पुखकाक्मर भङषखी साज छपा गया, जिसके दो सामे तीन संस्करण चछ्यै ओर ४५२५० प्रतिय विकीं शके अतितिति मोटे यप यू रामचस्तिमानसका एक भलेचनामक संस्करण मी तिका गया, निस कई आचीने एवं अव॑चीन प्रतयोके पाठमेदोको देते हए तत्र पादम अपने पाकी साुताको दतुपूक सिद्ध किया गधा तथा मानसक्ी माकको सम्म विषा हो-सव्ि मानसका एक संक्षि व्याकरण गी उरग गोद दिया गया शृ संस्करणका दाह्य भोग होने तया अधे" दर्जनते अधिक दर न्धो चित्र, मानसन्यकःण, पठमेद एं पादुटिथणी आदि रहनेके कारण उसका मूल्य २॥) सा गया था

हस प्रकार पिठरे $ कभ -गमचरितमानसके'तो /

संस्करण निकले; वितु मानसाद्के अतिरि सदीके सत्क केच एक ही, त्छका, जो बहत भोटे टाप्मे है, निकल पाया उसके {यहम बूत दनेके कारण उसकी धृष्ठसंलया १२०० हो गयी दो संत्करणेमि उसकी १३१२९५० प्रतिय छम की है दूसरे संकर > ७) संस्करण भी प्रायः समाप्त हो युका है मनस्क स्के कारण सर्गोको मिखता नही था ओर मोटे यदपकी कीमत कम दमम एक सटीक सस्करणकी बड़ी आदरव्कता थौ) यह प्रयास है

(६)

दि चैह जथ दिवा गया है, जो मेरे द्वाली प्रति ह। पठ एवं भवी भूखे स्थि $ कह महातमपि कषमा््ना का मावच्छी चतु विन भानो ^ ्।

-- हनुमानप्रसाद पोदार दूरे संखरणका निवेदन

देशी को शरिरे यन्त कठिनताके कार इष॒ धार पुस्तक विदेरी कग्मोपर छपी गणी है ओर उपल कागजोकी सनक अतुः प्रन्को सादज भी हषण सोच वद्वर मं ष्येजो हो गवी है|

` यपि वरदौ कगलकि दाम दीक पक्षा अधिक रगे है, किमी रन्धका पूतय वाया भया है - प्रकाशक

पहरि श्रीरामचरितमानसकी

विषवषी

ए-ंस्वा ¡ विष्य

दिव" शस्य ई-नवाहमारयणके निभाम-खान ९४ | २९-शिवनीदाय सतीका त्याग, र्-मासपारायणके विभाम-खान १४ धिग्नीकी समाधि ४४ ङ-गोखामी इल्पीदासनीकी २४-उतौका दश्ष-य्मे जाना -*" ५१ शृक्षित नीयनी `~ `" २५ | २४-पतिके भपमानते दुखी होकर " ४-भीरामरलका प्रभावली १९ सेतीका योगागरसे बाना प-पारायणविधि. , ^" २१ दकः विष्वंस "६९ बारकाण्ड २५-परवतीका जन्मथौर रस्या ५१ (मङ्गलाचरण *"" |` २६-शरीरामधीका धिवर िबाह- ७-रार-बन्दना केिमिजनुरोष "ˆ, -"" , ५९ \ ' ८-नाह्मण-सेतवन्दना रश-स्र्पिवौकी परीमं परवती. ई-तलवन्दना * ““ जीका महत्त `“ “६० १०-संत.असंत बन्दना | २८-कामदेवका देवकार्ये ल्थि श१-पमरूपते जीवमावकी बन्दना जना शौर मए होना ˆ“ ६१ पर पलसीासजीकी दीनता जीर २९-पतिक्रो इदान "` “'* ६७ राममक्तिमयी कमिताकी भदिमा | २०-देवतांा शिवे भ्या्के शद-कवि-न्दना “",. "` ,५ व्िग्रयना करना, सतपि १४-बस्मीमि, ददः नहमारदेकताः कापा प्रस जाना ““* ६७ शिकः पर्वती मादक पद. ,१६ |. .२९-रिवलीदी भिवित्रवारावओर विवाहकी.दैवारी 4 बन्दना "` “;“ १७ १९-धिवरीका विवार शः गीर ज, १९ | स-व वि शछ-भीरामगुणे जौर्‌ शीराम- ३८-अच्दाके चऋरितकी महिमा | -५-न्दका अभिमान ओर १८-मानसनिमांणकी तिथि ~` *३१* ,मायाद् परमाव १९-भानसका सपक योर माहात्य ३२ | .र६-विश्गोहिनीका सव॑बर २०-यावसवय-मण्डान-ठंबाद शिवगर्थक ठया मगवानकोः = ~ ` हिया प्याग-मा्षस्य -" २९, | ; ` आए ओर नारदच् सोहमज्गं ९६ `

'९१-सतीका भम, श्रीरामदीका रेशर्वगजोर्ववीका सेद "`` ४१

२७-मनु-श्तर्पानतप एं वरदान; द८-मातुप्पकी कथा = "““" ११०

।.

३९-वणादित्र जन्यः तपा ओर उस्न देवं तया

अल्ाचार्‌ ˆ" "““ १२४ ४०-यृ्ी शौर देवतादिकी करम पुकार `" १३०

अश्-मगवान्‌क्त वरदान ``" १३२ रराज दनरथक परे य्ः रानिर्ोक्र मरमवती दोना "** १३४ ४६-शरीमगवानका माक्व्व ओर वा्छीलाका यानन्द्‌ ˆ` १३५ ४४-विशवामि्रका राला द्दारथते रागमणक मगना *"* ९४६ ४५-िशवागि्ि-यरकी रा --" १४८ ४६-आत्यउदरर """ १४८ ४७.शरीरमःदक्लणसदतिश्वामिष- “* क्र जनक्रपुस प्रेद “-* १५० ४८. भीगाम॑लकमणको देखकर जनकगीरी प्ेमुग्बता " '" , ४९-भरीरम-खत्मणकरा जनकपुर निरीक्षण [िि ) ५०-पुष्पवारिकानिरीन्नणः सीवा- जीका प्रयम द्॑न भी- मीताएमजीका परस्पर दैन १५९ ५१-भीरीताजीका पर॑ती-पूजन एवं करदानपाधि तथा राम- रषमग-षाट +) ५र्-श्रीराम-्मणसदित विशवामित्- का यशवनात्ममे अतय १६८ प३-भरीसोताडीका यशा

~~ १७५ भष~ना्ेि रुप उना, अनी निरामकः वाणी १७५

५७-भण्मह ५८-जयमा पएहनाना ५९-अररम-मण ओर परमः

संवाद """ १८८ ६०-द्यरयनीके एत जनक्रवीका

दूतमेनना, अयोव्यति वरत

ग्रान "*" १९८ -वारातकरा जनकपुरमे साना

ओर सागतादि "" २०९ ६रे-भीरीता-राम-बिद ˆ" २९१ ६३-वारातका अयोध्या लीदना

शरीर चवोष्याये सानन्द "ˆ` ९३९

-“६म-महचएण =“ =" २५३ ६६-रामरा्बामिपेककी तैयारी, देवतार्भोकी व्याकुरुत तथा ` उरते उनकी मा्थना २५५ द७-उस्तीका मन्धाकी बुद्धि केना, कैकेयी-मन्धरा-्ाद्‌ २६१ ६८-कैिवीका ऊोषमवरमे जाना २६७ ६९-ददरय-ेयी-संगद चौर दव्ररथ.शोकःघुमन््का महल. जाना ओर बसे सैरकर भीसमर्जक्ो हरमे भवना“ २६९ ४०-अीयमकेवीवाद "` २७८ ७-शरीरामदरथ-तंवाद, अवध- मिका विषादः कैकेवीफो खमटाना = "~

[^ ७र्-भीरमन्ैससयानठाद -"" २८द्‌ ७-ीरीवा-यम्तवाद्‌ `" २९१

७४-पीमनीतवा-सीव परार २९६

(९)

विषय एष-तंस्या | विय षस्य ७५भीरमपमववाद “" २९७ | ९२-वचषमरतसादः श्ीरयनी- ७प-ील्दमण सुमिना-सेवाद "* ` २६९ रो खनके िथे विकर

७७-भीरागनी, वकमणी, सीता- जनेकी तैयारी " ३६२ ओकरा महाराज द्वारयके पास ९६-अवोष्यावासिये दिद ्ीमरत-

बिदारमोगने जाना, द्यरथनी- इतुष्न आदिका वन-गमन ३७०

का सीताजीको समन्लाना `“ ` ३०१ ७८-भ्रीराम-सीता-कमपरका वन- गमन ओर नरनिबासिवोको सोये कर आगेचदृना " * * ३०२ ७९- भरमा शङ्गवेरपुर प्हुचना, निपाद दवारा सेवा "` ३०८ ८० -लक्षण-निपाद्‌ संवादः भराम. सौवासे इमम््रका संवाद, मन्तरका लौटना = """ ३११ ८१-केबरका प्रेम जौर्‌ गज्गाभार्‌ जाना """ ३९६ ५<८र-परमाग पटुवनामरदरान साद्‌) यमुनातीरनिवासिर्योका प्रेम ३१९ -८रे-तापतश्कएण “= “*" १२३ -८४-यपुनाको प्रणामः वनवासि कागरेम "दश <८५-भीराम-वात्मरि-तंवाद ` *" ३१३ -<ह्विवकम निवास, गोर्मीतमै- केद्वारा "` "““ -<८५-समन्व्न अयेोष्याफो जैना भीर सव ्ोक देना --` ३५५ -८८-ददयर.सुमन्न-संकरदः -८$-एुनि वरषठकरा मरतजीको इतने धये दूत भेजना *"* ३५२ ९०-भीमसतेशद्ु्का आगमन गरौरशोक (` '"" ३५४ 4१-मसत-मौपष्या सगरद , -लौर

३३८

- दरी अन्येहि करिया ३५७ | .

९४-निषाददी शका मौर सवनी ३७६

९५-भरतमिपाद-मिल्न = मरौर संवाद ओर मरत्मी्मा तया मगरवातिवेंकषामरम `" ३७५

९६-मरतक्ीका प्रयाग जमा ओर मरत-मदाज संवाद, ३८२ &६७-मद्वानदरारा भय्वका सत्कार ३८८ ९८-दनद-इषसति-ठेवाद “` ३९१ ९९-मरतनौ चित्रके मार्गम २९४ १००-जीसीताजीका स्व, भीराम- जीको कोकते द्वारा रपः जके आगमनकी इुतचनाः रामनीका शोकः सूपणजीका करो .. “"“ ३९७ २०९ भीरी = चकमगनीमो , समन्नाना एवं मरतजीकी महिमा क्न "`` ;"" ४०१ १०२-रतनीका ।मन्दाकिनी-लान) चित्रम पटुचना, मरतादि उवा परस्र मिससप) पतिका शोकं ओर भादर "४०२ १०३-्वािवोदराया॒मसवकी मम्दलीका सतकार, फेकेयीका फथाचाप `" `" ४११ १०४-ग्रपषठिजीका भाषि; ˆ" ४१५ १०५-जरीराममरतादिका सवाद्‌ ४१८ -२९६-अनकजीका पटुना, कोल ` किति मेट, स्र परस्पर मिद्य ˆ“ "`" ४२६

(८)

षव

नस व्‌,

एतसय

१०७-सख्य नना वारु#ी- 3 कया, धूण

वीतरमभधीच "" ४३६ १०८-काङ्गुतवना-वादः म- कीमपि - ` ` भ्द १०९-जनद्िप्दिसतादः टद दीपिनतससतोगर टरो साना ४३९ ११०-बीगमेभएसषाद्‌ = """ ४४२ १११-भव्ववोक वीये क्छ शापन तयाभिककरभरमम = "“' ४५२ १(२-शरपममससवाद्‌ पुश. गदाम्‌ मरतमकनेमिारं ` ' ४५४ ,{६--मररीमन मोषा कदन, भरतम पकक सपना मनि निवास ~ भौर श्रीलमैरे क्सि भरकम, =“ ८८ अरष्यकण्ड १९ "` `" ४६५ १६५-अब्दफी द्र मौर चति पमन प्व दति "^" ४३४ १९५७-यीपद-अनदूयामिल्न सौर श्रीक जनपरमिक पादिभ्दमं दद्मः =" ५६९ ११८-धीएममीको सागि ययाम, पिरव थोर फमहे रदर ४५२ 2४५ यति शना प्छ प-दतीमनेग्र आलय. पिः भगस्य रम दकत्व वर्‌ ४५८ ज्यु किप्‌ "- ^ ~ -पकयै तवाम शरम्‌,

सेरसथाद्‌ -- »,* ४५९

स्के एम अना खरटूणदिका वध ''' ५८२९ राके नरि जनीः शताजेवा उत्निः भ्रव यर माया सीता "“* ४८८ प४-मरीखन मौर स्गमृग- सप मारीचा मार्‌ कता ४९० त-स भौर भीधीड- किर "४४ श्र-ज्यमुरवपबुद्र = ` ` ४९५ १९७-शरीरमदीश्न श्रम, उदु प्र् """ ४९७. १२८-द््दद्वर "^" ५०० दर्प-वतीपर एमा, नवषामक्ति उपदेश जोर मासी मोर प्रयागे “= “' ६९७ ग१०-नादमनवद्‌, = `"" ५०७ ११९-स्व चे शौर प्न. , भदन शिप्रा किषणिन्धाका्ड ०९-गदरषु "= “"" ५१३ ३३-भीगम्ीवे ददम, ` ग्ना जैद यमी भिका [1 रेष्फीकका दुत नमाः वान्त प्रित श्रीयम. जैत मकुचछणर्णन " ५१७ (५. ५९९ र-गषिमु्मगयव्रल्छिदाप ५२५ दृग श्रध, तारजने भरम्‌ उपदे यैर कीत राप तेषा. ^ वय "^ ५२

नि

(१)

चिषरव १३८ ऋहु-र्णन "दर १३९-धरद्‌ऋहुव्णन """ ५२द्‌ १४०--धीरामकी सुग्रीपर सारी, सष्षमणजीका कोप ' "`" ५२७ ९४१-ुप्ीम-रम-त॑बाद चीर वीता. जीफी खोनके पि बरंदरोका परखान """ ५२९ १४२-रुपमे तपलिनीके दशन “` ५३२ १४३-ानेक समुद्रतपर आना सम्पात ओर पातीत ५३३ श४-समु्र॒लेषनेका परमदी, जान्वैतका तुमानूजीको बर याद्‌ दिखकर उत्सा करना दद ४५-ीराम-रुणका मादाय ˆ“ ५३७ सुन्दरकाण्ड ११६-ङ्गलचरण-* ** ५३९ १४७-इुमानूजीकाच्ाफो गरस्यान) सुपस भेट छया पफ़डने- वाटी राक्षदीका वध्‌ १४८-ख्हवरगनः = लङ्धनी-चधः छम पवेश" "५४ १४९-दतुमान्‌ विभीषण-तवाद्‌ `` ५४४ १५०-इतुमानूजीका जगोकवायिका- रीवाकरो देलकर दुली ` ` शेना भौर याणका सीताजी. को भय दिखलानां = """ *५४५ "१५६-भरषीता-तरिदटा-खैाद =" *" १५२-भीसीता-दतमान्‌-ठंवाद ˆ" १५४९ ५३-हमुमानजीदारा , अशोक- `“ कारिकाविष्व॑सभअक्षयकुमार्‌- " बधजौर मेघनादा हनुमान्‌- जीको भागपाचे धिक सभाम ठे जना

शषंसया विष्व

"५४

५८८

१६५ -ज्ीरम्युणणनी महिमा "

एृष-तंसवा १५४ हनुमान्‌ रावण-संवाद ` "" ५५४ श५-च्ह्वादहन , `" """ ५५८ १५६ ज्लनेके वाद हनुमान्‌- जीका सीता्जते िदा मगना जीर चूडामणि परा ""* ५५८ १५७-खम्रके इस पार आना) सवका लौटना, मधुवनभरेश, मुगरीवःमिलनः श्रीराग- हवमान्‌-संवाद "=` ˆ-" ५५९ १५८-शीरमजीका वानरी सेनाके ` साय चल्फर स्धद्रतरपर षहुनना ~ "^ २५९-दोदरी-ट॒वग वाद ` ""“ २६०-राबणको विमीपणकासमन्ञाना ओर िमीषणकामपमान """ ५६६ १६१-गिभीषणका भगत्ान्‌ भीराम - की शरपके ल्थि प्रखान ओर ्रणगराति `" ५९९ शद्र-समुद्र पर करके व्यि विचारः रावषदूत शुका आना लौरच्छमगयीफै फक , केकर छदना" “"" ५५४ १६३-तका , रावणो समक्नाना ओर उकमणीका पत्र देना ५५६ ६४-उमुदरपर शीरामरजीक्रा कोष ओर स्री विनती

५६३ ५९५

५८१ छङ्काकाण्ड

१९६-मद्गसचरय “~ “> ५८३

,] १६७ नसनील्दराया धना,

"५५२

ओरामजीदयय ` ्रीरमेशवसकी खाप्ना "““ १६८-ीरामनीका सेनासदित' समुद्र एर उठस्नाः सुतलपर्वतपर निवास -त्रणकी व्याङल्ता ५८६

1

(१९)

विष श्राकाक्तो मदोदगीश्न स्मन्नाना, चवर्ग अहल सवाद्‌ ५८७ ४० श्रीम होगी यैर चनद -“" ९१ ४१-भीरामयीत व्रणे पणुके मुकुर छत्ादिका मिरना -** ५९६ १७२दोदरीनन शिर रकग साता ओर भीरी "नी | ५५६-अहद्् ठेका जाना बौर रकीसमा यङ्गद-एका- ठर "९६ ¶५४-पपको पुनः मदोदरी्न सपान “"“ "^^ ६११ ‰७५-अीदरमतवाद `` ६१२ ¶७६-युदरम्म = -"" ६९४ १५७-मास्रारश्न राणो स्वाना `“ "द {०८-क्करणमेषनेदि-ुद्‌,ल्घमण- ` चैन शरकिखाता --

शतंत्वा | किव

स्वा श्ट्-ङुनमकुद उनकी पलमहि "^" दर १८८-मेबनादक्र बुद्धः सामर्जका सीते नातप षाना ६३७ १८५-गेधनादःयतियस, चुद्‌ ओर मेवनादःटदार --" ६४ १८६-एतणच यके व्थि प्रधान चौ मदीश विव त्था वानररप्मोग्न युद्ध ६४३ ए८५-स्का-रवणन्ुद = "`" ६४७ १८८-पकनूछ, रकम विन गम्यत युद '*" ९८८ १८९ शरपमर्बकेलिवि रथ मेडन, यमरवगुद ` ` ६५६ १९०-पेणकर विमीपणपर श्नि छना, यार्कप्रमिको अपने उष नः विमीपग- पवणन "६५४ ११५-पवगलम युः गवा वा सवत, गमद नाह -“ "६१८ \र केर इदः यव का १५३तमदाद्‌ "` ७६२ ९९४ पमानः रवण, सकने जवने ~“ ?५-गोदभप, र्म अन्ेष्टिकनिया --~ ९६८ तीप रव्वामिपे -.- (५५-मन्छीका सतीन उच इनन; सवाजीका चरः

मम १९८२ सुषि, ` ६७द्‌

६८१३)

पिय पृष्ठसंख्या विद्व पृषतस्य १९९-विमीषकी आयना; श्रीरामः ` | २१२रामवर्षठ-ंवाद, शरीराम- मौके द्वारा भरनी परेम वी मूद्वतं अमै ददा चणैनः बीत अयोध्या जना ~" ५७ , परहचानेका अनुरोध ` "`` ६७९ | २१३- दीका आना गौर सुति २००-विमीषणका -वलनामूषण \ करे गरह्लोकको ौट जाना ७२७ राना बौर वानंरभा्- २१४-यिकार्वती.संवादःगदङ-मोः ,. का-उनद दहना `" ६८१ | . गद्डजीका काकपुश्चण्डिसे २०१-पुष्यक विमानपर॒चदृकर रामन्कया ओर राम-महिमा ओसीतारामजीका अतधके , | ।खनना "७२८ ल्मि प्रान `" `" ६८२ | ९१५-कराकुुण्डिका चनी पूर २०२-ीरामचरितरकी महिमा ˆ" ` ६८५ जन्या शौर कलमिमा उत्तरकाण्ड . क्छ "७४४ ` २०३-मङ्गलचरण ^" ६८७ | रेपद-युर्नीष्न अपमान प्व - २०४-मरतःपिरह ठया भतत" ~ शिवलीके शाप्की बात मनना ७६७ हतमानुमिख्न, अयोध्य , | २९५ खाक """ ७६९ आनन्द ~“ ६८८ || २१८-दस्वीकन शिवनीसे अप्ाष- २०५-शीरामनीका छाग, मरतः भमन शर्र ओौर मिला, सबका मिल्नानन्द ६९२ ककगुश््डिकी आगेकी कथा ७७१ २०६-रामोच्यामिषेक) वेद्‌-सुति, २१९-काकयुश्चण्डिजीकसिमदाजीके चिवन्ुति "*" "` ६९८ फास जाना ओर त्था ` २०७-बानरो की अर निषादकी अंह पाना `" """ ४७४ पिदा सु २२०-ानि-मक्ति निरूपण) शवान '२०८-रमरन्यका वैन *" ५०७ दप जौर भक्तकी महान्‌, ' २०९-पुत्ोस्ि, अगोध्याजीकौ जि ७11 रस-रवनके जत भभ रे ` ( २१० यस भमी „` | -मन्डचिजक "` ०८६ -अभ यौरथीयमनीक उपदे ५१८ | ररर-मनन-मिय """ "` % २९१-जीरमलीकना नाको उपदे ˆ , | २२३-समाय-मदासव, ठस रीसमगीत), पुरवा ` > विनय ओर सक्ति “"* ४९१ ` इक्शत `" ` २र४-श्ीरागायणजीकी जरती "* " ७९८

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इत गमशल्यक ` परभावहीके; प्राय मिट कितीको अव कमी अपने अमीर प्रधका उर पाठ केषी च्छ. तो वधस ऊस -चकिको भगमान्‌.कीरामचन््रजकन ध्यान केना चाय ¦ तदनन्तर भदा विशषातूवंक, मनसे ममी अश्क, चिन्तन करते हुए पनाय पचारे क्म कुकी या. लोर लका. रख, देना चये ओीर धच कोष्ठक जो अघर हो उवै मुखा ए.

पे इते भी "रि चना 'चादिये "वः पकार रति न्वे स्ते जाना चाहिये भौर उनतक डिठते जाना वाशि, जबतक रती पहल कोके अप्रतक गु अथवा शलकु जाय पे गरक अक्षर निस पो जस नरो पकेगा, परेत पचे हचते खक चौ ूरी्ि.जदयी, मो अमङ़चमि यमौ? नख "उत्त देगी दस भावक भयान रखना चि किमित

(८)

मोतं कर धाद मा (1) ओर मिव कोके दोदो बटर अकर, मिते सय ते मरे ऋक जड देन कवि ओर दे जदोष कोह दो गर मनना असि वर त्न मोक मवे वं एरैरलित मक्षे धो मतर सिम नधि बौर नं दो भवतेव अवर इदो अर एतं उ्रन्लि ला चषि

उदाह्णे बोर एज प्रभाते फिर प्र उरं एक सैपर निक दौ बत दै प्क जाने ददे मिरीने मवान्‌ भौरमदव छान शरीर से प्म चितं कते हए यदि पशात सर विहर युं गे शो ययौ शत्रा सा भौर रमर वयि कर अनुजा अपो शिन विता मवा तो उत्तएलसम यद चौसरं जापगी--

चेद्ैसोरमेएमभनिरदःेकटिदरण्ददागर्हिसमाा

गे वाकम रिद गोर पमि पाद ६ै। प्भ्तंन एए शतस योगे वह सङा निनरष्मा दति होम सदेह है अतः पवार चे रेव

पो गिर ्यमरलन् प्््ठे आट भौमो मीर वनतरी लस सत भोउ के र] नौ

+ छिन भहट पू खमन ुपतौ॥

सन सा बमप्र्ो शीीरे गे पे मपे मतग

गीदाममन रीर दिवा 1 श-पन्ना मत रमर, णिद हो |

स्व समद रत्‌॥

सम-वचे दषठो इतुमन्ीे संं पव करोते समम |

एड गाना सरण ऋवारम करो, शता परौ |

पिद मि फन य्‌]

सम चं बनभ आमि एय रौ |

ष्क शव ममर सन्तो छे

सिक कठ पहि यि मु समत ते मं क्म मामे पस कोत्र े। पतं परर!

सवमतमिक जन्र तोदस्‌

पल-द वोषं शे न्तन ये चवे है!

कध रक, देगा}

भष्दुक्‌पि निक) मेष चि शः छव

षः गोखाी तरी सक्षि जीवनी

भवागे पार दा बि जापर नमक गरम वँ यामराम दुवे रिव सूरी ब्रा ये उन धरी ना षती | संवत्‌ १५९४ की भावप शहा पीके दिन अयुततमूड मयपर इन मावान्‌ दति. शर महेत यभ रके पात्‌, गोलामी हरीदारजीका जन्म हुमा चने गात तुतीदास रोये मी, किः उने ससे भाग, स्न श्‌ निकल | उनके, खम वीह दोत मौमूह भे | उनका. शी-ड पि वपे बामःसा या मए अदु. कस देलक पिता अमङगी शष्टसेभृवमोत हो रये मौर उसके समन्य ऋं प्रको करसन के ठो | मृ हरते देखकर षह चिलता ह| उन्दने बालके भगिषटको भावत, वमी रत्नो वत शिषो अपनी दाग उसमे समुह भेग दिया ओौर वू दिनं खयं शस असार हंसा चले |. दीन, षका नाम शुनि पमे पाका पठन भा जव सदाय तमग सा पो अड हः तुयो मौ दत्त हे गगा, भम ते परा भना हो गया बह द्वरद्ार मरके छा ] इप्‌ नगढननी परवती) उस शेनशर वापर दमा आयी जाहणीको देष धरेण एर तदिन उष पासा

उरे अभे धा मोगन का चरत | + षर मगान्‌. शडरकीकी प्रेरणा राम्थौरपर रदमेवठे भीयनन्तागन्दवीके सिष्य शरीरयनदमीने लको निका मौर उरक नाम रामयो ता उते मे अयोषया डे मये ओर वर्त सदत्‌ १५६२१ माप छह एमी दक्वा उस्म यशषेपीतसेर कराया रना सिपि बक रामबोयने गायत्री मनका उक्र भिना; दषे देखकर छम चकितं गमे) स्के शद नरि लामीने वैषये पोच संसार करे ,रमनरोजगनो राममन्दी दीश दौ शर्‌ मयो रद्र न्दे £ विद््ययन कामे जो ! याटढ रावो बुदि बद पवर थी पक भार गुले { नो हुन ठत गे, उने दह कष्ठ हो जाता या ] ररे $ढ दिन बाद गुर शिप दोनी ¡ चेन (रत ) पे भोरे द्वो मच इनका | दिल ,बाद री चठ अवे] मे शेष॒ एनान प्र खक दीदे वेदे ज्य सया | इष उनको लेना कुक च्‌ ते लौ भोर जपते चशे आश कक वे अपनी चमन से भि

(६)

हा उन पारस ने इम है उन पिधिप्कं अपे गप सरन कक्िगये दह्‌ ५८६ १६ दुखा भयो कवः यथ ठस निम भो वे सुप अपनी नवमनता कपे प्क वार उनकी खी माङि षव अपरे मदे चदे गयौ पपे मौव दुरे | उनसे नये सम उदयप जए ५) रः ददम शरत स्त इषं लख आधी म॑ गि मयनं ते हप ेहा पर छे गय हेव ।› वीसतयैहो गे चट हम गे! मे एण गी नहं केतव वहि; ऋदिपि। | परे चल दशरीरावद राम वे वं उन् समप परिया करए प्रण किव वीरय हए धी पव मनोव उन कभुधगडरे ददन ए} कास ददा रषा कशे को | उदं दिन पक पेत मिल, धिके समग्मत कथमा ! एुमालीहि मच्छर ह्छीदाऽीने उने शीएुगयनीका दन कने भर्व एनुमासलीने कः इमं नत्र सनाय दन गि ! प्रर तरीदासनी भ्रू गोर चट पदे विवद रब राद उन्दने अपना आषन अमाया दिनं वे परदषिणा के निष्ठि ये मरमं उन श्ीएमके दन उन्दने देषा दो हे दर र्म भोक्षपर स्वरोः धतुषाण ष्णि ठे दपर, वी उर देल पष गये पु उन वाय स्ते पर एतप्रानूकीते जा उनसर मेद्‌ ययाः से बे वडा प्तप उएे लो ुभानूजैने ऽन जन्ते दौ कद तश्र पि के ग्‌ १६०४ यी नौ अमवा दुवे दिन उने शमने भगवाम्‌ शौर पनः | उने न्क ठ्सीदासतीरे कावा चदन दो

दहुगनजीने सोचा, भे बर मौ वोदा ता बर इवश्व न्दे वेतेक धारम दोह दा

पव मदन मुय धद सु हीवापयी उष द्रत खगो दार शीत सषि मूड गये \ मगान्‌

अपने छे चनदन तेम मपे तण दीदे मदकल श्या चौ अन्तर गे {

(७)

\ संक, १६२८. ये हतुमान्ीकी आहारे गवोध्वाकओोर चछ पदे उन दिने प्य मपे था ऊढ दिम वे.उदर मवे! पर छः दिन वाद्‌ एक वलदरके नीचै उन्दं मर्दन शौर वाज्वसकय युके दर्शन वँ उर सघय कही कथा है सं थी, जो उन्न सुेत्रम अपने गुरते इनी थी षषे भे कादी चरे भये सौर वँ दाप एक ब्राह्णके निवासं किया] वदो उन द्र कवित पिका सुरण हुमा ओर बे चं एय-स्वना करम श्ये परु दितमे वे भितने स्पते, रोगि स्र शे जते। "यह पटेन रन धटी | आध्यै दिन उपीदासत्ीको सपर हा भगान्‌ शदे उन आदेश दिवा कि छम अपनी मापा का्यत्ना को! तुखतीदासजीी नीद उचट गयी ! वे उट गवै इसी समयं मगवार्‌ शित जीर पाती उनके सामने प्रकट हुए ुषपीदानीन उन साङ्ग परगाम क्या धिवलीने क-म ' अयोध्या जकर रहो मौर हिन्दी काव्य्वना फरो भेर यीवादषे तार, कथिता,ामेदके : मानः वती, शेगी इतना कषक भरीगौरी्ध मन्थानः -ये 1 इन्रीदारीः उनकी याहा धिरो केर फशीते अयोध्या, चे आरे ॥, , ' ^ ५६५

संथत्‌,९६३१ का प्रममहुमा } उस साठ रामनवमी दिन प्रायः वैसा षी भोग ' था जषा तयुगे रामजन्मके,दिन` था] उर दिनः परतःकाल श्रीदतीदावीमे भीरामचरितमानसी रचना रमर दर; सत्‌ महीन, छन्नी दिन ययक एग एकत्‌ १६११ मायै शमम रामना; पूरो मुष्ड पूणं शेणे।

इसमे गाद भरावान्की याक्षे दीदाय, अी। चे जावि रो उन्न भगमास्‌ विशवनाय जीर माता भबपूणगो भीयफरिमानख नाया | शत प्तक ओीविदनायरके मन्दम एत दौ गयी स्वैर पठ सोक गया .तो उस्र जति हमा पया य्या शिव न्दरम्‌, भोर मदे मगबार्‌ शी सी यी उह सपय ऽपित गेन (सत्यं धितं न्दरम्‌? कौ आग मी नेति नौ '

इष पणेन जद यह वात छी तो उनके ईष उलन वे दर भकः दच्पीदासजीकी निन्दा कले छो ओर उस पु्कंको मी नए कर देने परल कले छो उनहेने पष्क इरे स्थि दो. चोर मने ।रेनि लाकर दे लतीदासीमी कके मरगार दो वीर ध्ुनोग व्व दे द. दे पठे दी छु वाम चौर गौर रमये उनके दन चोरी डदि दो य्व |. उन्न उती मये चो कला छो दिवा भौर मनर गवे उल्शीया्न जने छे मावो हमा लान इयत खरा चमा दिवा, पुकः ने पिन

याम ख--

( ८).

येम इते उर पल दर रि सिसी उरते भाषा वो देयः जो प्क प्रर दनदिन भढ सय

षर पतेन ओर केह उपाव देख भीमुहन शरतीतीो उस पु्कयो देखतेकी एफ की, शीरुसूदन समते उते देकर वही प्रस्त अदद ओर उमर समर स्च दौ-- `

यन्न दसिलमौवर कवि क्रि सम्मित

शू प्रवीरौ भननदवनमहरीराख -वस्तरिता शकती पषा है उदकी कतरारी मञ्चरी बदरी सुन्दर & -निषपर श्रीरमरगी गरा सदा प्रदरा कार ~

पष्डितोफो इपर भी इन्तोपं नह मा तव पु्ककी एरीभाकर एकं उपाय भैर शोचा गवा} मगात्‌ सिन सममे चे उपपद, उन नवे शाद, पालके मे एण बौर छव जीेःरमचेरतमनघ रव दिया भया मन्दिर वद कर दियो ताक सत मन्दिर लोल गया लगन देखा कि भौरमवितमानए दमे सा. हया द। जव पति ठो यदे ललित हए \ उम इीदाषनीष गोपौ नौर भिरे उनः चोद व्थि.।

रवती भर वष | रे एए धार

कद उनम पए यवा भौर हदो ¡योलपीमीने इवमलकर यना | चमी उन वत षद स्वो इपर गोला प्रिनयशमिका हिती ` चैर आबे परग करौ | भयानकम गो शवर हि भौर शीसे निर्य कर हि| 6

ठ्‌ २६८० वग छना दृता चनो सूषा गोला यम,

गम हए अपन छर परिय भया

(२५)

सथान चौं भीुमारजके लंकां पेद केम उमयमी रै -भदन दुत भे दै सरं सफ़र होया | ७-मदम कमेः सुरस समी \ ` सनुख घरं अह धीर स्थान-गृह चौपारः छंकाकाण्डे रावणकी मृसके मन्दोदरी विधे रसे है 1. एकाय पूणं हेमे सदेह रै | (सुल सनैष्य दहु हम रु कलु सुनि मए पु , स्थान-यह चोपाई ब्रार्कण्डमर पुष्पवाटिकाते पुण श्नेपर विधामितरनीका ` आशीवाद दै! ^ फषट-परपन बहुत उत्तम दै कव रिद हेग ` परभा, एमदााकापरनावर्ते कुल नौ नौपाह्ो बनती £ निन चमी प्राप प्के उत्तराय सक्षि ` " ,., एरायणविषि शीरामचरितमानचक्न विधिर, पठ करेवञे मतमान परार पूव शरीसदासज,भीवासमीिी; भिवन तया शीहमाूलीक आाणूबन कोम पाद्‌ तीनो मर्वोसदित भौषीतापमीन यवादः ोवोप्ार शून नौर नान का चि | वदन्तः पन्न आम करना चि सके आवाहन, पून भौर घ्वानमे मन्न ममदः नीचे लिलि सते है ^ 1" ` ' अव सांबाहनमन्वः " हरसीक , नमसड्यमिागच्छ षित जैकव्य उपदिश्येदं॑भूजनं श्रितास्‌ 9 तुुखीदास््य नमः वारम नमस्तम्यमिक्षागच्छ छमप्रद इततूषंोम्ये पिष ग्व गोऽ्नम्‌, वारमीकाय नमः मौरीपते भा्ुन्धमिष्गच्छ मेस पूव॑द्िणरमष्ये सिष्ट पूर शृण मे गौसैपतये नमः

`" शीर्ण नमस्ुम्यमिष्ागच्छ स्टभियः आस्यभामे समातिष्ठ पूलनं संगृहाण मे श्रीसपक्गीकाव छकमणाय नमः शरीपतु् नमस्ु्यमिहागच्छ खह्ग्रियः , , शख पथमे मामे पूतं शवीहरषव मे 0

दके सपे चिहूर शृण मे खीसपलीकाय मर्ताय तमः शरषानिषे ूद॑मगे सावि पनं सोकर भमो हदुमते तमः अय अथानपूजा कन्या विधिपकम्‌, \ पाष गृहोतवा ह॒ ध्याते ङवौसरख सछम्ोजलाभिएसनयनं ` पीताम्बरं श्यामलं भस्रवदन शरीतोठया शोभितम्‌ 1 करूयामृतसागरं भियिभोभिमि मौनि चदे दििषायरेनयरिो मखेिददम्‌ आगषड जानकीनाय अनका राद तं शाद १०५ सुवणेतषिते राम दिन्धारणयोभितम्‌ अनं दि सः याण मगिचितनिम्‌ ११॥ परत रोदशोपचारः पयेत्‌ शाल श्रमन्मानररामायमधीरामचरितिय श्रीरिवकाश्युट्डियातल्मय- गोसिया ऋषय शरीसीरारामो देवता प्रीरमनाम वीजं यथरोदरी मिः

किः मम॒सिवनतासदिभनतया शीसीतारागीतभूषेकसगछमनोरयसि धथ पे बिनियेरः 1

अथाखमक्षम्‌ शरीतीतराम्यों तमः 1 शरीरस्य शरम कमः 1 इतिमन्रतिरयेन आदयते इग्‌ वीवो प्राणायामं कपौय्‌॥ ङ्य करन्यासः षत गुन प्र रमर धुनि दे षन चरम चम ङे | सभ गम करहि > अपु पनि पृषु स्मह समैीभ्यं नमः

स्णः॥

स्कर गाड ठे वमक 1 नथ अवं हग गने बृप

(२३) मध्यमाभ्यां नयः उपा दाह जमिति कौ नाई \ सहि नचाव रप मेसा ` ` ` अनामिकाभ्यां नमः , शु हेद ओग मेहि जही} जम॒गरटि सय नासं ठव ' बनिष्ठिकाम्यां नमः मामिर्य सपुकुनामक धृत बर चप थिर कर सायक करतर्करगृषटास्यां नमः दति कट्यासः अथं हृदयादिन्यासः 41 मेक गुन श्रमः के। दनि मुडि धन वा पाम $ इदेयाय नमः गाम रंहि जे जमु \ न्धे परपषुन समुद , धिरे लाहा राम सकल भान्द ते भयिक्ा! ्ेठ माथ अव सग मन गिद्य पिलायै बषट्‌ | स्मा दाक जैधिव की नष \ सवि नवत यामु पेष्‌ कवचाय हुम्‌ | सन्मुख दोर भीर भेदि जवी \ जनल कोटि अथ नां उवह , नेत्य वौषट्‌ माममिरुम्‌ रदुञ्रनाणर धूव चार सिर कर खम अन्नाय फट्‌ | ४ति हृदयादिन्याछः ." अथध्यानम्‌ , ~ मामद्य 'पकजरो्न \ इष ॒विोकमि सत्व कियन ` मीरे वाषरस स्याम कामम अरि } छदम कंन भकं मषुष॑रि जघुणान कर्य नरु रमजन \ मुनि सनन रंजन अघ ग॑मत्‌ भूसुर सि सव बंद बराक \ अएन सग दीन सन साह सुम न्त भार भि उडद खर दून निरव वष॒ धटितं शमनर इदस्य ` मूमः \ जम दस्र शुर दुर सुकर ॥" "जत पुरान नित निगमा गत मुर युति संत समागम आसती ्यतीक सद खंडन \ सन वयि कुस केसा मेडन करि अह मन नाम भ््ाहन ! तुरिदास भ्रु॑फदि धन॑ कन इदि ध्यानम्‌

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गणेश्व नसः भरीजानकीवलमे विभ

श्रीराचरििमौनेस प्प सोपान.

बारुकण्डं णौनामर्ं च॑ सुधानां `. रसानां ~ छन्दसामपि , कतौ ` उन्दे धाणीविनायकौ अक्षरो, भर्म, रतौ, न्दौ -ओौर मङ्गलो केवाली सरखतीनी मरं रणेश्ीकौ $ वन्दना फरता |

अदधाविश्वासर्पिणौ !

याम्यां चिना पदयन्ति सिद्धाः खान्तःस्थमीश्वरम्‌ .॥ - .- भद्रा नोर पिशा सर्प श्रीपावैतीणी योर शीर्टरजीकी मै चन्दना ता है निने 2 अन्व्टरणमे महीं देख सुकते

शृदररूपिणम्‌ 4

यमाध्चितरो हि ककोऽपि वेव वन्यते ३-॥ शोनमय नित्य, शंकररूपी गुर मँ वन्दना कर्ता ह, जिने भारित हेन

-शीय्वा चेन्मा मौ सव॑न न्दत रोता दै -

स्ीदाशमयुणग्रामयुण्यरण्यविदारिगौ कदे - -. विदय्विश्ानौ कवीश्वरकपीश्वरौ भीप्ीताराभजीके युणघमूहूपी पयिघ्र वनर्म विदयर केष रिद्‌ विश्चनसमन्न -कवीधर श्रोधासमोडिती ओोर-कपीशवर भीहतुमानूजीकी बन्दना करता हँ स्थितिसंहारकारिणीं ह्ेशदारिणीम्‌

उद्व सर्भ्रेयस्करीं सीतां - नरोऽहं यमष्माम्‌ उत्ति, खिति (.पारन ) बोर संवर कलेवर) ब्ेशकी हेवा तथा समबूणं हणो करेगा भीरामचनद्रनीकी परिवतमा भतीतानीकर गै नमसकार कत्ता टं ॥५॥ चम्मायाचशावतिं विश्वमखिलं ब्रहमादिदिवोरा यत्खत्वादसूषेय आति रज्जौ -ययद्वि्मः यत्ादष्ठबमेकमेच हि मवाम्भोधेसतितीपोवतां चम्देऽहं तमशेषकपरणपरं रामास्यमारशा हरिम्‌ १.६ जिनदी मायके ,वीमूव सम्पूणं विश्वः अहयादि देवता ओर अश्र दै, जिनकी सत्तार ररी रफ शरो मारि यद सा ृशय-नगत्‌ प्रतीत दता भर

च° १--

समिमामद

=

वद स्के वि मैभ्ररै

खशि भौर पे } श्रते भाक्‌ कती $नया क्य ६।६॥

द्‌ समये तितं इवियलोऽपि ६. पा वे बर [ ठम ] शे उमर रप मे समाप रित ६) भमा कत कमतो छो धि शट मोह परव नदत | ७६ से- सुमित सिधि गन दाय रिः चदन रय दुह बुधि सा घुम युत सदत \॥ मि एए कतरे श्त रे वेमे तापी शरद ४३६ इक्र सैः मे पम (फो) एष कृषक ॥१॥ चदु वामक एयु वेद्‌ गिरिवर धप 1 शूल1२॥ पि पगे पू वह इर मेनका त्त परर मदरद्भ प्प शा ६, दण्डे सव पाको रेल गमि दाह (कपम्‌) (दर इ) २} सयेद जाए; वर भदन वारित भते एर षो इर धप करार एषद वत 11 शोभते दै, कषम भवा नरम (द दह मा प्र ४८ यन एर प्रेद करड शा मद भत्‌ ४॥ 0 शः (त पि पदता मद

भग ५.) घन सदं दुष शायन्डे पतव सीद (क प) नतद कम (त)

# -वाल्काण्ड |

य्दर वणं रै, नो ऽप्ूणं भवरोगोकि परिवारफो नाश करेवाग टै शरृति शरञ्च उन विगर विभूती ! संक रगु मोद्‌ प्रसूती जनं मन मंज युङ् हनौ किदँ तिरक शुन शन बड करनी बह रज दती ( पुष्पवान्‌ एर्व ) रूपी धिवनीके ध्रीरपर स्मित निर्ग विभूति है जर युनदर फस्याण.ओर अनन्द जननी ३, मक्र मनसी पुत्र दर्षे मैरको व्र करेवा -गौर तिचक करने गुम उमूरको वम करनेवाकी श्ररुर पद्‌ नख मनि शन शती सुमिरत दिष्य चट हि होती इरन मौह तम सो" सप्रकासू अदे भाग उर शाद्‌ जासू ६॥ शु महारा रणतो व्योति मियो प्रका समान दै, भिएफै सरण करते दी दयम दिव्यड उतर हो नाती ह} यह परक सकानस्पी उन्धारक नाश फरेवाा दै; वह जितै दयम जाता दै, उत्क बदे भाग्य | उधर विमट विरोचन ही के ! भिदि दोष भव रजनी कै सुहं राम चरित ममि मानिक युत गट नो सेदि निक ॥५॥ 4 उसमे इयम मते हदये निग नेत् दुक जाते टै ओौर संस्र रपरे दोष्धुःख भिर जाते एवं श्रीरामचरिनस्मी मणि ओर समित्य, गु भोर प्रकट स्ह भिस सारे दैः सव दिायी दूने ठते ६-॥ | शे-जथा भजि दग खाधक सिद्ध नान सख षन भूतल भूरिः निषान लैर शिद्ा्नमो मेनं कगार घाध्क, सिद भौर सुला परव, भैर प्रलीके शंद्र मौद्कये दी बहुद-ी खाने देसते'ह | ` चौ -युठ पद रज खु संह चंजन नयन भमिभरग दोष विजन तेहि करि विमत बिनेक विदन बरन रास धरित मय मोचन १॥ ` शीयुर महारावे चरौकी रब कोमह चौर इन्दर ननागृत-ज्ञन ह, गो दोक नाय केषाम दै उस अज्ञत पिवेकरमी ननो नगर कफ धै छंशारपरीबन्धनरे ुदामेभणि भ्रीसचरिा वणंन कता | धद थम महीसुर चरना मोट लनित ससय सद रना सुजन समान सके शुर खान कर प्रनाम सप्रेम सुानी ॥९॥ पले परष्वी$े देवता आहेके चरणोी बन्दना करता एः जो शानते उन्न , शव छदन हक हं | रःस र्ोकी सान धमान ममत इन्दर वाणीस णाम करता हँ | प्र "५. चरित सुभ चरिठ कपास निरस नितव्रगुरनमब फल जासु ज्ञो सषि दुख परचद् दरवा चैद्य बेट जय बरस पावा ३॥ इतना चिव कवे रिग ( जीवन ) के सपरन शरम ह, निरा नीर विद्‌ जीर शुम होवा दै। ( फा डोडी नीरत हवी ‰, वंद मी वमाप नर शते बह मी नीरव कयाय उन्जर रोता दे, रेका इय भी अशन मौर पापसर सन्वन्नरतेररि हा इरे विमद नौर का शण (कु) हेते दै, इलो मग्र तकर चरि दूयणौक मण्डर हेता इष्य गमय ई} ) [ ठे काका पाया चवि दसन जपना ठन देक ठर य, अगवा काठ छेदे चत, कति चने भौर इने यने पकर

% रामचरितमानस

त्त सत सोणे उक जी १६ वः को (देत) ने वापि उसमे नं दृदलीम पराह पिया ३॥ शद्‌ मंगद्यन सह दमान्‌. दो जय अयम दीरयपनु. # श्र सचि घः युररि रा ¦ क्म्‌ ब्रहम विचार भचार ॥४॥ तष समा चाद. योर दल्यगास £ जे चते चक्ति सीन (पराम ) 1 चं (उर सदसपनगै प्रवगरन्तरं) मभकिरूपौ महीक दै मीर ्रहमिवास प्रचार सरतीरी \ सिधि निमय कडि भर ह्मी करम ङा रननदन चनी क्ले कथा चिरा्सि येन \ सुमत सन जुई सगर देनी ५५५ विमि मौर नेष ( यह करो ओर वह्‌ क्ते) र्यी केकी कण प्शुगक पतन लेब ना मवी र; ओर भगवानु भौर शी परिणीलपे शोभित है जो इते ही आगन्द जै र्मी वाही ६॥ १॥ बट्‌ वित शरद निज धरा; तीरथ स्मन दला =, सरि हुखम सेव भिन देः सेद उद्र समन रेः [ उम उत्व मामे] सपे धमं शद विशाम वह मघ ४, भैर शम र॑ प्ै ऽव दीक वमा { पिर ) वह ( ईंपनपी ्रागरल ) दग, स्मय समीक हतं भात हे सक्त है मीर भादर पद स्व कते कोक केना कध कनक रीरमन दह्‌ सय षठ धरयट प्रधा ॥५॥ दीयत सीर ओः अयम एं काल देनव है उरक पमा पर्प योनि समुदि जन शुदित मन मन्न अति धनुखगः ! इहि चारि फर हत, तड खाधु सभा प्रयाग जेभनुष्यद् नंदत्माज्यी तौैरकर प्रमाद पसनन प्म दुनते धोर्‌ एमे ओर पर भलन् परय मे ल्यते वरीर चे दी पम, भये, पष्‌ मेप पण जते६।२॥ च-प एष पतिम नप्कषला हह पिक वकृ मराद श्रै जनि कोई 1 उति सदि निं मो ९६ अती लान तत्काेग्रादेडनेगे यता कि यौद यह वृन तिह रे इन्तो अर्वन के सोक ता गगा टिपी ६१ पते नर्द ष्टनी ! मिनि थुखनिकरनिनदोती¶ खन्य्‌ धरर नभ वानो |> खदु देन रीय भश्चना 1११ _ मन" नाली जर आग्वदीने अपने-अपने अति वनी हनी (लंगा चन्द ) दै द्ये रेव, जगीर च्डनेवाछे भः भवाम वेगम माने नके सम दी सतर, | ^ सिक्ते ग्रहे रि ग्ड नन बेहि जतन वौ पाईं } सदय प्रमाड लोक भम्‌ उपाड १५. नये भते विटं एण्य उदी भौ सि किती इ, आति सहरि,

# वाल्काण्ड.

विभूति ( रेश्रयं ) भौर भलाई पायी है, खे सवर सततंकन ही पमा समञ्चन भवादिमे ।,वेदोमे ओर लोके इनकी प्रातिका दर्रा कोई उपाय नही है ति सत्संग भिवे दो] राम छपा वि शुख्म सो "स्मत शद मंगर शूका सेड्‌ फढ सिधि सब सावत पूरा ४॥ उतत तिना विवेक नहीं होता, ओर श्रीरामजीकौ कपे धिना वह सदम दरे मर्ता नष } सत्ंगति भानन्द्‌ ओर रुल्याणकी जड़ है संगी तिद्ध ( प्रपि ) पफ दै, शौर स्य सधन ते परल है ४॥. - "एं धधि रुवसंगति पा पार परस धात शुाई , + विभि घत पुजन छुगतै, परह एमि मवि स्म निघ युन अनुतर 7 इट भी सतसगति पाकर षर जते जैखे पारस सप्ते सक सावना हो जता (बन्दर सोना