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नागरिक शास्त्र की विवेचना ()

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लेग्नक

दब गोरख नाथ चौथे एम्‌० ए०

आधुनिक भारतीय शासन, नागरिक शाघ्त्र प्रवेशिका, भारतीय नारी, आदि ग्रन्थों के रचयिता।

अकाशक

रामनारायण लाल

पब्लिशर ओर बुकसेलूर इलाद्वाबाद्‌

द्वितीय संस्करण ] १६७४३ [ सूल्य ३)

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्‍्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिदृदुःखभाग्मवेतू

प्रथम संस्करण १६४० इ० द्वितीय संस्करण १६४३ इ०

प्रथम संस्करण की भूमिका

आवश्यकता अनुसन्धान हक अब तक हिन्दी पढ़ने वालों के अभाव के कारण लेखकी। की हिन्दी साहित्य की ओर थी। केवल थोड़े से लोग, जिनकी संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है, हिन्दी में किस्से कहानियाँ लिखा करते थे | शाख्र सम्बन्धी पुस्तकें अंग्रेज़ी के अतिरिक्त इस भाषा में तो लिखी ओर पढ़ी जाती थीं। आज भी हिन्दी साहित्य में किस्से कहानियाँ पढ़ने वालों की संख्या सबसे अधिक है अन्य सामा- जिक शाम्रों को लोग इतनी उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं कि अच्छी से अच्छी पुस्तकें उन्हें नीरस जान पड़ती हैं। इसका नतीजा यह है कि हिन्दी पढ़ने वालों को अपना बुद्धिभांडार बढ़ाने का अवसर नहीं मिलता हिन्दी की ऊँची से ऊँची परीक्षायें पास कर लेने पर मैंने लोगों को ए० बी० सी० डी० पढ़ते हुए देखा है। इसलिए नहीं कि उन्हें विदेशी भाषायें सीखने का शौक है, बल्कि वे साफ़ कहते हैं कि हिन्दी साहित्य में उन ग्रन्थों का अभाव है जिनको देखे बिना आधुनिक युग का ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिये विवश होकर उन्हें अन्य भाषाओं की शरण लेनी पड़ती है। दरियाफ़्त करने पर मालूम हुआ है कि हिन्दी में शास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ इसलिये नहीं लिखे जाते कि पढ़ने वालों की कमी है | लेकिन दूसरी ओर यह आम शिकायत है कि ग्रन्थों की कमी के कारण विचारे हिन्दी पढ़ने वाले तड़फड़ा रहे हैं इसी खींचा- तानी में भारतीय साहित्य की उन्नति रुकी हुईं हैे। कुछ लोग कह सकते हैं कि आजकल हिन्दी में बहुत से ग्रन्थ निकल रहे हैं ओर इसकी उन्नति रुकी नहीं हे, लेकिन यदि वे बुरा मानें तो में यही कहूँगा कि उन्हें अन्य भाषाओं की उन्नति का इतिहास सालूम नहीं हे

शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होने के कारण लेखक ओर पाठक दोनों ही उलभन में पड़े हुए थे। लेकिन यह बन्धन किसी दृद तक अब टूट रहा है प्रान्तीय सरकार के शिक्षा विभाग ने माठ्‌ू भाषा

( सत्र )

की उपयोगिता स्वीकार करते हुय कालजों तक में हिन्दी भाषा में सभी विषय .पढ़ने पढ़ाने की आज्ञा दे दी है। लेकिन पुस्तकों के अभाव के कारण विद्यार्थियों को अंग्रेज़ी छोड़ने में भय मालूम पड़ता है। अध्यापक उन्हें अंग्रेज़ी ग्रन्थों का ही हवाला देते हैं हिन्दी भाषा में उन विषयों पर जो थोड़ी बहुत पुस्तकें हैं, उनके अन्दर वे सार मोजूद नहीं हैं जिनकी आवश्यकता एक साधारण विद्यार्थी को भी है। यही वजह है कि अध्यापक वा विद्यार्थी दोनों को उन ग्रन्थों का नाम तक मालूम नहीं हे

गत वर्ष मुझे एफ० ए० क्लास को नागरिक शास्त्र पढ़ाने का अवसर मिला। अधिकतर विद्यार्थी हिन्दी में इस विषय को पढ़ना चाहते थे। लेकिन पढ़ाने के पहले उन्हें कुछ ग्रन्थ बतलाना आवश्यक था। जब पुस्तकों की तलाश की तो पता चला कि हिन्दी में नागरिक शास्त्र के ऊपर एक भी उपयुक्त ओर प्रामाणिक (50574570) ग्रन्थ नहीं है विबश होकर मुझे अंग्रेज़ी में ही इस विषय को पढ़ाना पड़ा उसी समय मेरे दिल में इस बात की तड़प पैदा हुई कि नागरिक शास्त्र के ऊपर एक ऐसा ग्रन्थ लिखना चाहिये जो एफ० ०० के विद्यार्थियों की आवश्यकता को अच्छी तरह पूरा कर दे। हिन्दू महिला विद्यालय इन्टर कालेज के व्यवस्थापक श्री बाबू भगवती प्रसाद जी ने मुझे इस काय के लिये और भी उत्साहित किया इन्हीं की प्रेरणा से एफ० ए० की विवरण पत्रिका मेंगवाकर पाख्यक्रम के अनुसार इस ग्रन्थ को लिखना आरम्भ किया। आदि से अन्त तक इस बात का ध्यान रक्खा कि यह ग्रन्थ हिन्दी में ऐसा होना चाहिये जो अंग्रेज़ी के किसी भी ग्रन्थ से कम हो। मुझे इस उद्देश्य में कहाँ तक सफलता मिली है, इसका निणय नागरिक शाख्र के अध्यापक ओर विद्यार्थी ही कर सकते हैं। जहाँ तक भाषा का प्रश्न है, मध्यम मांगे का अनुसरण किया गया है। कोई शब्द ऐसा नहीं आने पाया है जिसके लिये कोष या लोग़द उठाने की ज़रूरत हो। भारतवषे की हिन्दी पढ़ी लिखी आम जनता जिस भाषा का प्रयोग अपने देनिक जीवन में करती हे उसी भाषा में यह ग्रन्थ लिखा गया हे

पुस्तक लिखने में मेरे प्रोफेसर डाक्टर बेनी प्रसाद जी और

( ग।)

डाक्टर ताराचन्द जी के विचारों से मुके काफ़ी सहायता मिली है इनकी पुस्तकों से जो सहायता मेने ली है इसके लिये हृदय से में इनका आभारी हूँ। प्रोफेसर इलियास अहमद के राजनीति के प्रारम्भिक सिद्धान्त ? (78 ए772ं0]63 ०[ [00!08) नामक प्रन्थ से मुके इतनी सहायता मिली है कि उसके बिना ग्रन्थ का इतनी जल्दी समाप्त होना असम्भव था। इनके अलावे मेंने उन ग्रन्थों से भी मदद ली है जो राजनीति शास्त्र पर प्रमाण समझे आते हैं पुस्तक के अन्त में उन ग्रन्थों की एक सची दे दी गई है जिनसे मुझे इस ग्रन्थ के लिखने में सहायता मिली है। प्रफ़ देखने में श्री कृष्ण जी द्विवेदी, राम चन्द्र जी मिश्र, विद्यासागर जी साहित्य पत्र तथा आचाय श्रीपति जी शास्री से मुफे काफ़ी सहा- यता मिली है। में हृदय से इनका ऋणी हूँ | कुछ अन्य मित्रों ने भी समय समय पर सलाहें देकर पुस्तक के लिखने में मदद पहुँचाई है | उनके इस कष्ट के लिये में अत्यन्त ऋृतज्ञ हूँ साथ ही श्री बाबू बेनी प्रसाद जी अग्रवाल के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट किये बिना में इसलिये नहीं रह सकता कि उन्हीं की प्रेरणा से यह ग्रन्थ इतनी सफाई ओर सुन्दरता के साथ प्रकाशित किया गया है |

विद्यार्थियों के हित का ध्यान रखते हुये पुस्तक के अन्त में उन तमाम प्रश्नों की एक सची दे दी गईं है जो नागरिक शास्त्र पर शुरू से अब तक यू० पी० इन्टरमीजियेटबोडे में पूछे गये हैं। जो ग्रन्थ हिन्दी साहित्य के एक विशेष अंग को पूर्ति के लिये लिखा गया है, और जिसके लिये में अनेक लेखकों का ऋणी हूँ उससे यदि पाठकों की ज्ञान पिपासा थोड़ी भी ठप्त हुई तो में अपने परिश्रम को सफल समझूँगा।

अयाग

पक गोरख नाथ चांबे

हितीय संस्करण की भूमिका

नागरिक शास्त्र की विवेचना ' का दूसरा संस्करण पाठकों की सेवा में उपस्थित किया जा रहा है | जिस उद्देश्य से पुस्तक लिखी गईं थी, और पाठक गण से मुझे जो जो आशायें थीं, उनकी पूर्ति से मुझे सन्‍्तोष है राष्ट्र भाषा द्वारा राजनेतिक साहित्य से हिन्दी-साषा-भाषियों का कितना कल्याण हुआ है इसका अनमान हमें बतेमान राष्ट्रीय जाग्रति से हो सकता है। नागरिक शाम्त्र के विधार्थी यह अच्छी तरह समभने लगे हैं कि नागरिकता का स्रोत राष्ट्रभाषा से आरम्भ होता है

इस दूसरे संस्करण की कुछ विशेषताएँ हैँ | पहले संस्करण को ही ज्यों का त्यों मुद्रित नहीं किया गया है। भाषा को धारा वबाहिक तथा गम्भीर बनाने के लिये इतनी काट छाॉँट करनी पड़ी है कि कई स्थलों पर वाक्य तथा पेरेग्राफ़ तक बदल देने पड़े हैं नवीन उद्धरणों तथा वतेमान परिस्थिति को सामने रखते हुये पुस्तक को प्रत्येक दृष्टि कोण से सामयिक बनाया गया है। प्रत्येक अध्याय में कुछ कुछ नई बाते जोड़ दी गई हैं | पहले संस्करण में शासनविधान! और सरकार की क्िस्में --ये दोनों अध्याय भूल से छूट गये थे इस संस्करण में इन्हें भी जोड़ दिया गया है। सन्‌ १६४३ तक के बोडे में पूछे गये एफ़० ए० के नागरिक शाम््र के प्रश्न-पत्र भी पुस्तक के अन्त में शामिल कर दिये गये हैं

नागरिक शास्र और राजनीति के कुछ अध्यापकों ने पत्र द्वारा मेरा ध्यान चन्द्र बातों की ओर आकर्षित किया था। इस नये संस्करण में उनकी सलाहों का पूरा पूरा ध्यान रकखा गया हे मेरठ कालेज के प्रोफ़ेसर जे० पी० सूद ने प्रजातन्त्रवाद'ं की ओर मेरा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित कराया था। उनकी तथा राजनीति शाम्र के अन्य विद्वानों की इस कृपा का में स्वेथा ऋणी हूं

( छः )

संयुक्त प्रान्त की शिक्षा बोडे ने पुस्तक को एफ़० ए० क्लास के विद्यार्थियों के लिये मंजूर किया हे। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य परीक्षाओं में भी इसे स्वीकृति प्राप्त हुई है आशा हद इस नवीन संस्करण से अध्यापक तथा विद्यार्थी दोनों को कुछ अधिक लाभ

पहुँचेगा

कमल सागर १४ मई १६४३ इ० ( गोरख नाथ चौबे

विषय-सची

श्रध्याय पृष्ठ भूमिका १--नागरिक शास्त्र, विस्तार और श्रन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध २--नागरिकता डा .. १७ ३--अधिकार ओर कतंव्य ... कि ..... ३५४ -- स्वतन्त्रता और समानता . ..... ६० ५--सामाजिक जीवन... कर ५४४... 55 -व्यक्ति ओर समाज... हा ..... १०० ७--राज्य के आवश्यक अंग ओर इसकी उत्पत्ति ..... ११३ ८+-राज्य के कतव्य शा हक ..... ६४४ ६--सरकार ओर इसके अंग हे .... १७२ १०--राजसत्ता (50४०/'९४2 7५) बे «२०० ११-- शासन-विधान दे २१५ १२--सरकार की क्विस्में.... दे ... २२६ १३--मताधिकार (#7४॥०॥४०) हर «.. रै४७ १४--दलबन्दी (4ए 8ए980॥) बडे .. २७० १५- राष्ट्रीयता (/९॥१08।8) 30५ 25% अदा १६--राज्य के अ्रन्तिम उद्देश्य »« ३११

१७--के नून (.98७) ही बे 9.

नागरिक शास्त्र की विवेचन अध्याय

नागरिक शास्त्र, विस्तार ओर अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध

शास्बन-- नागरिक शास्त्र की परिभाषा--नागरिक शाझ्घध की उपयोगिता-- नागरिक शाछ्ध का विस्तार--अन्य शास्त्रों से सम्बन्ध-नागरिक शास्त्र झोर राननीति शास्त्र--नागरिक शास्त्र और समाज शास्प्र---नागरिक शास्प्र और इतिहास--नागरिक शास्त्र तथा श्रथंशासत्र नागरिक शास्त्र और भूगोल - नागरिक शारत्र और घमंशास्त्र- नागरिक शास्त्र को अध्ययन विधि

शारत्र- किसी विषय का क्रमबद्ध ज्ञान शास्र कहलाता है। दवा के विषय में कुछ कुछ सभी लोग जानते हैं परन्तु सबको हम डाक्टर नहीं कह सकते सामाजिक व्यवस्था का शान थोड़ा बहुत सबको रहता है, परन्तु हर एक व्यक्ति समाजशासत्र का विद्वान्‌ नहीं कहा जा सकता। आधिक प्रबन्ध सब को ही करना पड़ता है परन्तु अथशाखस््र के ज्ञाता वेही कहे जा सकते हैं जिन्होंने क्रमबद्ध इसका पूर्ण अ्रध्ययन किया है| किसी भी विषय का अधूरा शञान शास्त्र नहीं कहा जा सकता सभी शास्त्रों का उद्देश्य शान है। जितने भी शास्त्र हैं, सबका अध्ययन मनुष्य को ज्ञान की ओर अग्रसर करता है| ज्ञान एक है, इसका विभाजन नहीं किया जा सकता | जिस प्रकार वृक्ष एक होता है परन्तु इसकी शाखायें अ्रनेक होती हैं उसी तरह ज्ञान एक है परन्तु इसकी प्राप्ति के ज़रिये भिन्‍न भिन्‍न हैं। शान का भारडार इतना बृहत्‌ हे कि वह एक साथ ही मस्तिष्क में नहीं सकता | अतएव इसकी प्राप्ति के लिये विभिन्‍न शास्त्रों की रचना की गई है। अध्ययन की सुविधा के लिये, यह आवश्यक समभा गया है कि शान या शास्त्र को विभिन्‍न शाखाश्रों में बाँठ दिया जाय | सभ्यता के विकास के

नागरिक शास्त्र की विवेचना

साथ साथ शास्त्रों की शाखाएँ तथा उपशाखाएँ बढ़ती गई अथशास्त्र, राजनीति, इतिहास, भूगोल, शरीर विशान, धमशासत्र, मनोविशान, गणित तथा विभिन्‍न रसायन और भोतिक शास्रों की रचनाएँ अध्ययन की सुविधा के लिये की गई हैं| अज्ञान से शान की ओर मनुष्य अग्रसर हो, यही इनके अध्ययन का फल है।

शास्त्रों के विभाजन का कोई निश्चित माप नहीं है। वे एक दूसरे से इतने मिले जुले हैं कि एक का पूर्णशान दूसरे के बिना हो ही नहीं सकता अतएव दो शास्त्रों के बीच में कोई दीवाल नहीं खड़ी की जा सकती। फिर भी समस्त शास्त्रों को दो भागों में बाँदा गया है, प्रकृति शात्र ओर समाज शास्त्र यहाँ पर प्रकृति शास्त्र के विषय में हमें कुछ भी नहीं कहना है | हमारे विषय का सम्बन्ध केवल समाज शास्त्र से है। मनुष्य से सम्बन्ध रखने वाले सभी शास्त्र समाज शासत्र कहलाते हैं। आरम्भ से ही मनुष्य समाज में रहा हे और अब भी रह रहा है। उसकी सम्पूर्ण उन्‍नति समाज में ही हुई हे | संसार में जितने भी जीव हैं वे सभी सामाजिक हैं, सबसें संगठन है, सबमें सामाजिक व्यवस्था हे ओर सब में कोई कोई कला है। जिन्होंने जंगली जानवरों के कुण्ड के कुण्ड देखे हैं उन्हें उनके संगठन का थोड़ा बहुत ज्ञान हो सकता है। पत्तियों में भी एक प्रकार का संगठन है। वे अपनी ही जाति की गिरोह में उड़तीं, बैठतीं तथा घोंसला बनातीं हैं | बया पक्षी के घोंसले को देख कर उसकी कला का अनुमान किया जा सकता है | मधुमक्खियों का संगठन इन सबमें सराहनीय है। उनमें कोई स्वामी, कोई सेप्क ओर कोई रक्षक होता है। उनके छत्ते में जो कला दिखलाई पड़ती है वह हमारे साधारण घरों में नहीं हो सकती। यदि इन जीवों में अपनी उन्‍नति अवनति का शान दूसरों पर प्रकट करने की शक्ति होती, तो इससे भी कितने ही शास्त्र ग्राज बन जाते। वे भी समाज शास्त्र के अन्तगत कद्दे जाते परन्तु मनुष्य को छोड़ कर यह शक्ति किसी अन्य जीव में नहीं पाई जाती | इस लिये समाज शास्त्र से हमें मनुष्य के विचार, ज्ञान, संगठन तथा काय आदि का शान द्ोता है। समाज शास्त्र समाज की उन्‍नति का वर्णुन करता है।

नागरिकता का अ्रध्ययन नागरिक शास्त्र कहलाता हे#। मनुष्य

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नागरिक शास्त्र, विस्तार और अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध

जिस समाज में रहता हे उसके प्रति उसके बहुत से कत्तंव्य हैं। उनका शान मनुष्य के लिये आवश्यक हे कुटुम्ब के प्रति उसके क्या कत्तव्य हैं, धार्मिक संस्थाओं से उसका क्या सम्बन्ध है, तथा राजनेतिक संगठन में उसे कोन कोन से अधिकार प्राप्त हैं---इन सब के ज्ञान को नागरिक शास्त्र कहते हैं। अथांत्‌ जिस शास्त्र के अन्दर नागरिक के अ्रधिकारों आर कतंव्यों का वशुन होता है वह नागरिक शास्त्र कहलाता है। नागरिक शाझ्ष ओर “नगर” शब्द से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। हिन्दी भाषा में हम नगर शब्द का अर्थ शहर” करते हैं परन्तु नागरिक शाघ्त्र केवल शहरों का शास्त्र नहीं हे। भारतवर्ष में लगभग लाख गाँव हैं। इन ग्रामों के अध्ययन को ग्रामशास्त्र कहते हैं। नागरिक शास्त्र ओर ग्रामशास्त्र दोनों एक ही हैं। जिस शास्त्र से नगर श्रथवा ग्राम निवासियों की रहन सहन का ज्ञान हमें प्राप्त हो वह नागरिक शास्त्र अथवा गआ्मशास्त्र कहलाता है श्रर्थात्‌ जो व्यक्ति ग्राम या नगर में रहते हैं उनकी रहन सहन केसी है, उनके अन्दर किस प्रकार के कितने संगठन हैं, उनकी आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था केसी हैे---इन सबकी जानकारी नागरिक शास्त्र के अन्दर मोजूद होती है। साथ ही यह शास्त्र आदर्श जीवन का मार्ग भी समाज के सामने रखता है ।# हमारे देश में गआआमशासत्र! शब्द 'नागरिक शास्त्र! से अधिक उपयुक्त है, क्योंकि हमारा देश गाँवों का देश हे। इस शास्त्र के अन्तगंत हम मनुष्य का ही अध्ययन करते हैं| किन्तु मनुष्य की बनाई हुई संस्थाओं का जब तक हमें शान होगा, तब तक हम उसे नहीं समक सकते। अफ़लातून ऐसे यूनानी दाशनिकों ने इसे स्वीकार किया है कि समाज मनुष्य का एक बृहतू रूप हे इसलिये नागरिक शास्त्र नागरिक के रूप में मनुष्य का ही विश्लेषण करता है

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हु नागरिक शास्त्र की विवेचना

जिस समाज में हम रहते हैं उसका ज्ञान प्राप्त किये बिना हम अपना विकास नहीं कर सकते। उपयुक्त नागरिक बनने के नागरिक शास्त्र की लिये इस शास्त्र का शान नितान्त आवश्यक है। डपयोगिता प्रत्येक व्यक्ति का एक दूसरे के प्रति कया कत्तंव्य है ! जब तक मनुष्य इसकी जानकारी प्राप्त करेगा, तब तक वह बहुत सी सामाजिक बुराश्यों का दास बना रहेगा। मनुष्य की जानकारी अपने ही प्रति समाप्त नहीं हो जाती कुठम्ब, ग्राम, ज़िला, प्रान्त तथा समस्त राष्ट्र से उसका सम्बन्ध होता है | जब मनुष्य का इन सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध हे तो वह इनसे अनभिज्ञ रह कर सुखमय जीवन व्यतीत नहीं कर सकता नागरिक शास्त्र के ज्ञान के बिना मनुष्य किसी भी सामाजिक शास्त्र का अध्ययन नहीं कर सकता। यदि हम किसी संघ के सदस्य हों, परन्तु उसके नियमों से अनभिज्ञ हों, तो हम संघ में पूरा सहयोग नहीं दे सकते। इसी प्रकार जब तक हम नगरों तथा ग्रामों से सम्बन्ध रखने वाले शास्त्र का अध्ययन नहीं करेंगे, तब तक हम इनकी उन्नति में थोड़ी भी सहायता नहीं कर सकते | कोई सिपाही तब तक अच्छी तरह काम नहीं कर सकता जब तक उसे फ़ोजी शिक्षा दी जाय | प्रत्येक काय के लिये किसी किसी प्रकार की ट्रेनिंग की आवश्यकता पड़ती है। नागरिक शास्त्र उपयुक्त नागरिक बनाने के लिये एक प्रकार की ट्रेनिंग देता है। वह नागरिक को उसके कत्तव्यों का शान प्राप्त कराता है तथा विभिन्न संस्थाओं के प्रति उसके सम्बन्ध को निर्धारित करता है। सामाजिक उन्नति के लिये छोटी से छोटी बातों की जानकारी आवश्यक है | सड़क पर कैसे चलना चाहिये, सफ़ाई कैसे रखनी चाहिये, वोट कैसे देना चाहिये, शिक्षा बोड क्‍या है, ज़िला तथा म्युनिस्पल बो्ड क्या करती हैं, ग्राम पंचायतों के क्‍या क्या कत्तव्य हें--आदि बातों की जानकारी के बिना नगर में रहते हुए भी हम कुशल नागरिक नहीं कहे जा सकते। नागरिक शास्त्र के अध्ययन से प्रत्येक नागरिक समाज के सुख और शान्ति में पूणं सहायक हो सकता है। अपने कार्यों से वह मनुष्य मात्र का कल्याण कर सकता है। शिक्षित समाज में जितनी उपयोगिता इस शास्त्र की है उतनी किसी और सामाजिक शास्त्र की नहीं हो सकती नागरिक शास्त्र समाज शास्त्र का एक प्रधान शअ्रंग है। प्रत्येक शास्त्र का क्षेत्र मनुष्य की बोडिक उन्नति से सीमित है। समाज

नागरिक शास्त्र, विस्तार ओर अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध

नागरिक शास्त्र का शास्त्र सामाजिक उन्नति का प्रतीक है | जब विस्तार तक मनुष्य जंगली अवस्था में था, उसका कोई विशेष संगठन नहीं था, और उसकी कोई राज- नैतिक व्यवस्था थी, तब तक उसे नागरिक शास्त्र का मूल्य मालूम था | जंगली अ्रथवा प्राकृतिक नियमों से ही उसका काम चल जाता था जंगली अवस्था के पश्चात्‌ मनुष्य का सामाजिक जीवन प्रारम्भ हुआ। उसे सामाजिक नियम तथा रसम-रवाज़ बनाने पडढ़े। यहीं से नागरिक शास्त्र का बीजारोपण हुआ आरम्भ में केवल थोड़े से सामाजिक नियम बने | इनकी जानकारी सामाजिक विद्या के नाम से उद्धत की गई। जब इस विद्या का भाण्डार कुछ ओर बृहत हुआ तो यही नागरिक शास्त्र कहलाने लगा इस शास्त्र का विस्तार सामाजिक वा नागरिक जीवन की उन्नति पर निर्भर है। हमारे नगर अ्रथवा ग्रामों का जितना ही अधिक विकास होगा, नागरिक का कत्तव्य और अधिकार उतना ही बढ़ता जायेगा। इसी के साथ साथ नागरिक शाचछ्त्र का क्षेत्र भी बढ़ेगा। प्रत्येक नागरिक का जीवन विभिनन ज्षेत्रों में व्यतीत होता है। नागरिक शास्त्र के अन्तगंत हमें इन सबका अध्ययन करना पड़ता हे समाज की उन्नति का सम्पूर्ण शञान वतमान काल के ही अध्ययन से नहीं हो सकता इसके लिये भूतकाल की भी जानकारी आवश्यक है जहाँ से हमारा सामाजिक जीवन आरम्भ हुआ था उसे भी हमें जानना पड़ता है| तदुपरान्त हमारा अध्ययन तब तक पूरा नहीं कहा जा सकता, जब तक हम समाज के भविष्य जीवन के लिये कोई आदश निश्चित कर लें। इसे ध्यान में रखते हुए हम यही कह सकते हैं कि नागरिक शास्त्र का विस्तार भूत, वतमान तथा भविष्य तीनों कालों में फेला हुआ है | मूतकाल में नागरिक के क्या अधिकार थे, वतमान काल में उनमें क्या क्या परिवतन हुए, भविष्य में उनके परिवर्तन की क्‍या आशा है-- इन सब का शान नागरिक शास्त्र द्वारा ही होता है। आरम्भ से लेकर अब तक मनुष्य का सामाजिक इतिहास इसी शास्त्र के अन्तगत वन किया गया हे जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश समस्त भूमंडल पर पड़ता है उसी प्रकार नागरिक शास्त्र का प्रभाव मनुष्य के सभी सामाजिक जीवन पर पड़ता है | प्रकाश के बिना मनुष्य अन्बेरे में कुछ भी नहीं कर सकता। इसी प्रकार नागरिकता के शान के बिना कोई भी अपने कत्तव्य का पूरी तरह पालन नहीं कर सकता | समस्त संसार आज हमें जिस रूप में

ध्‌ नागरिक शासत्र की विवेचना

दिखलाई पड़ रहा है वह सामाजिक जीवन का ही फल है। इसमें नागरिक के कत्तव्य की गणना नहीं हो सकती इसका क्षेत्र किसी प्रान्त अ्रथवा देश की सीमा से घेरा नहीं जा सकता। नागरिक शास्त्र इन सबकी विवेचना करता हे

यद्यपि हम नागरिक शास्त्र को विभिन्‍न सामाजिक शास्त्रों से प्रथक मानते हैं, फिर भी उन सबके साथ इसका एक घनिष्ठ सम्बन्ध है। सामा- जिक जीव के नाते मनुष्य का समाज के प्रति क्‍या कत्तव्य है, अमुक समाज में उसकी क्या स्थिति है इनका अध्ययन तथा शान नागरिक शारस्त्र का ही एक विषय है | नागरिक के नाते हमें यह भी जानना पड़ता है कि हमारा शासन केसे होता है। इसके लिये हमें अपनी शासन व्यवस्था का अध्ययन करना पड़ता है। यहाँ पर नागरिक शास्त्र का सम्बन्ध राज- नीति शास्त्र से होता है। समाज की आर्थिक उन्नति किस प्रकार हो सकती हे, तथा हमारी वतमान आशिक परिस्थिति केसी है इन्हें भी हमें ध्यान में रखना पड़ता है, क्योंकि हमारे देनिक जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है | इसी लिये नागरिक शास्त्र की पूरी जानकारी के लिये अथशास्त्र का भी अध्ययन करना पड़ता है। नागरिक के नाते प्रत्येक व्यक्ति को अपने पड़ोसी के सुख दुख का ध्यान रखना पड़ता है। न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि की उसे चिन्ता करनी पड़ती है इन क्षेत्रों में नागरिक का कत्तव्य इतना विस्तृत हो जाता है कि नागरिक शास्त्र की सीमा निहित नहीं की जा सकती। जब मनुष्य के कत्तव्य की कोई सीमा नहीं है, तो नागरिक शास्त्र का क्षेत्र भी अपार ओर अनन्त समभना चाहिये

आरम्भ में नागरिक वही कहलाता था जो नगर में रहता था। वहीं की स्थानीय बातों का ज्ञान नागरिक शास्त्र कहलाता था| राजनैतिक उत्थान के साथ मनुष्य नगर से भी बड़े संगठन का आज सदस्य है। वह बिखरे हुए सामाजिक वृक्ष की केवल शाखा मात्र नहीं है बल्कि राष्ट्रीय शिविर का एक दृढ़ स्तम्भ है। आधुनिक काल में नागरिकता एक राष्ट्रीय वस्तु है जो राष्ट्र का सदस्य हे वही नागरिक है। उसके अधिकार तथा कत्तव्य समस्त राष्ट्र में तारों की भाँति फैले हुए हैं। यह राष्ट्रीय नागरिकता अब भी बढ़ती जा रही है और नागरिक अम्तर्राष््रीय संघ का सदस्य होने जा रहा है। इस सदस्यता के विस्तार म॑ नागरिक के कत्तव्य कितने बढ़ जायेंगे, भविष्यकाल का नागरिक शास्त्र इसकी विवेचना करेगा नागरिक

नागरिक शास्त्र, विस्तार और अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध

का कत्तव्य माता पिता से बढ़ते बढ़ते आज संसार - भर में फैल गया है। हसी से हम नागरिक शास्त्र का विस्तार समझ सकते हैं। नागरिक शास्त्र मनुष्य के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन से सम्बन्ध रखता है इसीलिये इसके अन्दर जीवन के हर पहलू पर अन्य शास्त्रों ले विचार किया गया है। प्रत्येक शास्त्र का अ्रध्ययन सम्बन्ध नागरिक के जीवन पर एक विशेष प्रभाव डालता है| श्रतएव सामाजिक जीवन में एक दृढ़ एकता है | इस एकीकरण को समभने के लिये हम विभिन्‍न सामाजिक शाछ््त्रों का अध्ययन करते हैं। वास्तव में ये शास्त्र एक दुसरे से भिन्न नहीं हैं, प्रत्युत्‌ एक ही वस्तु को समभने के लिये विभिन्‍न दृष्टि कोश के प्रतिनिधि हैं इतिहास भूतकाल की घटनाओं का वर्णन करते हुये भविष्य के लिये हमें मांग प्रदर्शित करता है। इसका प्रभाव सभी सामाजिक शास्त्रों पर बहुत ही गहरा पड़ता हे जब तक हमें अपने देश का सच्चा इतिहास मालूम होगा तब तक हम अपने प्राचीन गौरव को तो समझ सकते हैं और अपना सकते हैं |# साहित्य मनुष्य के विचारों का ठाच है। इसी के प्रकाश से हम विभिन्‍न शास्त्रों में प्रवेश करते हैं। भूगोल से मनुष्य के स्थानीय जीवन का शान होता है। विभिन्‍न प्राकृतिक जीवन में किस प्रकार मनुष्यों की रहन-सहन तथा रसम-रवाज़ में परिवर्तन हो जाया करते हैं इसका ज्ञान हमें भूगोल से ही होता है। अथशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का एक प्रधांन अंग है। प्रत्येक मनुष्य को छोटे या बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रबन्ध करना पड़ता है। अपनी साधारण शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना मनुष्य की उन्‍नति कदापि सम्भव नहीं है। कोई भी शास्त्र इसकी अवहेलना नहीं कर सकता इसीलिये सभी सामाजिक शास्त्रों में एक घनिष्ठ सम्बन्ध है | हम इन्हें एक दूसरे से सबंथा

प्रथक नहीं कर सकते | नागरिक शास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में जितनी घनिष्ठता है उतनी

किन्हीं भी दो शास्त्रों में नहीं है। एक प्रकार से

नागरिक शास्त्र और नागरिक शास्त्र राजनीति का एक अंग है| जिस राजनोति शास्त्र प्रकार पौधे ओर वृक्ष में कोई वस्तु विभेद नहीं हे एवं अवस्था का अन्तर है उसी प्रकार राजनीति शास्त्र

नागरिक शास्त्र का एक विकसित रूप है। दोनों शासत्र सामाजिक व्यवस्था

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चर नागरिक शास्त्र की विवेचना

के साथ ही उत्पन्न होते हैं। दोनों के विकास का क्रम भी एक ही है। नागरिक शास्त्र नागरिक को अपने कत्तंव्य ओर अधिकार का ज्ञान कराता है | राजनीति शास्त्र उन अ्रधिकारों को पालन करने का अवसर देता है। यदि किसी देश में नागरिकता की दृद्धि हो, लोग अपनी सामाजिक व्यवस्था की उन्नति करें, तो यह स्वाभाविक है कि उस समाज का राजनैतिक वातावरण शान्तिमय रहेगा दोनों ही शास्र यह बतलाते हैं कि मनुष्य का एक दूसरे के प्रति तथा समाज के प्रति क्‍या कत्तंव्य है। सुख और शान्ति दोनों के अन्तिम उद्देश्य हैं। दोनों से विभिन्‍न सामाजिक संस्थाओं की उत्पत्ति होती है| यदि किसी देश की सरकार रक्षा का उचित प्रबन्ध करे तो नागरिक अपने कत्तव्य का ठीक ठीक पालन नहीं कर सकता जब नागरिकता की वृद्धि होगी, तभी कत्तव्य-परायण सामाजिक कायकर्ताओओं का प्रादुर्भाव होगा उन्हीं से सरकारी मशीन अच्छी तरह चल सकेगी इतना घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों का काय-्षेत्र मिन्‍न है। राजनीति शास्त्र का दारो-मदार राजनैतिक संगठन पर स्थिर है। सरकारी मशीन के बिगड़ते ही यह सम्बन्ध टूट जाता है। इसके विपरीत नागरिकता एक ठोस वस्तु है। यद्यपि मानव शक्ति के कारण इसका क्षेत्र सीमित हे, फिर भी उसमें नागरिक के कत्तंव्य का अन्त नहीं है। राजनीति शास्त्र राष्ट्रीय तथा अन्‍्तरांष्ट्रीय समस्यात्रों से सम्बन्ध रखता है। नागरिक शास्त्र का सम्बन्ध केवल स्थानीय बातों से रहता है। राजनीति-शास्त्र मनुष्य की राजनैतिक उन्‍नति का एक इतिहास है। नागरिक शास्त्र सामाजिक कत्तव्यों का एक कोष है। राजनीति शास्त्र नागरिक के अधिकारों के प्रयोग के लिये ज्षेत्र तैयार करता है। नागरिक शास्त्र उन अधिकारों का केवल शान प्राप्त कराता है। नागरिक शास्त्र व्यक्तित्व का विकास करता है | राजनीति शास्त्र उस व्यक्तित्व से लाभ उठाता है। मनुष्य जिस समाज में रहता है उसमें विभिन्‍न संस्थाओं से उसका सम्बन्ध होता है| धर्म के नाते वह क्रिसी मठ अथवा मागरिक शास्त्र और मन्दिर का सदस्य होता है। राजनैतिक लाभ के लिये समाज शास्त्र. उसे म्युनिस्पल बोर्ड ओर ज़िला बोर्ड का सदस्य बनना पड़या है। अपनी जीविका के लिये वह तरह तरह के काय करता है। आवश्यकतानुसार वह कई व्यापारिक संघों का सदस्य बन जाता है। उसे इन संस्थाओं की उत्पत्ति तथा विकास की

नागरिक शास्त्र, विस्तार ओर अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध

थोड़ी बहुत जानकारी रखनी पड़ती है। यद्यपि यह सम्भव नहीं है कि कोई नागरिक सभी सामाजिक शास्त्रों को भ्लीभाँति जान सके, फिर भी उसे इनका साधारण शान तो रखना ही पड़ता है। नागरिक शास्त्र सामा- जिक जीवन के केवल एक अ्रंग का विस्तृत वर्णन करता है। शेष अंगों का हवाला मात्र देकर वह अपने अंग की पुष्टि करता है। प्रत्येक नागरिक को इसका विस्तृत शान होना आवश्यक हे। नागरिकता के पूर्ण ज्ञान के बिना मनुष्य की संस्कृति इतनी उन्‍नत कदापि नहीं हो सकती कि वह विभिन्‍न सामाजिक शास्त्रों का शान प्राप्त कर सके। समाज शास्त्र सामाजिक बुराई तथा भलाई दोनों अंगो का वर्णन करता है। नागरिक शास्त्र प्रत्येक नागरिक को इस बात के लिये तैयार करता है कि वह बुराइयों को निकाल कर गुणों का ही समाज में प्रतिपादन करे | समाज शास्त्र का सम्बन्ध सम्पूर्ण राष्ट्रीय व्यवहारों से है, परन्तु नागरिक शास्त्र कुठुम्ब, ग्राम तथा पड़ोस से ही सम्बन्ध रखता है| इतना अवश्य है कि मनुष्य के नाते उसका कत्तंव्य समूचे संसार के प्रति हो जाता है। कौठुम्बिक कतव्यों के अतिरिक्त उसे अन्तर्राष्ट्रीय कतंब्यों का भी पालन करना पड़ता है इतिहास मनुष्य की सम्यता का एक कोष है, जिसमें सामाजिक अधिक, राजनेतिक तथा मानसिक उन्नति का नागरिक शास्त्र ओर विश्लेषण होता है | वास्तव में इतिहास मनुष्य की इतिहास राजनैतिक स्वतंत्रता का एक युद्ध है। इस युद्ध में नागरिक की वीरता, उसकी विजय तथा पराजय आदि का वर्णन मिलता है। इस प्रकार जिन विषयों का वर्णन हमें इतिहास म॑ मिलता है उन्हीं के आधार पर नागरिक शास्त्र के विषय बनाये जाते हैं। इतिहास नागरिक के कत्तव्यों की एक यूची है। इससे हमें पता चलता है कि कैसे श्रौर क्‍यों हम अपनी वत्तमान अवस्था को प्रास हुए हैं हमारी सामाजिक उन्नति में आरम्भ से अ्रब तक कितनी बाधायें उपस्थित हुईं हैं | इस प्रगति को समभने के लिये आधुनिक समस्याश्रों तथा संस्थाओं का शान रखना आवश्यक हैे। आधुनिक काल से ही हम भूत तथा भविष्य का अध्ययन कर सकते हैं | हमारी वर्तमान दशा हमारे भूतकाल के कक्तेब्यों का फल है, ओर इसी में भविष्य काल का बीज भी छिपा हुआ है अपने पू्बजों की कीर्ति को समभने के लिये इतिहास का अध्ययन नितान्त आवश्यक है। परन्तु यदि हम उनके बतलाये हुए ऊँचे ना० शा० बि०--२

१० नागरिक शांसख् की विवेचनां

आदशों पर चलना चाहते हैं तो हमें सच्चा नागरिक बनने की आवश्यकता होगी | नागरिक शास्त्र हमारे जीवन की प्रगति को श्रवनति से उन्नति के मार्ग पर ले जा सकता है| इतिहास को हम एक दुसरी दृष्टि से भी देख सकते हैं | उस समय हमें यह लड़ाइयों का अजायब घर दिखलाई पड़ेगा नागरिक शास्त्र इन घटनाओं का वर्णन नहीं करता। वह पिछली सामाजिक त्रुटियों का उल्लेख करके हमारी सम्पूर्ण शक्ति को आनन्द ओर सुख की ही ओर लगाना चाहता है। कृषि, व्यवताय, सामाजिक शासन, राष्ट्रीय आय-व्यय तथा रक्षा आदि विषयों का प्रतिपादन इतिहास और नागरिक शास्त्र दोनों में पाया जाता है| व्यावसायिक उन्नति, शिक्षा की वृद्धि तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध दोनों शास्त्रों के विषय हैं | कोठुम्बिक जीवन, आमोन्‍नति, शहरों तथा विभिन्न राष्ट्रों का निर्माण आदि विषय दोनों शास्त्रों के अ्न्तगंत आते हैं। यदि इतिहास मूल है तो नागरिक शास्त्र इसकी एक शाखा है | यदि हम भारतवष में प्रतिनिधित्व का इतिहास जानना चाहें तो हमें १८६२ से लेकर अब तक का इतिहास देखना होगा | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रयेक ऐतिहासिक घटना का प्रभाव हमारे स्थानीय जीवन पर किसी किसी प्रकार भूत, वतमान तथा भविष्य तीनों कालों में पड़ता रहता है। इतिहास से ही हमारे नागरिक शास्त्र का निर्माण होता है। हम इनके अटूट सम्बन्ध का विच्छेद नहीं कर सकते | अर्थ शास्त्र एक सामाजिक शास्त्र है। वह समाज के उस अंग का वर्णन करता है जिसका सम्बन्ध धन की उत्पत्ति नागरिक शाघ्त्र तथा तथा वितरण से है| धन की उत्पत्ति कैसे होती है, अथ शास्त्र उसकी आवश्यकता समाज को क्‍यों पड़ती है, और उसका वितरण किस ढंग पर होता है--इत्यादि बातों का समावेश अ्रथ शास्त्र में होता है। कोई भी ऐसा नागरिक होगा, जिसे धन की आवश्यकता हो। मनुष्यों को एकत्र कर एक समाज में ढालने का बहुत बड़ा श्रेय धन को ही है। यदि मनुष्य को इसकी आवश्यकता हो तो वह सामाजिक तथा राजनैतिक नियमों को पालन करने से इनकार कर देगा। नागरिक शास्त्र इस बात के लिये नियम बनाता हे कि नागरिक पर कोन कौन से टैक्स लगाये जाये, और उनके वसूल करने की क्या विधि हो दोनों शास्त्र फूल और सुगनन्‍्ध की तरह एक दूसरे से मिले हुए हैं। यदि टैक्‍स लगे तो समस्त

नागरिक शास्त्र, विस्तार ओर अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध ११

सरकारी कारोबार बन्द हो जाय, फिर तो नागरिकता का नाम भी शेष रहेगा |

धन की उत्पत्ति के साधन तथा इसके व्यय का उचित मागग अथ शास्त्र के अन्दर पाया जाता हे। परन्तु इन दोनों को काय रूप में परिणत करने का भार योग्य नागरिक पर ही पड़ता है। जब तक देश में कुशल नागरिक होंगे तब तक वहाँ धन धान्य की वृद्धि नहीं हो सकती

नागरिक समाज को सभी दृश्यों से सम्पन्न देखना चाहता है। इसलिये वह आशिक प्रश्नों पर भी विचार करता है यहाँ पर दोनों शास्त्रों की जानकारी की आवश्यकता पड़ती है। नागरिक को अपने कक्तव्य का पूरा शान तब तक होगा जब तक उसे यह अवसर मिले कि वह आशिक दृष्टि से स्वावलम्बी हो सके राज्य में उसे समान अधिकार और समान अवसर मिलना चाहिये। स्थायी सामाजिक शान्ति तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक लोगों के पास भोजन का अभाव रहेगा | वह समाज प्रसन्न नहीं रह सकता जिसमें गरीब दुखियों की संख्या अ्रधिक होगी। * ग़रीबी धर्म का नाश हे।? धमं से यहाँ तात्यय नागरिक के कत्तव्य से है। बुभुक्षितः कि करोति पापम ? | धन से समाज को सुखी रखना राजा का पहिला ककत्तंथ्य है भारतवष किसानों का देश है। ग्राम शास्त्र के अन्तगंत कृषि शास्त्र भी आता है। किसान अपनी सफ़ाई केसे रक्खे, खेती कैसे करे, सिंचाई की क्‍या व्यवस्था हो, उत्पन्न अनाज के बेचने की क्‍या तरकीब हो इत्यादि बातों का सम्बन्ध नागरिक शास्त्र तथा श्रथ शास्त्र दोनों से हे। धन की वृद्धि के लिये यह आवश्यक है कि नागरिकों का जीवन संगठित हो, उनके अन्दर सहयोग का भाव हो और उनकी व्यापार शक्ति उन्‍नत हो यदि म्युनिसिपल बोड अच्छी सड़कों का प्रबन्ध करे तो शहर का व्यापार उन्‍नति नहीं कर सकता | यही दशा ग्रामों की भी है | जिस समाज में धन की कमी रहती है वह दुबंल ओर दयनीय समझा जाता है। इस प्रकार अथ शास्त्र और नागरिक शास्त्र पग पग पर मिले हुये हैं। एक दुसरे से अलग करना अध्ययन की दृष्टि से तो कुछ सम्भव भी है, लेकिन ज्ञान की दृष्टि से वे कदापि अश्रलग नहीं किये जा सकते आर्थिक व्यवस्था तथा नागरिक कत्तव्य, इन दोनों का जन्म साथ ही हुआ हे |

१२ नागरिक शास्र की विवेचना

भूगोल से हमें संसार की प्राकृतिक दशा का ज्ञान होता है। प्रत्येक

देश कहाँ स्थित है, उसकी आब-हवा केसी है, वहाँ

नागरिक शारुत्र और लोगों की जीविका का क्‍या साधन है, वहाँ की भूमि भूगोल कहाँ तक उपजाऊ है--इन बातों का ज्ञान हमें भूगोल से होता है | प्रश्न यह है कि इनका प्रभाव

मानव जीवन पर क्‍या पड़ता है। हमारे देश में एक आम कहावत है ' जैसा देश वैसा वेश ।? जलवायु के अनुकूल ही मनुष्य की रहन-सहन बनती है। प्रत्येक देश की नागरिकता भिन्‍न भिन्‍न है। जो अधिकार भारतीय नागरिक को प्राप्त हैं, वे ही अधिकार जमन तथा रूसी नागरिक को प्राप्त नहीं हैं| दोनों के अधिकारों म॑ अन्तर है| दोनों का खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल तथा सामाजिक विधान एक ही प्रकार के नहीं है भोगोलिक परिस्थिति हमारे जीवन को एक विशेष ढाँचे में ढालती है। कुछ तो मनुष्य समाज में बनता है और कुछ प्रकृति बनाती है। यद्यपि नागरिक शास्त्र का निर्माण मनुष्य ने किया है, फिर भी वह प्रकृति के प्रभाव से वंचित नहीं है यदि हमारी भूमि उपजाऊ हैं तो हमारी आर्थिक दशा अच्छी होगी | इससे समाज में हमारा जीवन सुखी रहेगा। परन्तु भूमि उपजाऊ होते हुए भी यदि सिचाई की व्यवस्था हो तो कोई भी सुखी नहीं रह सकता नागरिक शास्त्र इस बात का प्रतिपादन करता है कि सामाजिक नियम देश की जलवायु के अनुकूल बनाये जाते हैं। नदी, पहाड़ों तथा जंगलों से नागरिक को नाना प्रकार के लाभ होते हैं। परन्तु समाज को इसकी व्यवस्था बनानी पड़ती है इस प्रकार दोनों शास्त्र एक दूसरे से बहुत कुछ मिले जुले हैं। भोगोलिक शान की जितनी ही वृद्धि होगी मनुष्य की सामाजिक दृष्टि उतनी ही विध्तृत होगी | भ्रमण से मनुष्य का शान क्‍यों बढ़ता है ! इसीलिये कि जब वह विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों से होकर गुज़रता है तो उसे सोचने विचारने की अनेक सामग्रियाँ उपलब्ध होती हैं। यदि नवीन अनुसन्धानों के पीछे नये नये देशों की खोज हुई होती तो विशञान का इतना अधिक प्रचार कदापि होता सामाजिक सम- स्थाओं की अनेक उलभनों के उत्तर भूगोल शास्त्र के अन्दर पाये जाते हैं। धर्म एक व्यापक शास्त्र है। इसका क्षेत्र इसी संसार में समाप्त नहीं

हो जाता लोक परलोक दोनों ही से इसका

नागरिक शास्त्र और सम्बन्ध है। मनुष्य का मनुष्य के प्रति और फिर धम शास्त्र. दोनों का ईश्वर के प्रति क्‍या सम्बन्ध है इसकी

नागरिक शास्त्र, विस्तार और अन्य शास्त्रों से इसका सम्बन्ध १३

विवेचना धर्म शास्त्र में की जाती है। यह शास्त्र मनुष्य के चरित्र बल पर सब से अधिक ज़ोर देता है। कोई भी शास्त्र चरित्र को गौण मान कर अपनी स्थिति क़ायम नहीं रख सकता यदि मनुष्य भले बुरे का ज्ञान रकखे तो वह पशु से भिन्न नहीं कहा जा सकता। धमे ही एक ऐसा विषय हे जो मनुष्य और पशु में अन्तर निहित करता है। कोई भी शास्त्र धमम शास्त्र से अपना सम्बन्ध विच्छेद नहीं कर सकता नागरिक शास्त्र को धमे शास्त्र का विशेष आश्रय लेना पड़ता है। नियम का पालन वही कर सकता है जिसे आत्म उन्नति का ध्यान है। अपने पड़ोसी की भलाई वही चाहेगा जिसके अन्दर दया और सदुभाव है। अपने सामाजिक महापुरुषों के बतलाये हुए मार्ग पर वही चलेगा जिसके अन्दर सज्जनता का भाव है। मनुष्य के अन्दर शील, दया, आत्म सम्मान, महत्वाकांक्षा आदि गुण धम शाक््र से ही प्राप्त होते हैं। प्रत्येक नागरिक को इनकी आवश्यकता है। उसे स्वा्थों बन कर समाज को कुत्सित नहीं बनाना है। जो अपने प्रति कत्तंव्यों का शान रखता है वही अपने पड़ोसी का भी ध्यान रख सकता है और उसी से सम्पूर्ण राष्ट्र की उन्नति हो सकती है।

नागरिक शास्त्र को धर्म शास्त्र का एक अंग कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नं होगी। जब तक हमें छोटी छोटी बातों का ज्ञानन होगा तब तक हम धम के गूढ़ विषयों में प्रवेश नहीं कर सकते। यदि हमारी वाह्य शक्तियाँ नियमित रूप से काम करे तो हमारी मानसिक उन्नति नहीं हो सकती | धम मनुष्य का अन्तिम घेय कहा गया है। इस प्रकार ये दोनों शासत्र आरम्भ से अन्त तक मिले हुए हैं। एक का उद्देश्य दूसरे की प्राप्ति है| वाघ्तव में हमें अपने आप को जानने की आवश्यकता है। यह मनुष्य कया है, इसके जीवन का क्‍या उद्देश्य हे, तथा जन्म- मरण के बन्धन से उसे किस प्रकार भुक्ति मिल सकती है--आदि बातों के अतिरिक्त हमें कुछु ओर जानने की आवश्यकता नहीं हे। हमारी सारी कोशिशें एक मात्र इसीलिये होनी चाहिये

यह महान्‌ विश्व मनुष्य की ही अध्ययन शाला है। विभिन्न शास्त्र इसके समभने के साधन हैं। अपनी बुद्धि ही इसमें अध्यापक का काम कर रही है |

एक आदर्श नागरिक बनने के लिये पहिले मनुष्य बनने की आवश्यकता है। यूनान में एक कहावत है “अपने आप को जानो,

१४ नागरिक शास्त्र की विवेचना

ओर कुछ नहीं |? हिन्दू धमं शास्त्रों में भी कहा गया है कि 'आत्मानं विद्धि? अपने आपको पहचानो | हमारे भीतर के सभी भाव काय रूप में बाहर को प्रगठ होते रहते हैं। यदि हमारे अन्दर सफ़ाई है ओर विचार उच्च हैं तो हमारी बाहरी संस्थाएँ चमकती और उन्नतिशील दिखलाई पढ़ेंगी। हम हाथ से वही करते हैं जो हमारे मस्तिष्क में है हमारी सामाजिक व्यवस्था तभी ठीक होगी जब हमारे भीतर के भाव सुलभ जायेंगे। नागरिक शास्त्र अपने क्रियात्मक रूप में छोटे छोटे दायरों में बेटा हुआ हे। विभिन्न संस्थाओं का प्रतिपादन विभिन्न दृष्टि कोण से किया गया है। परन्तु धम्मं शास्त्र समस्त मानव समाज को एक दृष्टि और एक उद्देश्य से देखता है। धर्म शात्र नागरिक शास्त्र का सर्वोन्चत रूप हे इसीलिये दोनों का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है नागरिक शास्त्र में मनुष्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु धम शास्त्र मनुष्य का अध्ययन है। किसी निश्चित स्थान पर हम तभी पहुँच सकते हैं जब हमें वहाँ जाने का ठीक मार्ग ज्ञात हो। रास्ता भूल जाने नागरिक शास्त्र की पर हम कहीं ओर ही चले जायेंगे। एक आदश अध्ययन विधि नागरिक बनने के लिये जैसे हमें शअ्रपने कत्तंव्यों का ध्यान रखना पड़ता है, उसी प्रकार नागरिक शास्त्र के अध्ययन में भी हमें चन्द बातों का ध्यान रखना होगा। तभी हम इस शास्त्र का अध्ययन वेज्ञानिक दृष्टि से कर सकेंगे। यह शाखच्र केवल विचार करने की चीज़ नहीं हैे। इससे मनुष्य अपने वाघध्तविक कत्तव्य की ओर भुकता हे। अतएव हमारी बुद्धि रचनात्मक होनी चाहिये | कोरी कल्पना से हम इस शास्त्र का अध्ययन नहीं कर सकते जैसे हमारे विचारों में एक क्रम होता है उसी प्रकार हमारे रचनात्मक कार्यों भें भी कोई कोई क्रम और कला दोनों ही होने चाहिये। विचार के साथ साथ हमें अन्वेषण भी करते रहना होगा। जब हम अपने विचारों तथा अन्वेषणों को वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट करंगे तभी हम समाजोपयोगी कोई व्यवस्था निकाल सकेंगे अपने कुट्धम्ब्र से लेकर अपने पड़ोसी, ग्राम वासी तथा नगरवासियों को हमें क्रम पूवक अध्ययन करना होगा और फिर उसी क्रम से उनकी उन्नति पर विचार करके अपने को उसमें लगाना होगा। इसलिये नागरिक शास्त्र के प्रत्येक पाठक को वैज्ञानिक विचार ओर रचनात्मक बुद्धि का रखना

नागरिक शास्त्र, विस्तार और अन्य शासत्रों से इसका सम्बन्ध १५

अत्यन्त आवश्यक है इसी से उसके अन्दर लोकहित के भाव पैदा होंगे

नागरिक शात्त्र का उद्देश्य मनुष्यों का अध्ययन करना है। इसके लिये यह आवश्यक है कि हम॑ स्वयं समाज में रह कर इसका अ्रध्ययन करे | हम समाज में तभी रह सकते हैं जब इसकी व्यवस्था ठीक हो। उन्नतिशील जीवन के लिये सामाजिक जीवन अनिवार्य है। परन्तु वह समाज सुसंगठित और सुव्यवस्थित होना चाहिये। उसके अन्दर शिक्षा, कला. व्यवस्था, शान्ति, कत्तव्य परायणुता आदि गुणों की प्रचुरता होनी चाहिये। साथ ही हम स्वयं अपने कत्तव्यों का पालन कर। प्रत्येक व्यक्ति के प्रति हमारी सहानुभूति हो। यदि नागरिक के प्रति हम उदासीन हैं, तो समाज में रहते हुये भी हमारा जीवन दुखी रहेगा इस उदासीन वृत्ति से हम नागरिक शास्त्र का ठीक ठीक अध्ययन नहीं कर सकते | पड़ोसी, ग्राम तथा समस्त राष्ट्र के प्रति जब तक सहानुभूति होगी तब तक हमारा ज्ञान अधूरा रहेगा। जातीयता अथवा साम्प्रदायिकता का भाव लेकर हमें नागरिक शासत्र का अध्ययन नहीं करना चाहिये। इससे हमारी बुद्धि संकुचित होगी। ऊँच नीच का भाव हमारे अध्ययन में बाधक सिद्ध होगा। सहानुभूति के साथ साथ' हममें समभाव और सद्भाव की भी आवश्यकता है। इसका अ्रध्ययन इस दृष्टि से लाभप्रद सिद्ध होगा कि सामाजिक बुराइयों और भलाश्यों की सूची हमारे मस्तिष्क में जाय अध्ययन के पीछे सुधार की भी भावना होनी चाहिये। हमारे अध्ययन का रचनात्मक उपयोग तभी होगा जब हमारे अन्दर सुधार की सच्ची लगन होगी। दूसरों के दुख में हमें भी दुख प्रकट करना होगा और सुख में खुशी दिखलानी होगी। हम समाज के <