पं० मुन्दरलाल गंगेले द्वारा घुन्द्र ग्रिटिज्न ग्रेस, सागर, सी. पी. में मुद्रित

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आप कर कप्तलों में ज्न्ही के एक विनम्र आज्ञाकारी सेवक की यह ऋकृति

सादर समर्पित

थच्यकार

विषय-सू ची

दूसरा भाग हु पृष्ठाझू अध्याय १:--प्रान्तीय शासन ( सन्‌ १६१६ ई० के अनुसार ) १४ प्रान्तों के नाम; गवनेर के मातहत के प्रान्त; चीफ़ कमिश्नरों के मसात- हत के प्रान्त; गवनरों की नियुक्ति; त्रिटिश बलुचिस्तान, छुग्रं, अजमेर मेरवाड़ा, अण्ड- मान का उपनिवेश, गवनेर तथा उनकी कार्य कारिणी सभा; गवनर ओर कार्य-कारिणी सभा के सदस्यों के सम्बन्ध; द्रैघशासन का आरम्भ, रक्तित विषय ओर हस्तान्तरित विषय, मंत्रियों की स्थिति, मंत्रियों ओर कार्य कारिणी-सभा के सदस्यों में, लमानता तथा असमानता;। विषयों का विभाजन, कुछ महत्वपूर्ण प्रान्तीय विषय; प्रान्तीय घारा- सभाओं की संख्या ( सन्‌ १६१९ ई० के ऐक्ट के अनुसार ) विभाग ओर अभ्यास के 8. लिये प्रश्न १-१२ [8 अध्याय २:--प्रान्तीय-सरकार ( सन्‌ १९३५ ई० के ऐक्ट के अनुसार ); प्रान्तों में उत्तर दायित्व पूर्ण शासन; प्रान्तीय स्वतंत्रता किसे कहते हैं; प्रान्तीय स्वराज्य की विशेषताएँ, गवनेर; गवनरों के वार्षिक वेतन; मंत्रियों की सभा; १३-२४

हु

प्रथम भारतीय सहिला मंत्री गवनेरों के प्रष्टाह्ल व्यक्तिगत अधिकार (7 78 क8०'आाणा); व्यक्तित निर्णय (॥70ए0७। ंप्रपे&- * 7700 ); शासन सम्बन्धी अधिकार; कानून सम्बन्धी अधिकार; आर्थिक अधिकार; मतदाताओं की संख्या; वे जो चुनाव में भाग नहीं ले सकते; अभ्यास के प्रश्न १३-२४ अध्योय ३:--प्रान्तीय घारा-सभा ( सन्‌ १९३५ ई० के ऐक्ट के अनुसार ), संगठन; प्रान्तीय धारा- सभाएँ; सभाओं की आयु; स्पीकर, कोरस, सदस्यों के अधिकार, सदस्यता के लिये अयोग्यताएँ; प्रान्तीय धारा-सभा के अधिकार, आ्थिक विपयों पर नियंत्रण, बजट; नया शासन; प्रान्तों का उत्तर दायित्व पूर्ण शासन, ओर गवर्नर के अस्थायी कानून दा प्रकार के; गवर्नर के ऐक्ट; चीफ-कमसि- श्नर के प्रान्त; मध्यप्रदेश ओर वरार की लजिस्तटिव असेम्बल्ली के सदस्य हाने के लिये याग्यताएँ; सन्‌ १६२४ ३० के ऐक्ट के अनुसार प्रान्तीय व्यवस्थापक सभाओं का नक्शा ओर प्रश्न | २४-४१ अध्याय ४:--नयर विधान के अनुसार प्रान्तोय विपय; नय विधान के अनुसार संयुक्त विषयों की /... सूची, संघीय विपय ओर प्रश्न | अध्याय ५:--भारत सरकार ( सन्‌ १९१९ ई० के ऐक्ट (ञअ ) के अनुसार ) गवनर-जनरल, गवने र-जन- पए८-७०

3२-४७

डरे

रल के अधिकार, (शासन, आथिक ओर पृष्ठाड कानून सम्बन्धी अधिकार ); गवनेर-जनरल की काय-कारिणी सभा, सभा का अधिवेशन क्रायं विभाग; केन्द्रीय सेक्रेटरियट; शासन विपय, भारत सरकार का प्रान्तीय सरकारों के साथ सम्बन्ध; अवस्था-परिवर्तेन-कालिक व्यवस्था, केन्द्रोय ओर प्रान्तीयः सरकारों के

आपके झुख्य साधन, ओर प्रश्न | छघ-७० अध्याय ४:--भारत सरकार ( सन १६३५ ई० के ऐक्ट (ब ) के अनुसार ), संघ सरकार की स्थापना, गव॒- नर-जनरल ओर वाइस राय, आर्थिक सला- हकार, ऐड-बाकेट जनरल, रक्षित विपय, कुछ रक्षित विपय, गवर्नेर-जनरल के विशेष उत्तर दायित्व के विपय, भारत सरकार तथा प्रान्तीय सरकार का सम्बन्ध; गवनर जनरल के अधिकार ( कानूनी, आथिक ओर शासन सम्बन्धी अधिकार ), नसीहत-

नामा ओर अभ्यास के लिये प्रश्न ७१-८१ अध्याय ६:--देशी रियासतें; त्रिटिश सरकार ओर देशी राश्यों का सम्बन्ध; सहाराती विक्टो- रिया; रियासतों की श्रेणी; पोलिटिकल रेजि- डेन्ट ओर एजेन्ट; देशी राज्यों का ब्रिटिश सरकार के प्रति कर्तेठ्य; ब्रिटिश सरकार के देशी राज्यों के प्रति कतंव्य; ब्रिटिश सरकार और देशी राज्यों के भीतर मामलों में हम्त-

क्षेप; नरेन्द्रमण्डल, बटखर कमेटी ओर देशो ८०-१०३

2

रिथासतें, देशी राज्यों का शासन, सव्‌ एछ्ाक १६३४ ४० का विधान; देशी रियासतें; प्रजा के प्रति देशी नरेशों का कतंव्य | प्रश्न. 5२-१०३

| हि हा टरँ

अध्याय ७:--भारत मंत्री ( सन्‌ १६१५९ एक्ट के अनसार ) मंत्री मण्डल का चुनाव; त्रादश सम्राट ओर भसारतव॒प; भारतमंत्री, भारत मंत्री के काये। भारतमंत्री आर उसकी इण्डिया क्रॉसिल; इण्डिया कोसिल की डउप- योगिता; इण्डिया आफिस; भारतमंत्री का भारत सरकार के साथ सम्बन्ध; हाई कमिश्तर-फार-इण्डिया, सारत-मंत्री ओर इण्डिया कॉखिल (सन्‌ १९३१५ ई० के एक्ट के अनुसार) इण्डिया कीसिल, हाई कमिश्नर फार इडिया ( सन्‌ १९३४ इ० के ऐंक्ट के

अनुसार ) आवश्यक सुचना, प्रश्न | १०४-११५९ अध्याय ८:--नागरिक जीवन को समस्यायें--कानन (अर ) बनाना, छाटी सभा का संगठन-दो सभाओं से लाभ, बड़ी सभा से हानि, धारा-सभा के काय; धारा-सभाओं के सबप्रिय होने की आवश्यकता, भारतोय धारा-सभाओं की वृद्धि आर विकास, पिट का इण्डिया ऐक्ट

( (८८४ ३० ), सन १८३३

पत्र, सन्‌ श्८

१८६०५ इ० का

इ० का आज्ञा- 4 ३० का आज्ञापत्र, सन ण्डियन कौसिल ऐक्ट, भार- ताय घारा-सभ्ा, सन्‌ १८६२ ४8० का इण्डि-- यत्- कॉसल-एक्ट, सन १९०६ ई० का १२०-१६३

कोंसिल ऐक्ट या मार्ले-मिन्टो सुधार, मार्ले- प्ृष्ठाक्ू 'मिन्‍्टो सुधारों के गुण दोष, सन्‌ १६१० ई० का सुधार ऐक्ट; भारतीय घारा-सभा, दोनों सभाओं का सम्बन्ध; प्रेसीडेण्ट; भारतीय घारा-सभा सन्‌ १६१६ ई० के अनुसार; राज्य परिषद्‌ सन्‌ १६१६ ई० के अनुसार; राज्य परिषद और भारतीय धारा- सभा के मतदाताओं की योग्यता; भारतीय घारा-सभा के मेस्‍्बरों के अधिकार, भार- तीय-धाश-सभा का अधिकार क्षेत्र; मसविदों के प्रकार, भारतीय धारा-सभा का काये- क्रम; बजट, सन्‌ १९१६ ई० के ऐक्ट के अनुसार प्रान्तीय सभाओं के सदस्यों की संख्या; छुल सन्‌ १९३४५ ६० का गवनेमेण्ट आफ इण्डिया ऐक्ट संघीय राज्य परिपद, संघीय व्यवस्थापिका सभा, नक्शा फेड- रल असेम्बली के मेम्बरों का, त्रिटिश भारत की २५० जगहों का बटवारा, संघ-सरकार के कानून बनाने के अधिकार, अवशिष्ट

अधिकार ओर प्रश्न -.. १२०-१६३ अध्याय ८:--कर ओर सरकारी आय-व्यय, राज्यों (ब ) की आय के कुछ साधन; कर क्या है; कर ओर फीस, कर के प्रकार, कर के 'सिद्धांन्‍्त, कर लगाने में न्याय, भारत-सरकार की आय के प्रमुख साधन, अन्य साधन, आय बजट ( १६३५-१६ ई० ) सावंजनिक ऋणशण,

भेद, ऋण, परिशोष, ओर प्रश्न १७४-१८७

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प्रध्याय ८:--मालगुजारी; जमीन पर अधिकार; रैयत- श्छाऊ (स) बारी; उसके गुण-दोप; जमीन्दारी प्रथा; स्थायी. वनन्‍्दोबस्त;। शुण-दोप$ कास्तकारी कानून; आय के अन्य साथन) भूमिकर लगाने के सिद्धान्त | रै८घ८घ-१६२ ध्रध्याय ८:--प्रान्चीय सरकार की आय के साधन (ड) नया विधान और सरकारी आय; सध्यप्रान्त ओर बरार का अनुमानित आय ओर व्यय का व्यारा नक्शा द्वारा | प्रश्न १६३-२०० कुछ जानने योग्य वार्तें:--राज्य परिषद के स० प्र० आर बरार के सदस्यों के नाम; भारतीय धारा- सभा के म० प्रा० आर वरार के सदस्यों के नाम; स० प्रा० ओर बरार के गवनेर आर लेजिस्लेटिव असेम्बली के सदस्यों की नामा- बली; नई प्रान्तिक असेम्बली आर लेजिस्ले- टिव कॉसिल ( सन्‌ १६१६ ई० ) के सदस्यों की संख्या की तुलना; ग्रामीणों का ऋण; एकाकी हस्तान्तरित सताधिकार; सी. पी. सरकार के सामस्प्रदायिकता को रोकने के उपाय; छुछ ज्ञातव्य बातें; कांग्रेखों प्रान्तों के प्रधान मंत्रियों के नाम; गेर कांग्रेसी प्रांन्तों के प्रधान मंत्रियों के नाम; छुछ नई नियुक्तियां; तानाशाही; ग्ज्ञातंत्र; सी, पी. गजट से; नागपुर हाईस्कूल सर्टीफिक्रेट परीक्षा पत्र

सन्‌ १६३०, १६३८ ओर १६३६ | २०१-२३२

चित्र-सूची

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के सच

सोम मभ्यप्रान्त के गवने

श्रीमती चिजयलक्ष्मी पं दित न्ब्ड

श्री घनश्यामदास गुप्त

श्रीमती अनसुयाबाई काले

डा० ४० राघवेन्द्रराव वार-एट-ला«« सर मारिस ग्वायर

महात्मा गान्धी ब्लर राजकोट के ठाकुर साहेब. -«« लाड लिनलिथगो हा महारानी विक्टोरिया

निजाम हैदरावाद ५५ लाडे जटलैण्ड 28६ लाडे मार्ले

लाडे मिनटों

लाड चेम्सफोर्ड

फेन्द्रोय धारा-सभा देहली प्रेसीडेण्ट पटेल "् वर्तेमान-भारत-सम्राट जाजे षष्ट ..« नागपुर असेम्बली भवन ग्वालियर नरेश 238

११२ १३७ १३८ श्र १४४ १४५ १५४ १५६

१६६

>जुम्िकार

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प्रत्तत पस्तक मध्यग्रदेश तथा वरार के नवीन शिक्षाक्रम के अनुसार हॉई-स्कूल की कक्षा से // तक के लिये लिखी गईं है इस पुस्तक की कुछ विशेषतीएँ ये हः-भाषा सरल आर सुवोध है जो वालकों की समझ में जल्दी आवेगी। पारिडित्य का ग्रदर्शन किसी स्थान पर नहीं किया गया हैं

लेखकजी बिषयान्तर कहीं नहीं हुए हैं कोई वात अनर्गल नहीं हे | विषय का ज्ञान पृर्ण कराने के हेतु जो उदाहरण कहीं कहीं चुने गये हैं, वें बहुत ही उचित है| परिनाषाएँ स्पष्ट रीति से लिखी गईं हैं। इन सब विशेषताओं का उद्देश विपय को मनोरंजन वनाने का ही नहीं, वल्कि उसे उपदंशपुण! बनाने का भी है ओर इस ग्रयल में लेखकजी को पूर्ण सफलता मिल्ली हे |

अभ्यासा4 जो प्रश्न अंत में दिये हैँ उनसे भी बालकों को अधिक लाभ होगा | मेर/ समझ में नायरिक-शास्त्र के सम्बन्ध सें काइ पुस्तक शालाओं के विद्यार्थियों के लिये इतनी उपयोगी

नहीं हैँ जितनी कि यह और इस कार्य के लिये मे श्री सिद्धनारायण जी को बधाई देता हूँ

लस्लूराम तिवारी सागर

मे. ए., एल, टी.ढ, टी, डी., ( लंदन ) रे!-ट-रेट हेडमास्ट हेड्मास्टर,

गवर्नमेण्ट हाईस्कूल, सागर, सी. पी.

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निवेदन

मध्यप्रदेश ओर बरार के शिक्षा-विभाग ने हाईस्कूल की कक्षाओं के लिये भी पाछ्य-क्रम में नागरिक-शासत्र (>ए7०8) एक विषय निर्धारित किया है। विपय नया होने के कारण इस विषय पर अभी कोई ऐसो पुस्तक हिन्दी में नहीं है, जिसमें निधोरित शिक्षा-क्रम के अनुसार सब विपयों का पूरा पूरा, विपयानुकूल, ओर अप-दू-डेट वर्णन मिलता हो

पुस्तक के अभाव के कारण विद्यार्थियों ओर शिक्षकों दोनों को बहुत कठिनाई होती थी इस कमी को दूर करने के लियेही इस पुस्तक की रचना को गई है.। इसके लिये में सध्य- प्रान्त के शिक्षा-विभाग के डायरेक्टर-आफ-पव्लिक-इंस्ट्रक्शन को हृदय से धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे हिन्दी में सिविक्स पर पुस्तक लिखने की आज्ञा प्रदान की

नागरिक-शाखत्र, दर्शन-शाखस्त्र, राजनीति-शाखत्र, अथे-शाख्र, विज्ञन, और गणित शात्र कुछ ऐसे शास्त्र हैं जिनका ज्ञान बिना गुरु के होना कठिन है | यह पुस्तक यदि शिक्षक के पढ़ाये पाठ को समझने ओर हृदयज्भम करने में विद्यार्थियों की सहायक हो सकी, तो इसका उद्देश पूर्ण होजाता है

पुस्तक तीन भागों में विभक्त की गई है ओर वे क्रमश

नवोीं, दशर्वी ओर ग्यारवीं कक्षाओं के लिये, निर्धारित-क्रम के

अनुसार लिखी गयी है। प्रत्येक अध्याय के अन्त में कुछ ब् में (ः

अभ्यास के लिये प्रश्न, जिनमें नागपुर-बो्डे के प्रश्न भी

हैं, जिनसे विद्याथियों को पढ़े हुए पाठ की मझुख्य-मुख्य

बातों को एकवार फिर सोचना पड़े ओर परीक्षोपयोगी

|

श्री होथें, जाड़ दिये गये हूँ | किन्तु विद्याथियां की उन्हीं प्रश्नों पर ही विलकुल्न निर्भर नहीं रहना चाहिये द्वितीय भाग के अन्त में नागपुर बोड के साल प्रश्न

अलग से दे दिये गये हूँ

९?

में अपने दयात्ु, उत्सादी, उदार ओर शिक्षा-प्रेमी हेड मास्टर श्रीमान पं० लल्छराम जी तिवारी, एम, ए., एल« दी., टी, डी., ( ह्ंदन ) के प्रति, जिन्होंने इस पुस्तक की भूमिका लिखने की कृपा की है, अपनी ऋृतज्ञता प्रकट करना अपना , परम कतेव्य सममभता हूँ |

अन्त में में अपने उत्साही, शिक्षा-प्रेमी भाई सुन्दरल्ालजी गेंगले के प्रति अपनी छृतज्ञता प्रकट करता हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक का अथक परिश्रम के साथ बहुत ही अल्प-काल में उत्तम छपाई ओर सफाई के साथ अपने सुन्दर प्रेस सागर, से सुद्रित कराया

इस पुस्तक के लिखने में जिन-जिन ग्रंथों ओर पत्र- पत्रिकाओं से, जिनकी सूंची अन्यत्र दींगई है, मुके किसी

रूप में सहायता मिली है, उनके लिये में अपनी कृतनता उनके लेखकों के प्रति प्रकट करता हैं |

८;

यदि कोई अध्यापक महाशय इस परतक को अधिक उपयांगो बनाते की दृष्टि से सुधार की बात लिख भेजने की कृपा करगे, ता में उनका अत्यन्त कृतज्ष बनेंगा ओर दसरे संस्करण के समय उन पर सह विचार करूँगा

गापालगद्ध $ सागर

हे रे विनीत-- 5? जून, सच १६३६ ६० |

लेखक

दो शब्द

मध्यप्रान्त के शिक्षा-विभाग को * धन्यवाद देता हूँ कि उसने हाई-स्कूलों के लिये भी नागरिक-शासत्र ? का - विषय पाठ्य-क्रम में निर्धारित कर दिया हे

यह पुस्तक हाई-स्कूल की दसवीं कक्षा के लिये नूतन शिक्षा-क्रम (सन्‌ १६४७० ओर १६४१) के अनुसार लिखी गई है! प्रथम ओर तीसरा भाग प्रकाशित हो चुके हैं।

पुस्तक विद्याथियों के लिये लिखी गई है, लेकिन यह सर्व-साधारण के लिये भी बहुत लाभदायक है, क्योंकि इसके विपय ऐसे हैं (फेडरेशन, प्रान्तीय स्वाराज्य, देशीरियासतें, कर, बन्दोबस्त, केन्द्रीय ओर प्रान्तोय सरकारों के आयके साधन, प्रान्तीय तथा केन्द्रीय. धारा-सभाएँ इत्यादि ) जो सामान रूप से प्रत्येक नागरिक के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं

लेखक महोदय के विपय में केवल इतना लिख देना पर्याप्त होगा कि आप इस प्रान्त के गवनमेन्ट हाईस्कूलों की दसवीं ओर ग्यारवीं कक्षाओं के विद्याथियों को अंग्रेजी, हिन्दी, इतिहास, ओर नागरिक-शास्त्र लगभग १९ वर्षों से पढ़ाते हैं ओर आप एडिनवर्ग युनिवर्सिटी, ग्रेट ब्रिटेन की टो. डी ( क्वांस ) के विद्यार्थी भी रह चुके हैं, किन्तु स्वास्थ खराब होने से सेशन पूर्ण होने के पूव ही भारत वापस आजाना पड़ा आप अलीगढ़ युनिवसिटी के ला (क्लास ) के विद्यार्थी भी रह चुके हैं "

प्रायः समस्त भारतवषे,' स्कौटलेन्ड; इंग्लेण्ड, फ्रान्स, स्विटजरलेण्ड, इटली, कैरो, एडन इत्यादि देशों का आपने

अमण भी किया हे | देश के धुंसूवर विद्वानों से जेसे प्रो० यादूतनाथ सरकार; ग्रो० पी० शेशाद्री; वा, श्रो प्रकाश, वार-एट-ला, एस, एल. ए, ( केन्द्रीय ) आचाय कृपलानी; प्रो” भ्रुव; माननीय बाबू सम्पूर्णानन्‍द, वर्तमान शिक्षा मंत्री, यू० पी० इत्यादि से आपको शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हे

इस पुस्तक के भूमिका लेखक गवनेमेन्ट हाईस्कूल सागर के हेडमाम्टर श्रीमान्‌ प॑० लल्छराम जी तिवारी एम. ए., एल, टी., टी. डी., ( लंदन ) 6। आपकी इस कृपा के लिये

॥०.-:-4

में बहुत ही आभारी हूँ

सागर विन्नीत--- २० जून, सब १५३६ प्रकाशक

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76888 'पंबधणाड 099 मच & 56%.

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वक6 ४९४६ 48 6 8४९ 95 96७ एपंग्रॉ:्ते 5शी६०घ5 607 4940,

नागरिक-शा्र प्रथम अध्याय.

धन्य 6५६7६ 000

प्रान्तीय-शांसन

( सन्‌ १९१६ ३० के ऐक्ट के अनुसार ) हिन्दुस्तान शासन के सुभीते के लिये १४ प्रान्तों में विभक्त कियां गया है और उनके नाम इस प्रकार हैं।--

(१) बंगाल, (२) मद्रास, (३) बम्बई (४) संयक्तप्रान्त आगरा ओर अवध, (४) पंजाब, (६) बिहार ओर उड़ीसा, (७) भध्यप्रदेश ओर घरार, (८) बसों, (६ ) पश्चिमोत्तर प्रदेश, (१०) दिल्ली, (११) ब्रिटिश- बलुचिस्तान (१२) अजमेर-मेरवाड़ा, . ( १३ ) कुर्ग, ( १४ ) अन्डमान ओर निकोबार, (१४५) आसाम |

इन प्रान्तों को शासन की दृष्टि से तोन भागों में विभक्त किया गया है।--

(अ ) गवनेर के मातहत के प्रान्तः--( १) बंगाल, (२) मद्रास, (३) बम्बई, (४) संयुक्तप्रदेश, ( ४) पंजाब, (६) बिहार ओर उड़ीसा, (७) मध्यप्रदेश और बरार, (८) बमों; (सन्‌ १६२२ ई० में हुआ ) और (६) आसाम |

हि

(व) चीफ कमिश्नरों के मातहत के प्रान्त/-7 (१) पश्चिसोत्तर प्रदेश, (२) त्रिटिश वल्लुचिम्तान, (३) दिल्ली, (४) अजमेर-मेरबराड़ा, (४) कुग, ओर (६) अन्डमान हढोप |

(स) सन्‌ १६२२ ६० से वर्मा एक गवनेर का प्रान्त वन गया और इसके पूर्व वह ल्ेफ्टिनेन्टनगावनर के मातहत में था |

गबर्नरों की नियक्तिः--वँंगाल) मद्रास और बम्बई को हि

अहाता कहते हैं। यहाँ के गवर्नरों के पद तथा अधिकार

दूसरे गबनरों से अधिक हैं

कक 4५2 4० ८2» य््ट 2 | शो. 6 ठः ८22... इनकी नियुक्ति सम्राट द्वारा 7 ५» 62222 % 727 ८5 2222222.3 2 2 2..। भारत-साचव का सफारश डॉ टी हा ट्रु 2 4 442 2222 १84 है 5 5 > ] गम ! रे ४2225 4 पर होतो है ( 8ए* ज्क्यपक्षा) 42 4 22225 2 प्रश्व७ फर6 पऐिठएशं शा87 ८:22 हि

2 ४00७) | दूसरे प्रान्तों के 22 गबनर बादशाह द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, किन्तु उनकी नियुक्ति गवरनर-जनरल की गय से की जाती है ओर ये 22 लोग इण्डियन सिविल सर्विस 22. + कमचारी होते हें बंगाल,

2 02८.2. मद्रास ओर वन्चई के गवर्नरों " &< ८28 की : तनख्याह अधिक रहती सध्यप्रान्त और बरार के बतमान गवनर। है! ! इन अहातों के गवनरों को सीधे भारत-सचिव के साथ पत्र व्यवहार करने की अनुमति है | वे गवर्नर-जनरल के हुक्म के खिलाफ भारत-सचिव के पास अपील कर सकते हैं। जब गवर्नर-

स् कि

तर दि २5, स्ि ही कस पर हु जज जे »

जनरल का स्थान थोड़े समय के लिये खाली होता है, तब प्रेसीडिन्सी के गवनर इस स्थान पर नियुक्त किये जाते हैं. कानूनन गवरनेरों का कार्य-काल निर्धारित नहीं है, किन्तु ये पांच वर्ष के लिये नियुक्त होते हैं प्रेसीडेंसियों के गवनेर “इण्डियन सिविल सर्विस” के कम चारी नहीं होते | ये इँग्लैण्ड के प्रसिद्ध राजनीतिज या राजनेतिक दल के सदस्य होते हैं प्रत्येक गबनेर के प्रान्त में एक घारा-सभा होती है तथा एक प्रतबन्ध-का रिणी-प्तभा प्रबन्ध-कारिणी सभा के सदस्य भी बादशाह द्वारा, गवनेर-जनरल की सिफारिश पर, नियुक्त किये जाते हैं। चीफ-कमिश्नर, सपरिपद्-गवनर-जनरल द्वारा नियत किये जाते हैं। इनको गवरनेर-जनरल के हुक्म के अनुसार शासन करना पड़ता है | इनके प्रान्तों के शासन की जिम्मेदारी गवर्नर-ज्ननरल पर है | चीफ़कमिश्नर तो एजेन्ट सात्र हैं। कु में धारा-सभा है। पश्चिमोत्तर श्रान्त में एक मंत्री ओर एक एक्ज़ीक्यूटिव मेम्बर की व्यवस्था की गई है। पश्चिमोत्तर प्रान्त गवनेर का प्रान्त सन्‌ १६३२ ६० में बना ओर बर्मा सन्‌ १६२२ ईं० में लेफ्टिनेंट-गवरनेर सिफे बर्मा में था, किन्तु सन्‌ १६२२ ई० में वह भी गवनेर का प्रांन्त बना दिया गया। लेफ्टिनेंट-गवर्नर की नियुक्ति सपरिपद्‌-गवर्नर-जनरल बादशाह की स्वीकृति से' करते हैं। इस पद पर नियुक्ति के लिये १० साल की पूव नोकरी होनी चाहिये। इनकी सहायता के लिये प्रबन्ध कारिणी सभा होती है ओर इन सभासदों की नियुक्ति गवर्नेर-जनरल बादशाह की स्वीकृति से करते हैं सपरिपद-गवर्नेर-जनरल को सपरिपद-सारत-सचिव की पूर्व स्वीकृति से प्रान्तों की सीमा में रदोबदल करने का अधिकार है।

व्रिटिश बलुचिस्तान! --यह प्रान्त सच्‌ १८८७ ३० में बना 5 यार यहां का शासन प्रवन्ध त्रिटिश-बलुचिस्तान के एजेन्ट- टू-दी-गवनर-जनरज्न” द्वाया होता है|

कुंग+---अग सन 7८३४ ई० सर त्रटश-सरकार के सातहत

ह। यहाँ का शासन-अवन्ध भारत रत सरकार के विदेशी तथा धजनतिक मुहकरम के अधिकार सें | संसूर के रेजीडेन्ट रा इसका शासन हाता है | इस तरह से बह यहाँ का वाक-कमेश्तर कहलाता है |

4

(९

अजमर-मरवाड़ा;-...यहाँ का शासन एजेन्ट-2 दी-गवनेर- जनरल राजपृताना द्वारा होता है ओर अजमेर इनकी "जिधानी ह। इस ग्रान्त भें यह चाफ-कसिश्नर को हेसियत

थ्

से शासन करते हु |

>वान का उपनिवेश/---सन्‌ १८१८ इं० से लम्बा सजा के कदी यहाँ भेजे जात हू। यहाँ का शासन भारत-स रकार के प्रहणवेभाग द्वारा होता पाटंब्लेयर का सुपरिन्टेडेंट ( >पथ१७/७७१७३६ रण (१९३५ /06/0७767६ » यहाँ का शासक होता है | हाल ही में इसे बन्द करने का प्रस्ताव पड़ा थाग-सभा में अपास्थत हुआ था किन्तु गवनर-जनरत् दरार बह प्रस्ताव नासजूर कर दिया गया

गवनर तथा उनकी कायकारिणी सभा:-प्रत्येक गवर्नर का सच या के लय एक क्रायका रणोऊि सभा रहता ह€। काय- परिणी सभा के मेंबसे थे संख्या कोई निश्चित नहीं है |

जा

इनकी 8 छ. [4 " भारत-सचिध "पका संख्या निश्चित करते हूँ, किन्तु इसकी जया चार से अधिक नहीं हाती की

नह

भारत-सचिव द्वारा पालिसेन्ट के समक्ष जिम्मेदार होते हैं इनकी सभा का सभापति गबनेर या गवनर द्वारा निर्धारित कोई मेंवर हाता है इनके जिम्मे शासन के कु विभाग होते हैं कानन में ऐसी कोई शर्ते नही जिसके अनुसार हिन्दुस्तानी सदस्य का होना अनिवाये हो, किन्तु लोकाचार में आधे मेम्बर हिन्दुस्तानी होते हैं।

गवनेर ओर काय-कारिणी सभा के सदस्यों के संचंध---

गवनेर और कार्यकारिणी सभा के सदस्यों को मिलाकर सपरिपद-गवर्लेर कहते हैं. गवर्नेर को बहुमत के निर्णय को मानना पड़ता है ओर यदि दोनों पक्ष में मेम्बरों की संख्या वरावर हो, तो गवनेरों को अतिरिक्त बोट देने का ( 098#7९ ००४७ ) अधिकार प्रपप्त है। किन्तु आवश्यकता पड़ने पर खास खास माकों पर गवनर उनकी राय के अनुसार कार्य करने के लिये बाध्य नहीं है गवनंर तथा सदस्यों के कामों पर गवर्नेर-जनरल को नियंत्रण, निरीक्षण ओर सलाह देने का पूर्ण अधिकार है

हंध शासन (५ 0श४५ी॥ ) का आरम्भ

मदन बी. टी

सन्‌ १९१९ ३० के सुधार-ऐक्ट के अन्लुसार प्राँतीय विषय दो भागों में विभाजित किये गये हैं।--- (१) रक्षित विपय ( 06897ए७ते 5प्रश]|ं०४ं४ ) ओर (२) हस्तान्तरित विपय ( ॥7७॥8०780 5प्रीजुं००8 ) रक्षित विषयों का शासन गवनेर कार्य-कारिणी सभा के

सदस्यों की सहायता से करता है ओर हस्तान्तरित विषयों

का प्रबन्ध मंत्रियों की सहायता से करता है प्रान्तों में

मंत्रियों की संख्या निश्चित नहीं की गई हे, किन्तु बढ़े प्रान्तों में और छोटे प्रान्तों में मंत्री नियुक्त किये गये ह। मंत्रीगण गवबेर द्वारा प्रॉँतीय बार-सभा के चुने हुए मेंबरों में से चुन जाते हैं। यदि मंत्री धारा-सभा का मेंबर नहीं है, तो उसे छः माह के अंदर किसी निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हो जाना चाहिये, नहीं ता बह मंत्री नहीं रह सकता। मंत्री की अवधि गवनर की इच्छा पर निर्भर रहती इनका वेतन उतना ही होता है. जितना कि कार्यकारिणी सभा के सदस्य का इनको गवर्नर और घारगा-सभा दानों को प्रसन्न रखना पड़ता है हस्तान्तरित थिपयां में गवनंर उनकी राय के अनुसार कार्य करता है, किन्तु उनकी राय को मानने के लिये बह बाध्य नहीं | इनकी स्थिति एक प्रकार से सलाहगीर के अनुसार हे उनकी सलाह मानी जाय या नहीं यह गवरनेर पर निर्भर है | इस प्रकार के ग्रॉतीय शासन प्रणाली का द्रध-शासन' (072०9) कहते हैं इस प्रकार सन्‌ १६१५ ३० के मुधार ऐक्ट के अनुसार कुछ परिमाण में प्रातों मं उत्तरदायित्व पूर्ण शासन स्थापित हुआ |! वास्तविक उत्तरदायित्व इसी बात में है क्रि मंत्रीगण चुने हुए सदस्यों में सेहीहो सकते हैं | इनकी नियुक्ति गवरनर द्वारा होती है तथा उसके ढारा ये लोग अपने पद से हटाये सी जा सकते हूँ। मंत्रियों का वेतन असेम्बली निश्चित करती है और फिर यह्‌ वेतन मंत्री के कार्य-काल में घट चढ़ नहीं सकता [ असम्बली के निर्णय के अनुसार सदस्यों को अब वेवन मिलता हैं। नये विधान के अनुसार ]

५... इनके वेतन में कसी करने का अधिकार धारा-सप्ा को प्राप्त ह। प्रत्येक मिनिस्टर के मातहत कुछ विपय शासन के लिये

हि

रखे जाते हैं| प्रत्येक मिनिस्टर सिर्फ अपने विभाग के काये के लिये उत्तरदायी होता है संयुक्त उत्तरदायित्व नहीं है मंत्रियों की स्थिति;--मंत्रियों की स्थिति सदैव डााँडोल रहती है, क्योंकि इनको दो मालिकों को खुश करना पड़ता हे, जो कि वहुत कठिन है। गवनेर जब चाहे तब उनको पद से हटा सकता है। यदि मंत्री अपने पद पर बना रहना चाहता है, तो उसे गवरनर को सदेव प्रसन्न रखना चाहिये। यदि मिनिस्टर्स दबंग हुए. तो उनको अपनी योग्यता का परिचय देने का मोका नहीं मिलता, क्‍योंकि उनकी राय गवनेर से नहीं मिलती उनके अधिकार परिमित हैं। वे अपने अधिकारों का धनाभाव के कारण सदुपयोग नहीं कर सकते ओर धारा-सभा के अन्य सदस्यों को प्रसन्न नहीं कर सकते। धारा-सभा को उनके वेतन में कमी करने तथा उन पर अविश्वास का प्रस्ताव पास करने का अधिकार हे'।

+ त्रियों बे रे में मंत्रियों ओर काय-कारिणी-सभा के सदस्यों में समानता तथा असमानता।-- _ हक 5 एः इन दोनों में नियुक्ति, कायेकाल, वेतन यचनंर से संबंध सथा धारा-सभा के साथ के संबंधों में, भिन्नता पाई जाती हे नियुक्ति;--फार्यकारिणी-सभा के सदस्य गवनेर-जनरल की सिफारिश पर सम्राट द्वारा नियुक्त किये जाते हैं कार्यकाल;- ऊार्यकारिणी-सभा के सदस्य पांच वर्ष के लिये होते हैं ओर मंत्री सिर्फतीन वर्ष के लिये यदि वे गवनर वथा धारा-सभा को बराबर प्रसन्‍न रख सके तो, अन्यथा नहीं

है रंडी

बेतनू--कार्यकारिणी सभा के सदस्यों का वेतन भारत- सचिव द्वारा निश्चित किया जाता है ओर इसके लिय

छः

धागा-सभा का सजुरा का आवश्यकता नहीं है, किन्तु मात्तस्टस क्र वेतन में कमी करने का अधिकार घारा-सभा को हैं।

उत्तरदायित्न--कार्य-कऋरिणी-सभा के सदस्य अपने काय के लिय भारत-सचिव के प्रति जिम्मेदार होते है. आर मंत्री गवर्नर आर घारा-समा दोनों के प्रति मंत्रियों की कोई सभा नहीं हाती | वे अपन विभाग के लिये ही उत्तरदायी होते हैं संयुक्त उत्तरदायित्व का विज्ञकुल अभाव है | मंत्रियों का एक राजनतिक दल का होना आवश्यक नहीं है। हस्तान्तरित विपयों के शासन का उत्तरदायित्व गवर्नर पर है ओर रक्षित

विपयों के शासन का उत्तरदायित्व भारत-सरकार के ऊपर अवलम्बित है |

विपया का व्ाजन

सन्‌ १९१६ ६० के मुधार एक्ट के अनुसार शासन संबंधी विपय दो भागों में बांट गय हैं. (९) केन्द्रोय विपय आर (२) प्रान्तीय विषय | प्रान्तीय विपय दो भागों म॑ विभक्त हें (१) रक्षित विषय आर (२) हस्तान्तरित विपय | कुल प्रान्तीय विपय ४र्‌ इनसे कुछ रक़ित हैँ तथा ऋछ हस्तान्तरिन | नय विधान में विपय तोन भागों में बाँटे गये हैं. (९) संघीय विषय, (२) संयुक्त बिपयय ओर (३) प्रांतीय विपय। संघ सरकार संवाय विपयों पर, प्रान्तीय सरकार प्रान्तीय बिपयों

है) आर संयुक्त विपयां पर दानों में से कोई भी कानन

वना सकती है | ( उनकी सूची आसे दी गई है )

कुछ महत्वपूर्ण विषय इस प्रकार हैं।--

रक्तित विपय

6 <#0. /६

री

. जंगल

पुलिस | जेल र्‌ न्याय विभाग | 2] आधिक विपय और छठ

लोकल आइडिट

लगान संबंधी व्यवस्था | ४. फेक्टरियों की देखरेख | ६.

यूरोपियनों की शिक्षा

अकाल निवारण | सिंचाई और नहरें

5५५

प्रान्तीयः धारासभाओं के

|

१०,

हस्तान्तरित विषय |

, स्थानीय स्व॒राज्य संस्थाएँ। . हिन्दुस्तानियों की शिक्षा , व्यवसाय की जन्नति।

., सार्वजनिक स्वास्थ्य ओर

सफाई | दइवादारू का प्रबन्ध पव्लिक बक्से

, कृषि तथा मछलियों से लाभ

होने के स्थानों का प्रबन्ध हायक साख समितियाँ |

रजिस्ट्रेशन

आबकारी

सदस्यों की संख्या सन्‌

१९१५९ ३० के सुधार-ऐक्ट के अनुसार इस प्रकार है--

१. 'चंगाल 5 १४५ ३. बम्बई १११ ४. चर्मा - १०३ ७, पंजाब एरे ६. आसासम -> ४रे

मद्रास संयुक्तप्रंत- ११८ बिहार उडीसा--ध८ मध्यप्रदेश ८5 ७० पश्चिमोत्त प्रांत--४०

3 हे ६. प्‌.

१०,

१०

विशा

वर्तमानकाल में राष्ट्रों के प्रधान करतव्य निम्नलिखित समझे जाते हैं।“- सावजनिक शिक्षा, आश्रक डर्न्नात,

आवागमन के साधन, सावंजानक स्वास्थ्य, समाजिक सुधार, व्यवस्था, रक्षा, न्याय; अन्तर्राष्ट्रीय सहणेग ओर देश रक्षा (टाक्टर वेनीप्रसाद )

प्रत्येऋ प्रान्तीय सरकार अपने कार्यो को कई विभागों में विभक्त करती है ओर एक या कई विभाग एक मिनिस्टर के जिम्मे सोंपा जाता है सन्‌ १९१६ ६० के मुधघार-ऐक्ट के अनुसार केवल हस्तान्तरित विपय मंत्रियों के जिसमे सोंपे गये हूं ओर रक्षित विषय गवर्नर की काय-कारिणी-सभा के सदस्यों के जिसमे | प्रत्येक्ष बिभाग का सर्वोच्च सरकारी कमेंचारी अलग रहता हु। शिक्षा का डाइरेक्टर-ऑफक-पब्लिक-इन्स्ट्रक्शन; कृषि का डाइरेक्टर-ऑक-कृषि; इन्सेक्टर-जनरल-ऑफक-पुलिस; डायरक्टर ऑक इन्डरस्ट्रीज; इन्स्पक्टर-जनरल-आऑफ-सिचित्ष

हास्पाटल, डायरक्टर-ऑफ-पब्लिक-हेल्थ, चीफ-इंजीनियर इत्यादि

प्रत्यक प्रान्त को शाजबानी में एक विशान्न दफ्तर रहता

है, जिसे “सक्रेटरियट” कहते हैँ। प्रत्येक विभाग का सबसे बढ़ा दफ्तर इसी विशाल इमारन में रहता है। प्रत्येक विभाग

का सर्वोच्च कमंचारी प्रान्तीय सरकार का सेक्रेटरी होता है

आर उसकी सहायता के लिये कई यक् कसंचारी आर हक रहते हैं नये विधान ( १६३७ ई०) के अनुसार

गवनर अपत वेयक्तिक विवेक द्वारा अपने सेक्रेटरियट स्टाफ का नयक्त करने |

११

वरतमान-काल में मध्यप्रान्त के भिन्‍न भिन्‍न विभाग निम्न लिखित पांच मंत्रियों में विभक्त किये गये हैं

(? ) माननीय पं० रविशंकर शुक्ल प्रधान मंत्री--प्रह-कार्य, नियुक्ति, आम शासन, पोलिस ओर फोज

(२) माननीय पं० दुर्गाशंकर महता मंत्री--माल, कानून, जगल, असेम्बली विभाग, न्याय और जेल

(३) माननीय पं० एस. बी. गोखले मंत्री--शिक्षा, सर्वे, वनन्‍्दोवस्त, लेडरिकरार्ड

(2) माननीय पं० द्वारकाग्रसाद मिश्र मंत्री--स्थानीय स्वराज्य सेस्थाएं, स्वास्थ्य, सफाई, समाचारपत्र ओर प्रकाशन विभाग

(५ ) माननीय मि० सी. जे. भारुका मंत्री--वाणिज्य, व्यवसाय, कृषि, आबकारी, पी. डब्लू. डी।

कानूनन मंत्री अपने विभाग का सर्वोच्च कमंचारी है, किन्तु उसके मातहत के सेक्रेटरी जो प्रायः अखिल भारत- वर्षीय नौकरियों के पुराने कर्मचारी हुआ करते हैं, अपनी तरक्की इत्यादि के लिये भारत-सचिब के प्रति उत्तरदाई होते हैं। इन लोगों के अधिकार अपरिमित हैं। कभी भी गवनेर के पास जाकर अपने विभाग 'की सारी बातें बता सकते हैं ओर सरकारी नीति निर्धारित करा सकते हैं।

83

अभ्यास के लिये प्श्न-- ( १7 आन्तीय आसन प्रणाली (डायकी ) का वर्णन लिखा। टसका टायको क्यों कहते हैं £ (२) कुछ रक्षित और इस्तास्तरित विषयों के नाम लिखे (३) मत्रियों और गवर्नर की काय-कारिणी-सभा के सब्स्यों के अधिकारों, वेतन तथा नौकरी की स्थिरता में क्या अन्तर हैं ?

अा+

(४) सन्‌ १०१९५ इ० के खुबार-ऐेफ्ट के अनुसार मत्रियों के पद का वर्णन करों

(५) सन्‌ १९१९ ६० के सुधार-टेक्ट की विश्येपताओं का बन करो (६) प्रान्तीय गबनरों के अविकारों का वर्णन करो। (७) कुछ ग्रान्तीय विश्वार्यो के नाम लिखों।

(८) सेक्रेंटरियट किसे कहते £ ? सेक्रटरियों के अधिकारों का वर्णन करे

दूसरा अध्याय पग्रान्तीय सरकार

नये सुधार ऐक्ट के अनुसार ( १९३४ ३०.) प्रांतों शासन में निम्न लिखित परिवर्तन हुए+--

गवेनरों के प्रांतों की संख्या अब दो ओर बढ़ा दी गई है सिन्ध ओर उड़ीसा दो नये प्रांत बना दिये गये हैं आर वर्मा हिन्दरतान से अलग कर दिया गया | एक नयी चीफ-कमिश्नरी घनाई गई है पंथपिफ्रोदा का क्षेत्र इस प्रकार हिन्दुस्तान में अब ११ गवरनरों के प्रान्त बन गये हैं:--

(१) बंगाल, (२) मद्रास, (३) बम्बई, (४) संयुक्तप्रान्त, (४) पंजाब, (६) मध्यप्रान्तन ओर बरार, (७) उड़ीसा, (८) बिहार, (६) आसाम, (१०) सिन्ध, (११) और पश्चिमोत्तर सीमांप्रांत |

चीफ-कमिश्नरियाँ-- (१) देहली, (२) बलुचिस्तान, (३) 'अजमेर-मेरवाड़ा, (४) छुगे (०) अन्डमान ओर निकोबार (६) ओर पंथपिछ्केदा का प्ञेत्र प्रार्न्तों में उत्तरदायित्वपूण शासन! सन्‌ १६१९ ई० के ऐक्ट के अनुसार प्रान्तों में द्विविध शासन स्थापित हुआ | उसके अनुसार कुछ विपयों का शासन

बा

१४

गवर्भर कार्यकारिणी सभा के मंवर्रों की सलाह से करता था तथा कुछ विपयों का शासन बह प्रान्तीय-बारा-सभा के निर्वाचित सबस्यों सें से चुने हुए मंत्रियों द्वारा करता था| किन्तु सुधार ऐक्ट के अनुसार डायर्क्री का प्रान्तों से अन्त दागया है और सारे विपयों ( कुछ का छोड़कर ) का शासन मंत्रियों द्वारा होता है। इस प्रकार रज्ित ओर हम्तान्तरित विपयो का सेदआव समिट गया कायकारिणी-सभा का अन्त होगया। अब प्रत्यक प्रान्त आन्तरिक विपयों में स्वाधीन सा होगया, किन्तु उनका ऐसे नियम बनाने के अधिकार नहीं हैं जिनसे केन्द्रिय शासन की स्थिति या विधानों में बाधा पड़े सन १९३५ ६० के ऐक्ट के अनुसार मंत्री नामज़द सदस्यों में से भी चुना जा सकता है। मंत्रियों को गवर्नर अलग कर सकता है, किन्तु उनका धारा-सभा के प्रति उत्तरदायी होने के कारण उन्तकी अवधि धारा-सभा पर निर्भर रहती है। इनकी संख्या कानून द्वारा निश्चित नहीं की गई है

निम्न लिग्ित विपयों के शासन का भार गवर्नर के ही ऊपर रहेगा;--

*, अल्प-संख्यक जातियों के हितों की रक्ता

२. सरकारी कर्मचारियों ( भूनपूर्व तथा व्मान दोनों )

के अधिकारों आर हितों की रक्षा करना |

३, देशी राज्यों के अधिकारों की रक्षा। ४8. अंशतः प्रथक किये गये ज्षेत्रों का शासन | ४. व्यापारिक या जाति-गत भेदभावों के कानुनों को शोकना | इन विशेषाधिकारों के विषय सें गवर्नर भारत-सचिव के प्रति जि

जम्मेदार रहेगा। उन विपयों पर भारत-सचिव का

श्श

नियंत्रण गवरनर-जनरल द्वारा होगा प्रान्तों में सम्राट का प्रतिनिधि अब गवर्नर रहेगा। इस प्रकार प्रॉतों को प्रॉतीय स्वतत्रता अधिक प्राप्त होगई गवर्नर-जनरल ओर भारत- सचिव का नियंत्रण कम हो गया।

प्रान्तीय स्वतंत्रता किसे कहते है।--नगे शासनविधान में प्राय: संभी प्रॉतोय विषयों के शासन का भार मंत्रियों के हाथ में सोंपा गया है। मंत्रिगण संयुक्त-रूप से उत्तरदायी हो ऐसा प्रयत्न किया गया है शासकगण और घारा-सभाओं के अधिकार स्पष्ट रूप से विधान में निश्चित कर दिये गये हैं ओर उन क्षेत्रों में वे भारत-सचिव ओर गवनेर-जनरल के नियंत्रण से विज्षकल स्वतंत्र हैं। इस प्रकार के प्रान्तीय-शासन को प्रान्तोय-स्वराज्य कहते हैं किन्तु नये शाखन विधान में गवर्नेरों को इतने विशेष अधिकार दिये गये हैं कि जिनसे प्रान्तीय स्वराज्य नाम-मात्र का रह जाता. है

प्रान्तीय स्पराज्य की विशेषताएँ इस प्रकार हैं।-- (१) ह्विविध शासन कां अन्त हो जाना और प्रायः सभी प्रान्तीय विषयों का सम्पादन मिनिस्टरों द्वारा होना जो कि संयुक्त रूप से अपने कार्यो के लिये घारा-सभा के प्रति उत्तरदायी होंगे

२) मिनिस्टर्रों के हाथ में सारे सामाजिक उन्नति के काय जसे:--बाल-विवाह का बन्द करना, अस्प्रश्यता को मिटाना, स्त्रियों के अधिकारों को दिंलाने का प्रयत्न करना इत्यादि सहत्वपूर्ण अधिकार उन्हें मिले

(३) न्‍याय ओर व्यवस्था के कार्य का सम्पादन करना ओर न्यायपूर्ण शासन चल्ाने के लिये सर्वदा तत्पर रहना इत्यादि प्रान्तीय स्वराज्य के अन्तर्गत आते हैं

१६ रे [0

इस प्रकार ग्रान्तीय स्वराज्य का अथ हे कि प्रान्त कानू ओर आर्थिक वातों में बाहरी शक्तियों से बिलकुल मुक्त है | गवनर-- इनकी नियुक्ति सम्राट दवारा होती है गबलर-जनरल के समान इनके भी विशेषाधिकार रहेंगे। वह प्रान्तों में सम्राट का प्रतिनिधि रहेगा और शासन किस प्रकार चलाना चाहिये, इसके लिये उन्हें बादशाह से नशीहतनामा ( [780770676 [#80707 ) दिये जाँयगे साधारणुत: मंत्रियों की सलाह से शासन चलाया जावेगा, परन्तु उन कार्यों के सम्पादन का भार उसी के ऊपर रहेगा जो कि उनकी खास जिस्मेदारी के विपय निश्चित किये गये ह्ं चाहे तो मंत्रियों की सभा के सभापतित्व का आसन ग्रहण कर सकता है। पग्रान्त'के लिये गवर्नेर-ऐडवोकेट-जनरल ( 00ए00०७ 067०७] ) नियुक्त करेंगे।

गबनेरों के वार्षिक वेतनः--

( १) गबनेर मद्रास १२०,०००] ( ५5 (२) गवर्नर बम्बई २०,०००) + हे (३) गवनर-वंगाल १२०,०००] 2 4 वे बे पर (४) पंयुक्त प्रान्त के गवर्नर १२०,०००) (४) गवनेर पंजाब १००,०००] (ः कप ; 2) ( द्‌ ) गवनर (बहार ५०० ०००] (७) सध्यप्रान्त और वरार के गबनेर |. ७२.० ००) (८) आसाम का गवनेर | (६) पश्चिमोत्तर प्रदेश के गदर पश्चमोात्तर प्र देश के गवर्नर ६६,०००) (१०) उड़ीसा का शबर्स ६६,०००) (११) सिन्ध का गवर्नर ०2 ६६,०० ही

€ः रे | वनर-जनरल्न का वार्पिक वेतन | २४०,८००)

है|

मंत्रियों की सभा ( /79 ९००७० ०0 ऐएं9०४७ )|-..- मंत्रियों की सभा प्रत्येक गवनर के प्रान्त में होगी, किन्तु उनकी संख्या कानूनन निश्चित नहीं है। मंत्रियों का चुनाव गवनेर स्वतः करेंगे उन्हें प्रान्तीय-घारा-सभा का सदस्य होना चाहिय, यदि नहीं हैं तो छः महिने के अन्दर निर्वाचित हो जाना चाहिये सन्‌ १६३४ ई० के ऐक्ट के अनुसार अब ख्तियाँभी मंत्री हो सकती हैं

श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित

( प्रथम भारतीय महिला-मंत्री ) गबनरों का मंत्रियों के साथ संबंध!--श्रान्‍्तों का शासन सम्राट के नाम पर गवर्नर द्वारा होगा। प्रान्त के वास्तविक प्रबंधक मंत्री लोग होंगे जो अपने कार्यों के लिये लेजिस- लेटिब-असेम्बली के प्रति उत्तरदायी होंगे। गबनेर मंत्रियों को कार बाँटेंगे मंत्रियों ओर सेक्रेटरी को गवनेर के ध्यान में यह बात लानी होगी कि कौन विषय उनके विशेष

कल

श्द

उत्तरदायित्व के हैं गवर्नर मंत्रियों से उन विषयों में परामर्श लेंगे, किनत उनकी उनकी राय मानना आवश्यक नहीं है। यह प्रथा केवल उन राष्ठों में प्रचलित रहती हे, जहाँ उत्तरदाय्रित्व-पूर्ण-शासन अभी पृ्णं-रूप से स्थापित

टी है। मत्रियाँका चुनाव गवनेंर, पार्टी के नेता की राय से करगा ओर उनकी अवधि कानृूनन गबनर की झाच पर निभर है; किन्तु साधारणत: ल्लेजिस्लटिव