प्रकाशक--आगम अनुयोग प्रकाशन परिषद्‌ वसतावरपुरा, सांडेरावं [फालना-राजस्थान |

प्रथम संस्करण : वीर संवत्‌ २४६६ दीपमालिः

अक्बर १६७९ प्रतिय : एक हजार मूल्य पच्चीस रुपये

मुद्रण व्यवस्था-- | प्राप्ति स्थान श्रीचन्द सुराना सरसः | शा. हिम्मतमल हस्तीमलः संजय साहित्य संगम | ^/4 मश्कती माकंट दास विर्डिग नं. | अहमदावाद-र्‌ | "|

विलोचपुरा, आगरा-२ | मुदरक--श्यामयुन्दर शर्मा, भी प्रस, २६।१५४

राजामण्डी, आगंरा-२

शरमणसंस्कति सरल शान्त

-मजनानदी

दन्तं

वर" ° कतर्चनद् जी

प्रकाशकीय

स्वतन्त्र मारत की राजधानी देहली मे आगरम अनुयोग प्रकाने कीमोर से जनागमो का चकीन शली मे प्रकाशन प्रारम्भ किया गया इम कार्य मे सर्वप्रथम ई० सन्‌ १६६६ समवायाङ्घ का प्रकाशन क्रिया गया ! पद्चात्‌ स्यानाङ्घ सूत्र का प्रकाशन भी प्रारम्भ होग्या या] वियालीस फमं भी वहाँ छप- गये थे किन्तु कारणवक्ष मुद्रण कायं स्थगित करना पड़ा।

सन्‌ १६७१ मे पुने आगरा मे मुद्रण कायं प्रारम्भ किया गया।

रफ संशोधन एवं मुद्रण का सारा कार्यभार श्रीमान्‌ श्रीचन्दजी सुराना “सरस ने संभाल कर हमारे गृस्तर भार

को हलक्रा कर दिया अप्का यह्‌ सहयोग कभी मुलाया नही जा सक्ता !

समवायाङ्घ के समानं इम स्वानाद्खुसूत्रमे भी वित

विषय सूची, गुदर पूतपाठ शन्दानुलक्षो सरल, सरम, सक्षिप्त

हिन्दी अनुवादे भौर ज्ानवर्घक बोधपूर्णं विशिष्ट परिशिष्ट पृण

रत्न मूनि रौ कनदैयालालजी म० "कमल" की अनुपम कृपा सै

(६)

हमे ब्राप्त हए है अत हम सब गुरुदेव की ज्ञान साधना के प्रति श्द्धापूर्वक सदा नतमस्तक है

इस प्रकाशन के हतु स्थानीय दानवीर धमं प्रमी शा. देवी- चन्दजी रूपाजी ते २००१) ₹० कागज खरीदने के लिए प्रदान किए तथा श्री श्वे स्थानकवासी जेन श्रावकं संघ, फलिया कलां ने ५५०१) ₹० का महान्‌ योगदान मुद्रणकायं के लिए किया-इसके विए हम आप सवके आभारी है

मन्तरी- आगम अनुयोग प्रकाशन परिषद्‌ बखतावरपुरा, सडेराव

(शद

आगम अनुयोग प्रकाशन की ओर से स्थानाङ्घके प्रकाशन की योजना पर सवं प्रथम मूलपाठ संशोधन का संकत्य वना किन्तु कायं प्रारम्भ करतेहीकु्ं एसी समस्याये साममे आई-- जिनके कारण यथेष्ठ ˆ“ संज्ञोधन की सम्भावना धुमिल होती चली गई दुर्भाग्य से कायं- काल मे एक अप्रत्यारितत व्यवधान एना अनिष्टकर आयां कि जिमके कारण कायं सर्वथा स्थगित करना पडा सौभाग्य से देषकार्यं पूराकरते कै लिगु पुनः

सुभवसर प्राप्त हुभा ओर गुरुदेव की कृपा से कायं सम्पन्न भीहो गया)

भेरे संकंठपो के बनुरूप संपादन मे सौष्ठव नही गा पाया है--यह मै स्वय स्वीकार करता हूं--फिर भी स्वाध्याय प्रेमियो के लिए उपलब्ध अन्य संस्करणोंकी उपेक्षा प्रस्तुत संस्करण अधिक उपादेय सिद्ध होगा

स्मरणञक्ति की समृद्धि के लिए संशया प्रधान संकलनो की एक सुन्दर श्रृह्ुला जो चिरकाल से चली मरही, उसकौये दो अमर कडियां स्थानाद्घ मौर समवायाद्ध है समवायाद्‌ का प्रकाशन पाठ्कोके हाथो

(९)

मे पहले पर्व गया है गौर स्थानाद्ध का प्रकाशनं अवं परहैच रहा है

सम्पादन कराल मे प० रत्न मुनि श्री मिभ्रीमलजी ““मुमुल् का तथा सेवाभावी मुनि श्री बदिमलजी का समय-समय प्रर जो योगदान रहा है वह्‌ चिरस्मरणीय रहेगा श्री नवीन मूनिजी (गुजराती) तथा अन्तेवासी सुनि विनय ने सेवा मे सलग्न रहकर मेरी ध्‌ त-साधना को जो संबल प्रदान किया है वह्‌ सवेदा अविस्मरणीय

जिनके सामयिक सुफावो से इस कायं के सम्पन्न होने मे जो सरलता हई दै उन सिद्धहस्त लेखक एव अनेक ग्र्थो के सपादक “सरस जीकोभी मै अपना सहयोगी पाकर प्रसन्नता अनुभव कर रहा हं)

दीपमालिका -- मुनि कन्हैयालाल "कसल" वीर संवत्‌ २४६० वर्षवास-पफलिया कलां

प्रकक्ियत

स्थानाञ्ख-परिचय-

स्थाना मे स्यान भौर शद्धये दो शब्द द1 स्थान शव्द

“का मापान्प अर्थं "विश्रान्ति-स्यल'” होता है। अद्ध का मामान्य

अर्थं “एकं विभाग" होता है दस प्रकारे रथानाद्ध नाम निष्पन्न हज है}

टर म्थानाङ्ग के संकलनकर्ता श्री सुधर्मा गणवर एक-एक सख्या वाने पदार्थो का मेकलन जव परिपूर्णं कर तेते तोउम संकलन का नाम “एक स्थान” देते इमी प्रकार द्विमस्यक ्रिसस्यकः यावत्‌ दगमद्यक पदार्थो के सफलन का ब्रमणः द्स्थान विस्थान यावत्‌ दसस्थान नामदेतै

यह्‌ आगम इादसाद्धास्मक गणिपिटके का एक अद्भ-विभाग है। अतः दम अङ्ग का स्थाना" चाम यार्धंक है! यह्‌ स्थानाज्ग का शाब्दिक परिचेय है। अनरद् परिचेय शसं प्रकार ह-

स्थानाङ्ग दृत्तीय जद्घ भागम हं) इसके दस अव्ययन ह। हन देस अध्ययनो का एकं ही श्रृतस्वन्ध ह) द्वितीय, तीय

१९ एके देषत्तके की संख्यापि स्थान ही प्रवचन पुरुप के भवे बद्ध है, अत इस आगम का नाम स्थानाग हं)

{१० )

गौर चतुर्थं अध्ययन के चार-चार उरशक पचम अध्ययन के तीन उद्‌श्चक है। देष छ. अध्ययनो मे एक-एक उट शक इस प्रकार स्थानाङद्ध के इक्कीस उद शक है

वर्तमान मे उपलन्थ स्थानाग मे ७८३ मूल सूत्र मने गये हैर इन सूत्र मे से जिन-जिन सूत्रो के जितने-जितने अन्तरगत सूत्र माने गये है उनकी एकं विस्तृत सूची परिशिष्ट नम्बर र्‌ मेदीगर्ईहं। किस अनुयोग के वितने सूत्र है-इसकी पूरी जानकारी परिदिष्ट नम्बर मेदी गर्ईहं। सवसे अधिक सूत्र द्रव्यानूयोग के है गौर सवसे मल्पमूत्र कथानुयोग के स्थानाग ओर समवायागके कुछ एेसे सूत्र हैँ जिनका विषय समान हूं 1 पसे सूत्रो की एक तुलनात्मक सूची परिशिष्ट नम्बर मे दीगरईरं।

स्थानांग की विषय सृचियो का तुलनात्सक अध्ययन--

नन्दी सूत्र भौर समवायागमे वणित स्थानाग की विषय- सूचियो के देखने पर यह पता चलता हं कि नन्दीभूत्र मे कही गर स्थानाग की विषयसुची संक्षिप्त हं मौर समवायाग मे कही गर्ई विस्तृत्त हं समवायाग की जेक्षा नन्दीसूत्र अर्वाचीन (यह्‌ जैन साहित्य के एतिहासिक विद्रानो का अभिमत ह) अत्तः नन्दी- सूत्र मे कही गई स्थानांग की विषय सूची विस्तृत होनी चाहिए

आगमोदय समिति से प्रकाशित सटीक स्थानाग की प्रति के अनुसार ये सूत्राकं दिये गए हं

(^

थो, निन्तुएेसान होकर विपरीत हृभा हं 1 इस समस्या का समाधान कही भिल नही रहय हं 1 समवार्याग से स्थानांग को दिषय सृची-

१. स्वसिदान्त, पर-सिद्धान्त भौर स्वपर-सिद्धान्तो का सयुक्त कथन

२. जीव, अजीव ओौर जीवाजीव का संयुक्त कथन

३. लोक, अलोक ओौर लोकालोक का संयुक्त कथन

४. द्रव्य के गुण तथा विनिन्न क्षेवर-कालवर्ती पर्यायो का कथन

५. पवेत, पानी, समुद्र, चार प्रकार के देव, आकर, पुरुषौ के विभिन्न प्रकार, स्वर, गोत्र, नदियो, निषियो ओर ज्योत्तिपी देवो की विविध गत्तियो का वणन 1

६. एक प्रकार, दो प्रकार यावत्‌ दस्र प्रकार के लोकस्थं जीव ओर पुद्गलो का कथन 1

नन्दीसूत्र मे स्थार्नाग की विषय सृची--

प्रारम्भके तीन कोष्ठकोमे कह गए विपय यद्यपि यहं व्युत्क्रम से कहे गए है फिर भी समवा्यांग के समान

चौथे ओौर पचवे कोष्टक्‌ मे कहै गए विपय यहाँ अत्यन्त सषिप्त करके कहे गये है--यथा-टक, कूट शल, शिखरी प्राग्भार, गुफा, आकर, द्रह मौर नदियो का कथन हँ

छठे कोष्ठक मे के गये विषय समान इस संक्षप्ती- करण का हेतु कया है-यह्‌ ज्ञातव्य है

( १२९)

स्थानाग की पदसंख्या का हस-

समवायांग गौर नंदी सूत्र पे स्थानाग की पदसंख्या बहृत्तर हजार कही गई हं किन्तु वतंमान मे उपलब्ध स्थानांग मे वहत्तर हजार पद नही ह-एेमी मान्यता प्रचलितं है यद्यपि पद का परिमाण सूनिदिचत नही है फिर मी उपलन्व आचाराग से स्थानाग चौगुना नही ह-इसलिए संकलन काल मे जितने पद थे उतने पद वतंमान मे नही है-यह निदिचत हं

०५.

एक स्थान से लेकर दसव स्थान तक प्रत्येक स्थान के अन्तिम मूत्र की सकलन शली देखकर यह्‌ धारणा वनती है कि स्थानाङ्घ मे संकलन काल से लेकर अव तक किसी प्रकारका परिवतेन-नही हमा है पर यह धारणा अक्षगत है। अतः स्थानाद्ध के प्रत्येक स्थान कां अन्तिम भाग्यो का स्यो वना रहा" मौर पूवं मागमेसेपदोका हास हो गया“ एसा मान ले तो कोई असगति नही दिखाई देती

देविए--एक स्थान सूत्र ५६ हितीय स्थान सत्र १७- ११८ 1 तृतीय स्थान नूच २३३-२३४ 1 चतर्थंस्यान सत्र ३८७-३८८ पचम स्थान सूत्र ४७४ 1 .. पष्ठ स्थान सन्न ४० यप्तम स्थान मूत्र ५६२-५९३ 1 अष्टम स्थान सव्र &६० ।,.. नवम स्थान सूत्र ७०२-७०३ दसम स्थान मत ७८२

( १३)

स्थानाङ्घ की सुत्राङुः निर्धारण नीति--

आगमोदय समिति से प्रकाशित सटीक स्थानाद्धु की प्रतिमे जो सूत्राद्धु दिये है उनक्री विभाजकर रेखा जानने के लिये जो अब तक प्रयास कयि गए, वे सफल सिद्ध नही हृए है। ह्त्तीय तृतीय, चतुर्थं, सप्तम ओर नवम अध्ययन के अन्तिम दो-दो सूत्रो कीजो रचना श्ञंली है वही षष्ठ, अष्टम ओर दस्म अध्ययन के अन्तिम एक-एक सूत्र की है 1, इनके अतिरिक्त भी अनेक सूत्र एसे है जिनकी विमाजक रेखा का आधार अव तकं भनात है अततः सूत्राद्धः निर्धारण नीति निदिचत करके आगामी प्रकाशनोमे सूत्राङ्धः दिए जावे तो यह्‌ एक प्रशस्त प्रय्ास॒सिद होगा सूत्रों कौ सृष्टि का जज्ञात रहस्य--

१. सप्तम स्थान के सताङ्धु ५४३२ मे सात प्रकार का योनि संग्रह कहा गया ह, सौर अष्टम स्थान के सूत्राद्धुः ५६६ मे अष्ट प्रकार का योनि सग्रहुकहा गयां) इनदो सूत्रो की क्रिस व्येका से रचना की गई है-यह जात्तव्य है

द्वितीय स्थान प्रथम उदुशक मूव्राद्धुः थमे दो प्रकार कासमयकहागयाहै गौर इसी स्यान एवं उदकं के सूत्रा ७४मेदोप्रकार का काल कहा गथाहै। समय गौर काल पययिवाची ह-तोक्याये दोनो सूत्र केवल पर्याय भेद की मपेक्षा सेके गयेहैयाभौरभी कोई अपेक्ना इन सत्रोकी सृष्टि के पीछे सन्निहित ?

टरिप्पण एक के समान

( १४)

३. पंचम स्थान के सूत्राद्भ ४१० मे केवली के पाचि भनृत्तर कहै है गौर दस्म स्थानके सूतराद्धु ७६२३ मेकेवली के दस अनूकत्तर कहै गये है दस भनुत्तरो मे पांच अनृत्तरो का समावेश हो जाताह फिर भी पाच गौर दसकेदो भिन्न-भित्च जो सूत्र कहे गये हवे विवक्षा भेदया उपेक्षाभेदसेही कहै गए होभे ?

४. अष्टम स्थान के सूत्राक ६१३ मे आठ प्रकार के वृण वनस्पतिकायो का कथन हुं गौर दसम स्थान के सूत्राक ७७३ मे दस प्रकार के तृण वनस्पत्तिकायो का कथन हं } उपर के समान सूत्रद्रय कौ रचना का दहतु प्रकाश मे आना चाहिए

५. सृत्राक १६३, २८६, ४९०५ ओौर ६०० मे क्रमश" लोक- स्थिति के ३, ४, भौर प्रकार कहे गएर्हकिन्तु भौर प्रकार नहो कहे गए ॒है--एेसी स्थित्ति मे हमारे सामने दो विकल्प भतत है

पहला विकत्प--्पाच गौर सात प्रकार की लोक स्थिति के सूत्र वने ही नही होगे 1

दूसरा विकल्प--यदि बने थे तो विच्छिन्न हो गए होगे

फिर भी चार सूत्र क्रंस-किस गपेक्ासे कहे गए है यह तो मालुम होना ही चाहिए

६. सूत्राद्धुः २४४, ४३१ भौर ४८४मे क्रमञ्च' ४, मौर भेद तृण वनस्पत्तिकाय के कहै गए है एक-एक नाम बढाकिर तीन सूत्ोकी रचना करने का तात्ययं क्या ?--यह्‌ जिन्नासा हं

( १५)

इस प्रकार अनेक सूत समाधान के लिए प्रस्तुत कयि जा सक्ते है यहाँ केवल कु सूत्र उदाहरणाथं लिखे गए है स्थानाङ्ध मे इन सूत्रों को स्थान केसे मिला-

तृतीय स्थान-द्वितीय उट के अन्तिम दो मूत्र १६६ भौर १६७ दुख विषयक

प्रथम सूत्र मे दु.ख सम्वन्धी प्रश्नोत्तर है।

दवितीय सूत्र मे अन्यततीधियो की मान्यता हं 1

दोनो सृत्रोमे कही सख्या का निदश्च नही है फिर भो गणना प्रधान स्थानांग में ये सूत्र है....यह्‌ विचारणीय प्रकन

तृतीय स्थान के तृतीय उह शक के अन्तिम सूत्र १६० में इग्यारह्‌ प्रश्नोत्तरो मे श्रमण को प्रयु पासना का फल कहा गया है तीन कौ सस्या का कही उल्लेख नही है फिर भी तृतीय स्थाने मे इस सूत्र का संकलन किया गया है

नन्दीरवर द्वीप वणेन बौर भ० विमलवाहन का वर्णेन मादि के कुंच सूत्र ठेस हँ जो स्थानाङ्ग की संकलन केली से मेल नही सतति है यद्यपि ये सूत्र टीकाकार के सामने भीये। किन्तु वे स्वयं इस सम्बन्ध मे किसी निर्णय पर नही पहुचे है 11

सत्सम्प्रदायहीने्वात्‌, सदूहस्य वियोगतः। सवं स्वपर शस्त्राणामहृष्टेरस्मृतेश्व मे ।\१॥ वाचनानामनेकत्वात्‌, धस्तकानामशुद्धिते. सूत्राणामत्ति गाम्भीर्याद्‌, मतभेदाच्च कुतचित्‌ ।२॥ --स्थानाङ्खव ति प्रशस्ति

( १६)

क्या यह्‌ कम भंग नहीं ?

सूत्राद्धः २६२ मे मान, माया ओौर लोमक चार प्रकार कह गये है भौर सूत्राद्ुः ३११ मे चार प्रकारका क्रोध कहागयादै। सूत्रा ३८५ मे भी चार प्रकार के कपायक्है गये हँ चार कषायो के क्रम के अनुसार सर्वप्रथम क्रोध प्र्चात्‌ मान माया ओर लोभ का कथन होना चाहिए किन्तु सत्तरह्‌ सूत्र के प्रचात्‌ क्रोध सूत्र का सकलन क्रम भंग नही है क्या ? अन्यथा प्रस्तुत संकलन क्रम की संगति सिद्ध केरला चाहिये प्राचीन काल के गणित प्रयोग

१. “सय” (शत-१००) के स्थान मे “दम दमाई" का प्रयोग है 11

२. “एग सहस्स"" (एक सहस्र १०००} के स्थान मे “दम सयाद” का प्रयोग है

३. “एग लक" (एक लक्ष १०००००} के स्थान मे “दस सय सहस्साई“ का प्रयोग

४, तीन कौ सख्या के लिए ““छच्च अद्ध" का प्रयोग है ।२

५. नो से अधिक को अर्यात्‌ ६1 या ६।कोनोमेहौ गिन लिया है क्योकि इनमे काही उच्चारण है)

दसवें स्थानमे दस की सख्या वलि पदार्थोका ही कथन होता है अत्त. सौ हजार भौर एक लाश को उक्त सख्याभो मे यहाक्दागयादहै।

देखिये पूत्राद्धः ४६३, ६६६, ७१६ गौर ७३५।

( -१७ }

क्लिष्ट कल्पता

जम्बुद्वीप के मरत ओौर एेरवत वपं मे अतीत उत्सपिणी के सुषम-सुपमा कालवतीं मनुष्यो की उक्छृष्ट आगु तीन पत्योपम कालकाथा यह्‌ कथन सूवाङ्धु ४६३ है--य्ह विचारणीय यह्‌ है किं तीन पट्योपमर कालको “"छच्च अद्ध पलिओवमाद परमां पालदत्ता" इन न्दो मे सकलित्त करके छठे ठणे मे कहा

तीन पल्योपम कालके अयुकोदुका आधा कहूकर छे ठाणे मे कहना भूव संकलन काल कौ प्रचनित पद्धति के बनुसार उपयुक्त माना जा सक्ता हं किन्तु आधुनिक पाटक्‌ इय प्रकार के संकलन को विकतष्ट कल्पनाकी संज्ञाही देते है

वाचना भेद या विवक्षा भेद

सूचाद्कुश्श्मे प्रकार के ऋद्धि प्राप्त मनुष्य ओर प्रकार के अनऋृद्धि प्राप्त (ऋद्धि रहित) मनुष्य कहे गये है। प्रज्ञापना प्रथम पदके सूत्र ६५ मे भी दधि प्राप्त मनुष्य छः प्रकारके हौ कहै गये है किन्तु अनकऋदधि प्राप्त (रिद्ध रहित) मनृष्य & प्रकारके कहे गये है!

स्थानायमे कथित छः प्रकार के रिद्धि रहित मनुष्यो से भज्ञापना मे कत्रि रिद्धि रिव मनूष्य सर्वंथा भिन्न स्था्नाग मे उक्त छ. प्रकार के रिद्धिरहित नप्यं अकमं भूमिक जव कि भ्रनापना मे उवत रिद्धि रहित मनुष्य कमं भूमिक है ! इस

( १८)

प्रकार के अनेक विवक्षा मेद जिनका स्वतन्त्र चिन्तन होना आवश्यक है

लौकिक सूत्र

स्थानागमे कु सूत्रे है जिन्हे लौकिक सूत्र कहे तो कोई असंगति दिखाई नही देती, क्योक्रि इन सूत्र से केवल लौकिक ज्ञान की वृद्धि होती हं साधक जीवन मे लौकिक ज्ञान भी यदा कदा लोकोत्तर ज्ञान का पूरक होत्ता हे लौकिक ज्लान- शून्य साधक लोकोत्तर साधना मे सहज सफलता प्राप्त नही कर पाता। लौकिक ग्रन्थो मे स्थानागके लौकिकं कटे जाने वाते सूत्रौ का आधार स्थल शोधने का कायं भी महत्वपुणं हं

यहा कुच सूतो के सूत्राद्ध गौर विषय दथ जारे है जिन्हे

देखकर पाठक यह्‌ तमञ्च सके कि ये सूत्र लौकिक ज्ञान की वृद्धि के लिये सकलित क्वि गये है।

सुत्राङुः विषय निर्देश २०६ तीन पितरु मन्ध भौर तीन मातर अद्ध)! ३४२-(१) चार प्रकार की ग्याधिया |

(२) चार प्रकार की चिकित्सा

३४४-- चार प्रकार के चिकित्सक

३७४-- चार प्रकार के वाद्य, नास्य, गेय, मात्य, मलकार भौर अभिनय

३७६-- चार प्रकार के उदकगमं ॥'

२७७-- चार प्रकार के मानुषी गरं

{ १६)

३७६-- चार प्रकार के काव्य} ४१९- ({) मभ रहने केर्पाच कारन

(२) गभंन रहने के पाच वरण) ४४८- पाच प्रकारकी निवि ४८४९-- पाच प्रकार के शोच ५३३-(१) प्रकार का मोजन परिणाम)

(२) दछप्रकारका विप परिणाम)

५५१-- सान प्रकारके सोत्र ५६१-- आयुक्षय के सात कारण ६११-- जठ प्रकार के आयुर्वेद ९६५ रोगोत्पत्तिकेनो कारण)

इनके अतिरिक्त गौर भी अनेक सूत्र इस सूची मे सम्मिलित करने योग्य किन्तु विस्तार भय से वहा अंकित नही कयि रये है लोकोत्तर साधनामे इन मूत्रो की उपादेयता सिद्ध करना वहुश्रतो कायं हं स्थानाङ्गं की विपय सूचियो मे इन लौकिक सूत्रो का उल्लेख नही है, अतः ये सव प्रक्षिप्त है--यह्‌ भाधुनिर विद्धानो का मत है!

हमारे वहुशर.तं इन सूतो को पर-सिद्धात के सूत्र मानते दहै किन्तुये पर दरनकेसूत्रनदीदहै) उक्त सूत्रो मे आयुवेद से सवयित सूत्र हो अविक है--इसलिये इन सूरो से लौकिक ज्ञानं कीवृद्धिहीहोतीदहै।

( २० ) शर. पुरुष में स्थानांग का स्थान

धरत पुरूष को कल्पना किस कल्पनाशील महेपुरुष के मस्तिष्क की उपज है भौर उम महापुरुष का कौन-सा युग है ? इस विपय की तथ्थपुणं जानकारी प्राप्त करने के सावत सुलभ नही है अत निश्चित कु नही लिखा जा सकता, किन्तु यह्‌ मुनिन्चितत है कि यह कल्पना भागम मंकलन काल की नही दहै

जागम काल की कत्पनायें केवलं दो है। पहली प्रवचन माता की कल्पना मौर दूमरी गणिपिटक की कल्पना समवा- याद्ध मगवती सृत्र आदि आगमो मे दोनो कत्पनाओ का उत्लेल है 1

श्रत पुर्प गौर धरत देवता की कल्पना अआगमोत्तर काल

कै ग्रन्थो मे इसी प्रकार लोक पुरुष की कल्पना भी ग्रन्थो मे ही दै।

श्रत पुरुष की वाम भौर दक्षिण पिण्डलियो मे स्थानाद्ध मौर समवायाद्धका स्थान है इसविये ये दोनो आगम स्तम्भ

के समान सुहढ एवं महत्वपुणं हे

अंगं आगम सकलना काल)

(क) समवा्यांग का वा समवाय (ख) भगवत्ती शतक उ०४। (ग) भगवत्ती गतक २५८० ३।

( २१)

स्भाताग का अध्ययन काल

दीक्षा पर्यायके आघ वषं मे स्यनाद्ध को वाचनादी जानी चाहिये यह्‌ पूर्वाचिार्यो की मन्यत्ता है 1 यदि आवे वर्षसे पर्वं कोई वाचना दे तो उसे आज्ञा भद्खादि दोष लगते है

स्थानाद्घ गौर समवायाङ्खके जाता कोही बाचायं उषा- ध्याय भौर गणाचच्छेदके का पददेनै का विधान है अतः प्रव्येकं सयमी को इन अंगो का स्वाध्याय करना चाहिए ।२

कमिक विकास

१. सूत्राक ध्८्मे साताविदनीय गौर असातावेदनीय कै सात-सात्त अनुभाव कहे है किन्तु प्रज्ञापना पद २३ उ० सूत्राद्ु ६०४ मे सातावेदनीय मौर असातावैदनीय के आठ-जाट अनुभाव कदे

धनिक विद्धान्‌ इस प्रकारके कथनो को चिन्तन का कमिक विकाश मानते है छिन्तु कायिक युख भौर कायिक दुख को छोड कर स्थानाग मे सात्त-सात अनुभाव कहने का ताय क्या है ? यह्‌ जिज्ञासा वनी हुई है स्थानाग के सकलन कर्ता ने किसी विशेष अपेक्षा को लेकर ही सात-सात अनुमाव कहे

ठणं-समवाओऽवि अगे ते भदृठ्वासस्स--अन्यथादाने शस्याज्ञाभद्खादयो दोषा--स्थानाङ्खं टीका

ठउण-समकायधरे कप्पद्‌ आयरित्ताषए उवञ्फायत्तापं गणावच्छेदयत्ताए उद्िमित्तए-व्यवहारसूत्र उ० सूत्र ६०

(२२)

भरजञापना ने उक्त कायिक सुख ओौर दख का अनुभाव तो स्थानाग के सकलन कर्ता गणधर भगवान को ज्नततोथाही, फिर भी जठ अनुमाव कहकर सात अनृभाव ही कहैहै तो किसी विकशेप अवेक्षा को लेकर ही कहै है--एेसा मानना चाहिए 1

२. सूत्राक ६४्८मे ईपत्‌ प्राग्भारा पृथ्वीके णनामहै ओर उववाई तथा प्रज्ञापना पद-रमे १२नामहि। इस सम्बन्धमे विचारणीय यह है किं स्थानाग मे दस स्थान है इसलिये १२ नामो मेभे १० नाम दसवें स्थानमेक्हजा सकते थे, किन्तु ठवे स्थानमे आरनामोकाटो कथन दहै, अत वाचनाभेदमे वारह्‌ नाम भौर आठ नाम कटे गये है--यही मानना चाहिये उपसंहार

` स्थानाद्ध एक वृहद्‌ अङ्ग भागम है इसकी विशालता के अनुरूप अनेक विषय अचचित रह्‌ गये इसका एक मत्र कारण है समय भौर साधनो का अभावे। आगम अनुयोग

प्रकादान के कायकत चिरप्रतीक्षित स्थानाद्घ्‌ के प्रकादन को ओर अधिक दिनो तके स्थगित रखना भी नही चाहते ह, अतः दरस समय इतना ही लिखना पर्याप्त है -- मुनि कन्ह॑यालाल “कमल

स्थानांग सूत्र ` विषय सुची

--एक स्थान-(पहला ठाणा) सूरत्राक विषय

१. उत्थानिका २. आत्मा २३. दण्ड

४, क्रिया ५, लोक ६. अलोक ७. धर्मास्तिकाय ८, जवर्मास्तिकाय ६. यन्य

१०. मोक्ष

११. पुण्य

१२. पाप

१३. आधव

१४. भवर्‌

१५. वेदनां

१६. निर्यरा

\ विषय भूचरी

१७. प्रत्येक शरोरी जीव

१८. भव-घारणीय विकुवंणा

१६-मन, २० वचन, २१कायाका व्यापार

२२. उत्पाद

२३. विगति (विना)

२४. मृत शरीर

२५. गति

२६. आगति

२७ च्यवन

२८. उपपात

२६. तकं

३०. सन्ना

३१. मति

३२. विज्ञान

३३. वेदन

३४. छेदन

३५. भेदन

३६. अन्तिम शरीरी का मरण

३७. यथाभूतं शुद्ध पात्र

३८. अन्त्थदु.ख, आत्मरूप स्वभाव

३६. अधर्म प्रतिमा (प्रतिन्ना)

४०. धमं प्रतिमा ( „, )

४१. एक समयमेएक ही गुम या अञुभ मन, वचन ओौर काया का व्यापार

विषयं शूची

४२. एक समयमे एक हौ उत्यनि-कर्म-वत्तनीरयं पुरपाकार- पराक्रम

३. जानि, दसन, चारि

४४. ममय

४५. प्रदेण, परमाणु

४६. सिद्धि, सिदध, निर्वाण, निवृत्त

४७, दाव्द, स्प, सेस्वान, वर्ण, गन्य, रम, स्पगं

४५, प्राणातिपात-याकत्‌ मिथ्यादगंन्ल्य

४६. प्रणातिषातविरमण-यावत्‌ परिरं विरमण क्रोध विवेक-यादत्‌ भिध्यादर्गन विवेक

५९ अवसपरिणी-उत्सपिषी

५१. नारकादि दण्डक व्गेणा मन्य अभव्य की वर्गणा सम्यष्हष्टि यावन्‌-नम्यरूमिथ्यारृप्टि की वर्मणा करप्मपक्षो-युतपक्षी की वर्गणा नेञ्या वर्गणा यने्य भव्य अमन्य जीव वर्मा मेष्य सम्यद्ष्टि आदि जीवो वर्मणा तीसिद-यावत्‌-अनेक तिदो की वर्गणा, परयम सिद्ध-यवित्‌-जनन्त समय सिद्धो कौ वगणा, परमाघु-यवित्‌-अनन्त परदेशी स्कंघो कौ वगणा,

एः प्रदरा ॥।

परर्यावगाहदृ-पावन्‌-अनन्येव प्रदेावगाट पुदगनो गो वमेणा।

विवध सूषौ

एक समय की स्थिति वलि-यावत्‌-असख्य समय की स्थिति वाले-धुद्गलो की वर्गणा, एक गुण काले-यावत्‌-अनन्त गुण रक्ष पुद्गलो की वर्गणा, जघन्य आदि प्रदेशस्थित पुद्गल स्कथो कौ वर्गणा, जघन्य आदि अवगाहना वाले पुद्गल स्कधो की वगणा, जघन्य आदि स्थिति वाले पुद्गल स्कधो की वगणा, जघन्य आदि गुण काले-यावत्‌ अजघन्योक्कृष्ट गुण रक्ष पुद्गल-स्कधो कौ वर्गणा

५२९. जम्बद्रीप की परिवि,

५३. भगवान महावीरं का एकाकी निर्वाण,

५४. अनुत्तरोपपातिक देवो के गरीर की ऊचाई,

५५. आद्र, चित्रा, भौर स्वाति नक्षत्र के तारे,

५६. एक प्रदेशावगाढ पृद्गलः, एके समय स्थिति वाले पुद्गल, एक गुण कले-पावेत्‌-एक गण रक्ष पुद्गल

द्विस्थान (इसरा ठाणा) प्रयम्‌ उद्‌ शक सुत्राक विषय

५७. लोक मे सभी पदार्थो का द्र॑विव्य, जीव की विगिच्दो दो चिवक्षाएु,

५८. अजीव की विभिच्रदोदो विवक्षाएु

विषय सूची

५६. तत्वयुगल; बन्धे गीर मोक्ष, पुष्य जौर पाप, आश्रव जौर सवर, वेदना भौर निर्जरा,

६०. क्रियाय का विष्य,

६१. गर्ह के दो मेद्‌,

६२ प्रत्याख्यान के दो भेद,

६३ मोक्षके दो सायन,

६४, केवलि-पररूपित्त धमं का चवण, वोधप्रान्ति, अनगार दशा, ब्रह्मचयं पालन, शुद्ध सयम पालन, भाठम संवरण गौर मत्ति श्रत आदि पाच ज्ञाने की प्राप्ति दोस्था्नोके जाने बिना यात्यामे विनानही होती।

६५. केवलि प्ररूपित धर्म का श्रवण, वोधघ्राप्ति, अनगारदशा, ब्रह्मचयं पालन, चुद्ध सयम-पालन आत्ससंवरणं गौर मति- श्रूतत जादि पाच ज्ञान की प्राप्ति दो स्थानो के जानने भौर त्यागनसेही हेती है।

६६. केवलि प्रूपित धमे का श्रवण, बोघ प्राप्ति, अनगार, ब्रह्म चयं पालन, जुदध-सयम पालन, आमसंबरण, ओर मत्ति- शत भादि पाच ज्ञान की प्रास्तिदो स्थानौके आराधने ही द्येती दै।

६७. दौ प्रकार का समा (तमय),

९० दो रकार का एन्माद

विषय सूची

६६. दो प्रकार का दण्ड (चौबीस दण्डक मे दण्ड),

७०, दरशन के दो-दो भेद,

७१. ज्ञान के दो-दो भेद,

७२. चरित्रं के दो-दो भेद,

७३. पृथ्वीकाय-यावत्‌~वनस्पतिकाय के दो-दो भेद, दो-दो प्रकारके द्रव्य,

७४, दो प्रकार का काल, दो प्रकारका काञ्च)

७५, चौवीस दण्डकेमे दो प्रकारके शरीर की प्ररपणा, शारीर की उत्पत्ति केदोहैतु, शरीर की निवृत्तिके दोहेतु,

७६. पूर्वं ओौर उत्तर दन दो दिशाभो मे मुख करकेकरने योग्य कायं 1

द्वितीय उद शक

७७, चौचीस दण्डकवर्ती जीवो का वत्तंमान भवमे भौर अन्य भव मे कमं कौ बन्धन ओौर कर्म फन का वेदन, ७८६. चौ्रीस दण्डकवर्ती जीवो कौ गति भौर आगति ७६. चौवीस दण्डकवर्ती जीवो कौ भिन्न-भिन्न दो दो विवक्षाए, ८०. अधोलोक, मघ्यलोक आौर उध्वंलोक को जानने केदोदो स्थान, शब्दादि को श्रहुण करने के दो स्थान, इसी प्रकार प्रकशि, विकर्णा, परिचार विषय सेवन।

विषय सुची 9

भाषा, आहार, परिणमन, वेदन शौर -निजंरा करते के दो-दो स्थान, मरत प्रमुखं देवोके दो प्रकारके शरीर,

तृतीय उह शक

८१. दो-दो प्रकार के शव्द गौर शब्द की उत्पत्ति,

८२, पुद्गलो का सम्मीलनं, भेदन, परिशाटन,पतन भौर चिध्वंस- स्वयं ओर परकृत, दो-दो प्रकार के पुद्गल,

८२. इसी प्रकार दोदो त्रेकार कै रब्द, खूप, रस, गंध गौर स्पर्श,

०८४. दो-दो प्रकार के आचार,

दोदो प्रकार की प्रतिमा तप! दो प्रकार की सामायिक

८५. देव ओर नारक इन दो के जन्म की उपपात सज्ञा है

नारक गौर भवनवासी देव इन दो के मरण की उद्रत्तंन संनाह,

ज्योतिषी ओर वमानिक इन दो के मरण की च्यवन संज्ञा है, मनुष्य ओर तियेञ्व पचेन््रिय इनदो के जन्म की गभं व्युक्तान्ति सन्नाह)

गर्भावस्था मे आहार वद्धि, हानि, विकरर्वंणा, सति परिवतेन, समुदधातकाल भरमान,जनम मरणं आदि भिन्च-मित्त परिणतिया,

विषय सूची

मनुष्य मौर तियंञ्च की शुक्र एवं शोणित से उत्पत्ति, दो प्रकार की स्थिति

दो प्रकारका आयु

दो प्रकारके कर्म

निरुपक्रम-पूर्णायु भोगने वलि

सोपक्रम-संक्षिप्तायु भोगने वाले

८६. आयम-विष्कम्भ, सस्थान, परिधि आदि से तुल्य दो-दो क्षेत्रो के नाम, # उन क्षेत्रो मे आयाम, विष्कम्भादि से तुल्य दो-दो वृक्ष गौर उन वृक्नो पर रहते वले दो-दो देव 1

८७, इसी तरह्‌ आयाम, विष्कम्भ भादि से तुह्य पर्व॑त उन पर रहने वाले देव, वक्षस्कार पव॑त, दोधं वैताल्य, दीघं वैताद्य की गुफा, गुफावासी देव, उनकी स्थिति, चुल्ल हिमवान आदिकूट

८८, द्रहु, व्रहुवासीदेविर्या, महानदिर्या, प्रपातद्रहु ओौर महानदिर्णं

८६. उर््सापिणी काल के सुषमदुषम नामक चौथे आरे का कल प्रमाण, सूषम नामक मारे मे मनुष्यो की चाई भौर आयुष्य, भरत नौर एेरवत क्षेत्नमे एक युग मे, एक मय मे उतपन्न होने वाले दो-दो अरिहन्तव श, चक्रवर्तविक्च गौर वासुदेववंश, सदा सुषमसुषमकान् वत्‌ रिद्धि बलि दो क्षेत्र, सदा सुषमकालवत्‌ रिद्धि वाले दोक्षत्र, सदा सुषमदुषम कालवत्‌ रिद्धि वले दो शोत,

विषय सूची

सदा दुपमसुषम कालवत्‌ रिद्धि वले दो क्षेत्र ` छह प्रकार कै काल प्रभाव वलि दो क्षेत्र

६०, जग्दूटीप मे चन्द, सूर्य, कृतिका, यावत्‌-भावकेतु, ८८ श्रहु, ९१ अम्बृद्रीप की वैदिकी की ऊंचाई, लवण संमुद्रकी वेदिका की ऊचाई।

६२. धात्तकीखण्ड पूर्वां गौर परिवप्यं मे दो भरत, दौ एेरवतत आदि दो-दो क्षे त्र, वृर वृक्षवासीदेव, वर्षधर पवत, वृत्त वंताठ्य पव॑त, पव तवामीदेव, वक्षस्कार पर्वत, वर्प॑वर पवेतक्ुट, पवंत-हद, हृदवासी देविर्याक्षेत्रगतदद,महानदिर्या, अन्तरनदिर्या, चक्रवर्ती विजय, चिजयराजधानिर्था, वनक्षण्ड, शिल, मेरु, मेरुचूलिका आदि धातकीखण्ड कौ वेदिका की ऊचाई।

६३. कालोद समुद्र की वेदिका की ऊ्वाई, पष्करार्धद्य मे क्षेत्रादि के द्विक का वणेन, पुप्कर द्वीप की वेदिकाकी ऊंचाई, समस्त द्वीप एवं समुद्रो को वेदिका की चाई

९४. चमरेन्द्र ओर वलीन्द्र आदि सवं स्थानो के इन्दर युगल, महाशुक्र मौर सहार देवलोक फे विमानो के वणं, प्र देयक् देवो के गरीर की ऊन्वारई !

चतुथं उह्‌ शक

€4. घमय, आवलिका से लेकर उत्स्पिणी-अव्षपिणौ पर्यन्त

शरम) तगर से लेकर राजधानी पर्यन्त ओौर छाया से लेकर

१०

६६.

६७.

१०९१.

१०२.

१०३

१८४.

१०५.

१०६.

विषय सूची

ण्॑प्रपातपर्यन्त सवक्रां अयेक्नात जीव-अजीवत्व, दो रा्चि।

दो वन्ध,

दो स्थानो से पापक्मोँं का वन्य

दो प्रकारकौ वेदनासे जीवद्वारा पाप कर्मकी उदीर्णा, दो प्रकारकी वेदना का केदन

दो प्रकार की निजंरा

आत्मा ओौर शरीर के पृथक्रहोते समथ दो प्रकार से दरीर का स्पगं

केवलि प्ररूगित धर्म का श्रवण-यावत्‌-मन पर्याय ज्ञान की

प्राप्तिमे दो अन्तरण निमित्त

- दो प्रकार का मौपमिक काल . क्रोव-यावत्‌-मिथ्याद्गन शत्य दो प्रकार का,

चौवीस दण्डक मे दोनो प्रकार का क्रोष-यावत्‌-मिथ्याद्ंन ल्य

दो प्रकार के नसारी जीव

भगवान के हारा अनूजात ओौर भननुज्ञात दो-दो मरण जीव भौर अजीवमय लोक.

दोप्रकारकी वोधि, भौरदो प्रकारके बुद्ध,

दो प्रकार का मोह, गौर दो प्रकारके परढ।

जानावबन्ण आदि आसो कर्मो का द्रं विध्य,

दो प्रकार कौ मूर्खा

विषय मुचो +

१०९. दरो प्रकार की नारधना) १०८. तों कर युगलो कै वर्णं } १०६. मलत्यपघवाद पूवं फीदो वन्तु! ११०. पूरवेमाद्रद, उत्तरमाद्रषद, पूर्वफ्णुनी नौर्‌ उत्तसफात्गृनो एन नक्षप्रो कैः तरि। ११९१. मनृप्यक्षेवमेदोममृद्र) १६२ सानवी नरक मे जाने यानि दो नव्रवर्ता। ११३. धमुरद्रयर््प भवनवा देयो फो स्वित्ति-परावन्‌ महेन कदम मेदेषो की जघन्य दधति) ११४. दो देवलो मे द्विर्ा ११५. दो करत्पो मे तैजेनध्या चनि देव ११६. दो-दो देवलोको मे दो-दो प्रफ़ार की प्रिचारणा। ११७. पाष कर्मं के पुदूमलो को पनग्रित्त करने, धते, उदीरणा करने, वेदने भौर निर्जरा करने याने दौ काय ११८. धनन्तदिप्रदेशी स्वन्ध, अनन्त {ि प्रदेधावगाढ पुद्गल-यात्रत्‌-मनन्त दविगुण्क्ष पुद्गल . नि स्यान (तीसरा ठणा) प्रथम उदु शक

११६. रीन प्रकार के एन्द्र १२० तीन परकरि की विक्रुवणा १२१. तीन प्रकार के चौवीस्‌ रण्डक्‌ फे जीवं

१२ विषय सूची

१२२. तीन प्रकार की परिचारणा। १२३. तीन प्रकार का मेथुन, मेथुन सेवन करने वाले के तीन मेद

१२४. चौवीस दण्डक मे तीन योग, तीन प्रयोग बौर तीन करण

१२५. मत्पायु, दीर्घायु, अशम दीर्घायु ओर चुम दीर्घायु के तीन- तीन कारण।

१२६. चौबीस देण्डक मे गुप्ति, अगुष्ति ओौर दण्ड

१२७ गर्हा ओर प्रत्याख्यान के तीन-तीन मेद

१२८. वृक्ष के तीन भेद ओौर उनके समान ही पुरुष के तीन भेद, तीन प्रकार के पुरूष

१२६ तीन प्रकार के मत्स्य, तीन प्रकार के पक्षी, तीन प्रकार के उरपरिसरप, भजपरिसरपं 1

१३०. तीन प्रकार के स्त्री-पुरुष-नपुंसक

१३१. तीन प्रकार कै तियं

१३२ चौवीस दण्डक मे तीन लेद्या वाले जीवर

१२३३ ताराच्रलन, विधत्कार ओर स्तनित्तगन्द के तीन तीन कारण

१३४. लोक मे अन्धकार भौर उद्योत के तीन-तीन कारण, देवविमान मे उद्योत गौर अन्धकार के तीन-तोन वारण, देवभागमन के तीन कारण, देवेन्रादि के मनुष्य लोक मे आगमन, उनका उभ्युत्थान,

विषय सूची १३

चैत्यवृक्ष चलन तथा लोकान्तिकं देवो के आगमन के तीन- तीन कारण

१३१५. मात्ता-पिता स्वामी भौर वर्माचायं इन तीन के ऋण से उकण होना दुष्कर है)

१३६. तीन कारणो से मोक्ष)

१३७. तीन प्रकार की अवस्पिणी-उल्छपिणी

१३५. तीन प्रकार के पुद्गल चलन्‌ ! चवीस दण्डक मे उपधि मौर परिग्रह्‌)

१३६. चौबीस दण्डक मे प्रणिधान

१४०. चौवीस दन्डको मे योतियो का त्रैविध्य 1

१४१. वनस्पति के तीन प्रकार 1

१४२. जम्बूदरीप के भरत जौर एरवेत क्षत्र के तीन-तीनं तीर्थ, इसी प्रकार वातकी खण्ड जादि के तीन-तीन अथं!

१४३. सुषमा नामक भारा तीन क्रोडा क्रोडी सागरोपम का; सुषमसुषमा काल मे मनुष्यो की ऊंचाई तथा बधु, अस्त, चक्रवर्ती गौर वासुदेव ङ्प तीन वनन की उत्पति,

दन्त, चकव्ती गौर वलदेव वामुदेवे का निस्यक्रम भयु तथा मध्यम जायु

१४४. बादर तेजस्काय की तीन अहोरात्र की उच्छृष्ट स्थिति, वादर वायुकाय की तीन हजार वपं की उक्छ्रट स्थिति ,

१४५. तीन वपं की उक्करृष्ट स्थिति वाले घान्य 1

१५ क्षयं दुवी

१४९ शकरा प्रचा मे तीन सागरोपम की उत्कृष्ट स्थिति, वालुका प्रभा मे तीन सागरोपम की जघन्य स्थिति

१४७. धूम प्रभा मे तीन लाख नरकावास, उप्ण वेदना वाले तीन नरकं

१४८. विव मे समान आयाम-विष्कम्भ वाले तीन-तीन स्थान १४६. उदकरस वाले तीन समुद्र, वहुकच्छ मरस्ययुवत तीन समुद्र १५०. नरक ओर स्वगं मे जाने वाले राजा आदि | १५१. ब्रह्मलोक के विमानो के तीन वणं, अनन्त आदि कत्पमे देवौ की भवधारणीय अवगाहूना उक्छृष्ट तीन हाथ १५२. तीन कालिक प्रज्नप्तिर्यां

द्वितीय उह शक

१५३. लोक के तीन-तीन प्रकार

१५४. असुरेन्द्र आदि की तीन-तीन प्रकार की परिषद

१५५. तीन प्रकार के याम, तीन प्रकारक वय

१५६. बोधि ओौर बुद्ध के तीन भेद मोह गौर मूढ के तीन-तीन भेद 1

१५७. प्रव्रज्यां के तीन-तीन भेद

१५८. तीन निग्रन्य नोसन्नोपयुक्त ओर तीन निग्र्थ संतता नोसन्नोपयुक्त

१६ १७१.

१७२.

१७३.

१७४. १७१५.

१७६. १७७.

१७८.

१७६.

१८०५.

१८१.

विषय सूची

वस्व धारण कै तीन कारण | आत्म रक्षा के तीन हेतु, ग्लान निग्रस्थ'के लिए कत्पनीय तीन विकट दत्त

साधु के साथ सम्बन्य-विच्छेद के तीन कारण तीन प्रकार की अनुज्ञा, समनुज्ञादि

तीन प्रकार के वचन ओर अवचन

तीन प्रकार के मन ओर अमन!

अस्पवृष्टि ओर महावृष्टि के तीन-तीन कारण इच्छा होने पर भीदेवके मनुष्यलोक मे नही सकने ओर सकने के तीन-तीन कारण |

देव की स्पृहा के तीन स्थानः

देव परिताप के तीन स्थान

देव च्यवन के तीन लक्षण,

देव उद्रग के तीन कारण

विमानो के तीन प्रकार के संस्थान

विमानो के तीन अवार ओर तीन भेद

नारक के तीन भेद

तीन मुगति, तीन दुर्गति

तीन सुगति प्राप्त भौर तीन दुर्गति प्राप्त

. उपवास करने वाले भिक्ष्‌, के लिये कल्पनीय तीन प्रकार के

जन बेला (पष्ठमक्ते) करने वाले भिक्षू के लिये कल्पनीय

विषय सूची {७

१८३. १८४.

१८४ १८६.

१८७.

१५८.

तीन प्रकार के जल,

अष्ट्मभक्त करने वाले के लिए कल्पनीय तीन प्रकार के जल,

तीन प्रकार की उनोदरी, निग्रन्थो के मदिति ओर हित के तीन स्थन,

तीन प्रकार के शत्य,

तेजोलेश्या के तीन हेतु

ज॑मासिक भिभुप्रत्तिमा प्रतिपन्न को कट्पनीय तीन दत्ति

एक रात्रि की प्रतिमा कौ सम्यक्‌ पालन करने से होने वाले तीन शुम फल ओर सम्यक्‌ पालन करने से होने वाले तीन अशुभ फल

तीन-तीन कममूमिर्यां (जम्बुद्वीप मे) तीन ददन,

तीन रचिर्या,

तीन प्रयोग

. तीन व्यवसाय

तीने प्रकार के पुद्गल,

नरकं कै तीन आधारं (नयविचार)

तीन प्रकार के मिथ्यात्व,

यक्गिया मिध्यात्व, अविनय भौर जज्ञान कै तीन-तीन भद

धर्म, उपक्रम, वैयावृत्य, जनृप्रह्‌, बनुलिष्टि भौर उपलिम्भ के तीन-त्ीन भेद

१८ विषय शूचो

१८६. कथा कै तीन भेद, विनिदचय के तीन मेद

१६०. पयुपासना मादि की फलपरम्परा के सम्बन्ध मे प्रश्नोत्तर चतुर्थं उद्‌ शक

१६१. प्रतिमा-परतिपन्न अनशर के कल्पनीय त्तौन उपाश्रय ओर तीन संस्तारके 1

१६२. काल समयादि का तरं विध्य

१६३. तीन प्रकार के वचन

१६४. तीन प्रकार की प्रज्ञापना, तीन प्रकार का सम्यत्व, तीन उपधान जौर्‌ तीन विशुद्धिं

१६५. आराधना, संक्लेशच, गसंक्लेश, अतिक्रम-व्यतिक्रम, अतिचार अनाचार के तीन-तीन मेद, ज्ञान दशन, चारित्र रूप अतिक्रमादि का प्रतिक्रमण

१६६. प्रायर्चित्त का रतरविध्य )

१६७. जम्बुदरीपवर्तीं मंदर पवेत के दक्षिण मे तीन अकरममभूपिर्या, जम्बरदरीपवर्ती मदर पर्वत के उत्तर मे तीन अकमंभूमिर्या, जम्बूद्रीपवर्ती मदर पर्वत के दकिण ओौर उत्तरमे वषं वपंधर पर्वत, हर, देविय ओौर नदियो का त्रिक तथा पूर्व- पदिचम आदि मे नदियो काच्रिक।

१६८. पृथ्वीकम्प के तीन कारण 1

१६६. तीन प्रकार के कित्विषिक देव ओर उनका निवासस्थान

विषय शूची १६

२५५.

२०१.

२०२. २९२.

२५४, २०६ २०७ २०८

२०६.

२१०

२१९१. १२.

दाकनद्र के वाह्य परिषद्‌ के देवो की स्थिति, सौर आभ्यन्तर परिषदा के देवियो की स्थिति, ईशानेन के बाह्य परिपद्‌ के देवियो की स्थिति प्रायदिचत्त के तीन भेद,

प्रव्रज्या भादि के लिए अयोग्य तीन भ्यक्ति। वाचना देने योग्य तीन व्यक्ति

चाचना देने योग्यं तीन व्यक्त्ति,

तीन मुसंजाप्य (सुबोध) तीन दुस्संज्ञाप्य (दुर्बोध) तीन्‌ मण्डलिक पवत्‌ !

(. पवेत, समुद्रं ओर कत्पो मे तीन महान्‌

कल्पस्थिति के तीन भेद

नरकं नादि दण्डकोमे तीन श्चरीर

गुर, सतति, स्रु, सनुकम्पा-माव ओर भरत इनके तीन- तीने प्रकार के प्रत्यनीके 1

माति मे मिलनेवाले तीन अंग,

पिता से प्राप्त होने वले सीन अंग 1

श्रमण निग्रन्थो के महानिर्जंरा मौर महपर्यवसान के तीन स्थान,

श्रमणोपामक के महानिजंरा सीर महापयंवसान के तीन स्थान 1

पुद्मल प्रतिघात के तीन हेतु !

तीन प्रकारके चकु 1

8

२१३. २१४. २१५. २१६. २१७. २१८. २१६. २२०.

२२१.

२२२. २२३.

२२५. २९२९ २२७. २२८. २२६.

ती

विपय सुची

तीन प्रकार के अभिगम।

तीन प्रकार की कछद्धि।

तीन प्रकार का गर्वं

तीन करण |

तीन प्रकार का धर्मं (स्वाच्याय, ध्यान गौर तप) आवृत्ति, उपपत्ति भौर पर्याप्त के तीन-तीन भेद तीन प्रकार का अन्त)

तीन प्रकार के जिन,

तीन प्रकार के केवली;

तीन प्रकार के अरन्त

तीन लेश्या दुरभिगन्ध भौर तीन लेया सुरभिगन्धवाली- यावत-स्निग्ध, उष्ण तीन-तीन लेश्याए 1 मरण के तीन भेद

अव्यवसायी के तीन अहित स्थान, व्यवसायी के तीन हित स्थान

. तोन-तीन वलय से धिरी हई नरकादि प्रत्येफ पृथ्वी

नरकादि दण्डको मे तीन समय की तिग्रहुगति

. क्षीण मोह अर्हन्त के युगपत्‌ तीन कर्मो काक्षय।

अभिजित, श्रवण आदि नक्ष के तीन-तीन तारे।

भ० धमना भौर भण० चान्तिनाथ तीथं कर का अन्तर भ° महावीर की तीन युगान्तछृद्‌ भूमि,

भण मल्लिनाथ मौर भ० पावनाय के सद्‌ दीक्षित पुरुप

विषय सुची २१

२३०. सगवान महावोर के तीन सौ चनुर्दश पूर्व्रारी पुनि २३१. तीन प्रीथं कर चक्रवर्ती २३२, श्रं वेयक विमानो के तीन प्रस्तर २३३. पापकमं के पुद्गलो को एकवरित करने वाले, बाधने चलि, , उदीरण करने वाले, वेदने वाले ओौर निर्जरा करे वाते तीन लिग वाले जीव २३४. तीन अनन्त प्रदेगी स्कन्य-यावत्‌-त्रिगुण रश्च अनन्त पुद्गल © चतुथं स्थान प्रथम्‌ उद्‌ शक २३५. चार प्रकार की अन्तक्रिया 1 २३६. वृक्ष की उपमा गौर पुरुप २६७. प्रतिमा प्रतिपन्न भिक्ष के बोलने योग्य चार मापा 1 ०३८. सत्यादि चारं प्रकार कौ भाषा २३९. वस्व कौ उपमा ओर पर्प २४०. अतिजात्त भादि चार प्रकार के सत्त २४१. सत्यवादी मौर मिथ्यावादी पुरुप, वस्त्र की उपमा ओौर पुरूष 1 २४२ कोर-मंजरी-की उपमा भौर पुरुप 2४३. घुण को उपमा सौर तपस्वी भिक्षु २४४. मग्रदोज जादि चार प्रकार की वनस्पति २४५. नैरयिके के मनुष्य लोक मे नही जा सकने के वार कारण

२२ विषय सू

२४६. निग्रन्थी (साध्वी) को कल्पनीय चार संघाटी (साडी) २४७. व्यान के चार-चार भेद, लक्षण, आलम्बन गौर अनुप्रक्षा २४८. देवो की चार प्रकार की स्थिति जीर सवास २४६. चौवीस दण्डक मे चार कषाय, चौवीस दण्डक मे क्रोघादि का चार प्रकार का प्रतिष्ठान क्रोधादि की चार प्रकार की उत्पत्ति, अनन्तानुवंधी आदि क्रोधादि के चार भेद, आभोग निवत्तित आदि क्रोध के चार भेद।

२५०, अष्ट कमंप्रकृति के चयनादि के चार स्थान २५१. समाधि आदि चार प्रतिमा २५२. चार मजीव (मधघर्मास्तिकायादि) काय २५३. चार अस्पी काय,

फल की उपमा मौर पुरुप

२५४. चार प्रकार के सत्यः चार प्रकार का भढ, चौवीस दण्डक मे चार्‌ प्रकार्‌ के प्रणिधान, चार प्रकार के सुप्रणिवान, चौवीस दण्डकमे चार प्रकारके दुप्प्रणिधान।

२५१५. भद्र मौर अभद्र पुरुष, दोपदर्नी पुष, दोप प्रकाणक पुरप, दोप शामक परुष,

२४ विपय सूची

२६७. चार सुगति मौर सुगत, चार दुर्गति गौर दुर्गत 1 २६८. जिन होने पर सर्वप्रथम समयमे क्षीण किये जाने वाले चार कर्माश, केवलिव चार कर्मार, प्रथम समय सिद्ध के चार क्षीण कर्मन)

२६६. चार कारण से हास्य की उत्पत्ति 1

२७०. चार प्रकार के अन्तर गौरं स्वरी पुरुप की तुलना २७१. चार प्रकार के भृतक 1

२७२, प्रकट या प्रच्छन्न दोष सेवी पुरुप

२७३. असुरेन्द्र आदि की चार-चार बग्रमहिपी 1 २७४. चार गोरसविगय, चार महाविगय 1

२७५. दटागारश्ाला कौ उपमा से पुरप तथा स्वरी की तुलना २७६. चार प्रकार की बवगाह्ना णरीर्‌ की ऊचारई) २७७. चार प्रकार कौ अंग वाह्य प्रनप््तिर्या 1

दितीय उद शक

२७८, चार प्रकार की प्रतिसंलीनता, चार प्रकार की अप्रतिनंलीरता।

२७६. दीन~यावत्‌-दीन परिवार वाले पुरुप 1 २८०. आयं -यावत्‌-घार्यं परिवार वाने पुरुप २८१. वपम ओर्‌ हात की उपमा से पुष की तुलना

विपि मयी ०१५

२८२. पाद्‌ विवा, नार्‌ प्रक्र की वमव)

[०

घ्{(नोसनि

२८२. एभिर्‌ ण्णदुन्प दृद त्रीर तयम खमि वृष्णा फा

[+ नृता वृ = ९८६. -(कतदनाने पैः उनतत स्मन केषा सवधन तनिक कषर

{र प्रषः |

२६ विषय सूची,

२६१. तमस्काय के चार नाम, सौनमं अदि चार कल्पो को आवृत्त करने वाल तमस्काय

२६२. प्रकट भौर प्रच्छन्न दोष सेवी पुरुष ्रत्युत्पञ्चानन्दौ ओर निस्सरणानन्दी पुरूष, सेना को उपमा मौर पुरुष 1

२९३. पर्वतराजि आदि की उपमासे क्रोध, मान, माया, लोभ की तुलना |

२६४. संसार आयु भौर भाव के चार-चार प्रकार २६५. चार प्रकार का आहार,

चार प्रकार के उपक्रम,

चार प्रकार की अल्पावहुत्व,

चार प्रकार के सक्रम,

चार प्रकार के निधत्त ओर निकाचित कमं

२६७. चार प्रकार के एभ्य

२६८. चार प्रकार की कति

२६६ चार प्रकार के सवं।

३००. मानुषोत्तर पव॑त के चार कूट

३०१. सुपमासुषमा आरा का काल प्रमाण |

३०२. जम्दप मे देवकु उत्तरकुरं कों छोडकर चार कर्मभूमि, चार वंतान्य पवत, चार वंदाढ्य पवंततौ के चार भधिपतिदेव, जम्बरुदरीप मे चार महाविदेह वपं,